बुधवार, अगस्त 25, 2010

हे कलमाड़ी, आप न घबराना.

सुरेश कलमाड़ी जी,
नमस्ते,
वैसे तो पत्र के शुरु में हालचाल पूछा जाता है लेकिन मैं ऐसा करके जले पर नमक छिड़कने का काम नहीं करूंगा. हर रोज जानकारी मिलती रहती है कि कैसे आप जैसा एक खांटी खेल प्रेमी और देश की इज़्ज़त का सच्चा रखवाला परेशान किया जा रहा है.

रोज, सुबह की अखबार खोलते हीं सबसे पहले आपकी खैरियत जानने के लिए गेम से जुड़ी खबरों की तरफ आंखे दौड़ाता हूं. लेकिन हर दिन निराशा ही हाथ लगती है. रोज कोई कोई आपको बुरा-भला बोल कर निकल जाता है. एक दो दिन पहले तो हद ही हो गई. शांत चित्त और प्रसन्न मुख वाले प्रधानमंत्री जी ने भी आपको हड़का दिया. ज्यादातर मौके पर केवल मुस्कान बिखेरकर निकल जाने वाले अपने सरदार जी से भी चुप नहीं रहा गया

मुझे समझ नहीं रहा कि आपने ऐसा क्या कर दिया है जो हर कोई आपकी तरफ हुडकी मार रहा है. मुझे क्या, ज्यादातर लोगों को नहीं पता होगा कि हुआ क्या है. बस बोलना है सो बोले जा रहे हैं.
कोई सामने कर बताए तो कि आपने किया क्या है? आखिर दोष क्या है?

अगर आपकी कोई गलती है तो वो बस इतनी कि आपने इस भुक्खड़ और हमेशा ही गरीबी में रहने वाले देश के लिए इतने बड़े गेम की मेजबानी हासिल की

आपने तो अच्छा ही सोचा था. आपको क्या पता था कि यहां के लोग इंदिरा जी के काल में भी गरीब थे और आज मनमोहन की सरकार में भी हैं. वैसे ज्यादातर नेता आपको इस बात के लिए नहीं कोस रहे कि आपने इस गेम की मेजबानी क्यों ली और इतना पैसा एक गेम के लिए क्यों खर्चा जा रहा है. इन्हें भी पता है कि इस देश से गरीबी अब तक गई है और आगे कभी जाएगी. यहां गरीब के अमीर बनने का एक ही आसान रास्ता है. सबको नेता बनना पड़ेगा. केवल नेता से काम नहीं चलेगा. मंत्री बनना पड़ेगा. जो गरीब लोग वक्त रहते नेतागिरी में गए उनका आज देखिए. दस-पांच लखपति को तो अपने अगल-बगल रखते हैं

खैर, मैं मुद्दे से भटक गया था. माफ करिएगा! इस देश में सबको ज्यादा बोलने की आदत है. क्या नेता, क्या जनता और क्या पत्रकार. सबके-सब अति बोलक्कड़ होते हैं. बड़े बुजुर्ग कह गए हैं कि ज्यादा बोलने से काम खराब होता है. हर कोई आपको बोल रहा है, झाड़ रहा है और इससब में खेल की तैयारी खाक होगी बस भसड़ हो रहा है. आप ऐसा मत होने दीजिए. जिस मन और हिम्मत से आपने गेम का आयोजन दुनियां से छीना था उसी लगन से लगे रहिए

अगर ध्यान लगाने में दिक्कत हो रही हो तो एक-दिन के लिए बाबा रामदेव जी के यहां से हो आइए. बड़ा अच्छा ध्यान लगवाते हैं. वैसे उन्हें भी आपकी तरह देश की इज़्ज़त बहुत प्यारी है. तभी तो बाबागिरी छोड़कर राजनीति के अखाड़े में लंगोट बांधने के लिये तैयार हैं. रामदेव जी आपको निराश नहीं करेंगे वो हर संभव आपकी मदद करेंगे

हंसी तो तब आती है जब घुसखोड़ी, घपलों और घोटालों के दम पर खड़े हमारे माननीय जनसेवक आपको गेम में हो रही भ्रष्टाचार के लिए गरियाते हैं. क्या जमाना गया है? जिन पर घोटालों के अनगिनत मामले लदे हैं, जो गरीबों के पैसे से पार्क और पार्कों में अपनी आदमक़द मुर्तियां लगवा रहे हैं वही लोग आप पर निशाना साध रहे हैं. जो राहत का सामान और कचरा तक कोंच कर ठाठ से बैठे हैं वही नेता आप पर गरीबों के पैसे लुटाने का आरोप लगा रहे हैं

मैं कहता हूं कि अगर आप एकाध करोड़ लुटा भी रहे हैं या कुछ लाख-वाख इधर-उधर हो भी जाता है तो इसमे गलत क्या है. इतना बड़ा आयोज़न है तो हल्का-फुल्का इधर-उधर तो होगा ही. इसमे कौन सी नई बात है!

सो कलमाड़ी जी, मैं आपको कहना चाहता हूं कि आप इन गीदड़ भवकियों से हड़किएगा मत. ये सब तो चलता रहेगा. एक कहावत है हमारे इलाके मेंहाथी चले बाज़ार, कुत्ता भौंके हज़ार”. बस समझिए ऐसा ही कुछ हो रहा है. एक बार खेल खत्म हुआ कि सबकुछ हज़म हो जाएगा

जहां तक बात हो रही है जांच की तो उसके बारे में आपसे क्या कहना. हमारे यहां के जांच तो बस चलते हैं, और चलते हैंबस चलते ही जाते हैं. इनका कोई नतीज़ा नहीं निकलता. वैसे ये-सब तो आप मुझसे बेहतर ही जानते हैं. आपकी दाढ़ी के बाल तो पक चुके हैं ये सब देखते-समझते. सो आप डरिएगा नहीं. घबराइएगा नहीं. टूटिएगा नहीं. बस अपने मिशन में लगे रहिए. मिशन कॉमनवेल्थ गेम

हां चलते-चलते एक जरुरी बात. इनसब झमेलों से थोड़ा समय निकालकर अपने परिवार को भी दीजिए क्योंकि बुरे वक्त में आपका परिवार ही आपके साथ रहेगा. वैसे खुदा करे कि आप जैसे सच्चे सिपाही को कभी कोई बुरा टाईम देखना पड़े

आपकी सलामती और लम्बी उमर की दुआ के साथ इस पत्र को खत्म करता हूं. विशेष बातें किसी प्रेस बैठक में मिलने पर.
आपके जज़्बे को सलाम!!
राष्ट्रमंडल खेल की जय हो!! 
 

मंगलवार, जुलाई 27, 2010

गेम की तैयारी और बारिश का पानी

पिछले कुछ समय से दिल्ली को दुलहन की तरह सजाया जा रहा है. अगामी गेम रूपी बारात के लिए साज-सज्जा का काम कछुआ चाल से ही सही लेकिन चल तो रहा ही है. कितने सारे पैसे लग रहे हैं इन तैयारियों में? इसका कोई ठीक-ठीक हिसाब नहीं है. वैसे भी काम के बीच में पैसे का हिसाब कौन रखे, हिसाब-किताब तो आयोजन के बाद की चीज है. तब की तब देखी जाएगी. अभी तो, पूरा सरकारी अमला काम करने में लगा है. सरकारों ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी है.

गरीब को गरीब ही रहने दिया. इन बेचारों ने भी गेम तक चुप ही रहना ठीक समझा. बेघर को दिल्ली से ही बाहर कर दिया. कुत्ते तक को दिल्ली से बाहर भेजने की योजना बन गई. पैसे को पैसा नहीं समझा जा रहा, पानी की तरह बहाया जा रहा है. दिल्ली की आम कही जाने वाली जनता ने भी इन तैयारियों में आने वाले खर्च के बोझ को चुप-चाप उठा रही है.

इस बीच, अफसरान लगातार अपनी बड़ी-बड़ी ए.सी. गाडियों से इन तैयारियों का जायजा लेते रहे और सारी तैयारी वक्त से पहले पूरा कर लेने का भरोसा दिलाते रहे.

इस भरोसे को सुनते और पचाते हुए देश का मीडिया भी इस शादी में शामिल होन के लिए बेचैन सा होता दिखा. कुछ अखबारों ने बारातियों को सही होटल और सही बस रूट की जानकारी देने के लिए बड़े-बड़े किताब भी छापनी शुरु कर दी. टीवी वालों ने अपने-अपने चैनल पर शहनाई की सुरीली तान छेड़ दी और शेरा का एनिमेशन नचाना शुरु कर दिया.

हम यानि आम दिल्ली वाले भी सरी परेशानियों को पीछे धकेलते हुए बारात देखने के लिए तैयार होने लगे. कुछ लोगों ने तो अपने खर्च में कटौती कर के टिकट भी ले लिए.

आने वाले मेहमानों से आटो-टैक्सी ड्राइवरों को कैसे बतियाना चाहिए, कितना किराया लेना चाहिए इसके लिए ट्रेंनिग भी शुरु हो गई. ये अलग बात है कि, आज तक दिल्ली वालों से आटो-टैक्सी वालों को बतियाने का ढ़ंग नहीं सिखाया. अभी कुछ दिन पहले तक सब कुछ ठीक ठाक चल रहा था. सड़कें नई न होते हुए भी, नईं लगने लगी थीं.

लेकिन इस मौनसून की घंटे भर की बारिश ने सब किया धरा बेकार कर दिया. अब तक जितनी मेहनत हुई उस सब पर इस कलमुँही ने पानी बहा दिया. बुरा हो इस बारिश का जिसने हमारे मेहनती अफसर और ईमानदार नेताओं को मुहं छिपाने पर मजबूर कर दिया. ओले पड़े इस बारिश के सर, जिसने दुलहन की तरह तैयार हो रही हमारी दिल्ली का सारा मेकाअप कुछ ही घंटो में उतार दिया और नई नवेली दुलहन को विधवा जैसा बना दिया.

अब जब ऐसा हो गया तो सब के सब सरकार, आफिसर और करमाड़ी साहब के पीछे पड़ गए. ये बेचारे भी क्या करें? एक तो चारो तरफ इतना काम पसरा है. समय करीब आने से जल्दी से जल्दी काम खत्म करने का दवाव है सो अलग. हो सकता है कि इसी जल्दीबाजी की वजह से ये लोग भूल गए होंगे कि जून के महीनें बारिश भी आनी है. बेशक ऐसा ही हुआ होगा. अगर इन धुरंधरों को इस बात का तनिक भी आभास होता कि ऐसा कुछ होने वाला है तो वो पूरी दिल्ली के ऊपर एक “बारीश रक्षा कवक्ष” जैसा कुछ बनावा देते. अगर देश में नहीं बन पाता तो विदेश से मंगवा लेते. फिर उस कवक्ष को विदेश से आए खास तरह के बांस की मदद से पूरी दिल्ली के ऊपर टांग दिया जाता. ठीक वैसे ही जैसे गांव-गवई में शादी के मौके पर तिरपाल या सामियाना ताना जाता है.

फिर इसी सामियाना रूपी कवक्ष के अंदर ही सारी तैयारियां आराम-आराम से धीरे-धीरे सितंबर या फिर अकतुबर तक चलती रहतीं. फिर गेम के दौरान भी यह कवक्ष वैसे के वैसे ही लगा रहता ताकि गेम के दौरान भी बारिश की एक सिंगल बूंद भी दिल्ली की जमीन पर नहीं गिरती.

खैर, जो हुआ सो हुआ. जो कुछ धुल गया, टुट गया उसे दुबारा खड़ा कर लिया जाएगा. हम मेहनती लोग हैं. जो ठान लेते हैं उसे किसी भी किमत पर पूरा करते हैं. सो इस गेम को भी पूरा होना ही पड़ेगा. क्या होगा कुछ पैसे और खर्च करने होंगे. थोड़ी सी ज्यादा मेहनत करनी होगी. जब सरकारी खजाने का मुहं खुला हुआ है तो फिकर काहे का.

वैसे ये कवक्ष वाला आईडिया वाकई दमदार है. इस बारे में आयोजन समीति को विचार करना चाहिए. हो सके तो आगे कि धुलाई और जग हंसाई से बचने के लिए हरकत में आते हुए इसका इंतजाम करवा कर जल्दी से जल्दी दिल्ली को कवर कर देना चाहिए.

शनिवार, मई 15, 2010

मीडिल क्लास को सब कुछ चाहिए.....!

निरुपमा पाठक, एक ऐसा नाम जिसे समाज की दकियानूसी सोच ने, पढ़ेलिखे परिवार ने एक ही झटके में इतिहास बना दिया. ऐसा नहीं है कि अपनी मर्जी से, अपनी पंसद से शादी करने और अपना जीवन साथी चुनने की वजह से किसी लड़की के मारे जाने की यह  अकेली घटना है. हर कुछ दिन के अंतराल पर ऐसी खबरें आती ही रहती हैं. 

कभी उत्तर प्रदेश के किसी राज्य से तो कभी हरियाणा के किसी गांव से. हर दो तीन दिन बाद के अखबार इस बात की गवाही देते हैं कि कैसे अपने ही गोत्र में शादी करने की कोशिश करते एक प्रेमी युगल को मौत के घाट उतार दिया गया. कैसे किसी बाप, चाचा, भाई और मामा ने अपनी ही बच्ची को जिन्दा छत से फेंक दिया.

लेकिन अब तक इस तरह की ज्यादतर घटनाएं हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के उन इलाकों से आती थी जिसे हम शैक्षिक रुप से पिछड़ा हुआ मानते थे या फिर ऐसा सोच कर अब तक इस तरह की टनाओं से अपने-आप को अलग करते आएं हैं.

लेकिन निरुपमा की हत्या ने हमारे पढ़ेलिखे कहे जाने वाले मीडिल क्लास की असलियत बाहर ला दी है.

इस घटना ने यह साबित कर दिया है कि किस तरह से यह समाज विकास करना चाहता है. अपना रुतबा बढ़ाना चाहता है. चुंकी एक मां-बाप का रुतबा तब ज्यादा बढ़ता है जब उसके बच्चे अच्छी नौकरी में आ जाते हैं और खूब सारा पैसा कमाते हैं सो आज इस क्लास में अपने होनहारों को खूब पढ़ाने की हो लगी रहती है. 

जिस इलाके से निरुपमा ताल्लुक रखती थीं वहां और उसके आसपास के इलाकों के मां-बाप अक्सर अपना सब कुछ बेच कर भी बच्चों को पढ़ाने की बात करते दिखते हैं. ऐसा इसलिए कि अगर बच्चा पढ़ लिख कर आफिसर बन गया तो इज्जत बढ़ जाएगी और अगर विदेश चला गया तो खूब सारा पैसा और इज्जत अपने आप आ जाएगा. इन दोनों ही हालत में मां-बाप की इज्जत और झूठी शान बढ़ जाती है. अपने आसपास में इनका कद बढ़ जाता है.

आज से करीब दो साल पहले जब निरुपमा ने कोडरमा से दिल्ली आकर पत्रकारिता में करियर बनाने की बात की होगी तो ऐसा ही कुछ हुआ होगा निरुपमा के परिवार के साथ. तब उसके मां, पिता, दोनों भाई, चाचा और मामा का सर गर्व से उठ गया होगा. सबके सब बहुत खुश हुए होंगे.

 लेकिन जैसे ही निरुपमा ने अपनी जिन्दगी अपने हिसाब से जीने की बात की होगी, अपनी जात-बिरादरी से बाहर जा कर अपने लिए जीवन साथी तलाशने की बात की होगी वैसे ही सब कुछ खत्म हो गया होगा. यहां से हमारा मिडिल क्लास बदल जाता है. 

यहीं से इस क्लास की झूठी शान, पुरानी सोच और दकियानूसी ख्यालों में लिपटा लिबास सामने आ जाता है. हर हाल में अपनी नाक को बचाने के लिए यह समाज हरकत में आ जाता है. सब केवल अपनी इज्जत बचाने के लिए ऐक्ट करने लगते हैं और इस चक्कर में ही देश के संविधान को बौना बता कर सनातन धर्म को सबसे ऊपर बिठा देते हैं. ऐसा ही निरुपमा के पिता ने भी किया.
 
हालांकि इस केस में पुलिस जांच चल रही है और मामला साफ होने में समय लग सकता है. लेकिन उसी समाज से ताल्लुक रखने की वजह से मैं इतना तो दावे के साथ कह सकता हूं कि अगर निरुपमा के परिवार वालों ने उसे मार भी दिया होगा तो भी इस बात की उम्मीद कम ही है कि परिवार के इन लोगों को कोई बड़ी सजा मिले.

इस तरह के मामलों में सब कुछ बड़ी आसानी से मैंनेज होते हुए देखा है मैंने. कुछ पुलिस वाले, डाक्टर और निचली अदालत के जज पैसों से खरीद लिए जाते हैं और कुछ को जाति की इज्जत और भाईचारे के नाम पर लोग अपने साथ कर लेते हैं.

 इसका एक उदाहरण आ भी चुका है. जिस डाक्टर ने निरुपमा की लाश का पोस्टमार्टम किया और टीवी पर एक इंटरव्यू देते हुए यह कहा कि यह मामला साफ-साफ हत्या का लगता है वही डाक्टर दो दिन बाद कहता है कि उसने जल्दबाजी में रिपोर्ट दे दी और गलती हो गई. यह एक मामूली भूल नहीं है बल्कि यह सब कुछ मैनेज होने का उदाहरण है.

 यह इस बात का भी सबूत है कि मिडिल क्लास अपनी झूठी शान के नाम पर कैसे अपने ही बच्चों को मार सकता है और फिर बाद में कानून को ठेंगा दिखाते हुए बच के निकल सकता है.
मुझे इसमें कोई खास हैरानी नहीं होगी अगर निरुपमा पाठक की हत्या की यह गुत्थी उलझते-उलझते जल्द ही एक इतिहास बन जाए.

शुक्रवार, मई 07, 2010

" देशद्रोही है, आतंकवादी है….."

आज क़साब है. इससे पहले अफजल था और उससे पहले भी कोई रहा होगा. ये ऐसे कुछ चेहरे हैं जो समय-समय पर बदलते रहते हैं. लेकिन क्या यही कुछ चेहरे हैं जिसके किये धरे से हम एक समुदाय विशेष की छवि मन-माफ़िक तरीके से गढ़ने लगें? ये चेहरे तो सामने आते हैं और फिर इतिहास बन जाते हैं. लेकिन जो नहीं बदलता वो है मुसलमानों  के बारे में एक सोच. नफरत. दुर्भावना और न जाने क्या-क्या!
यह कभी नहीं बदलता और इसी वजह से हमारे यहां का मुस्लिम खुल कर बोल नहीं पाता. सवाल नहीं उठा पाता. अपने आप को इस देश का उतना नहीं मान पाता, जितना हम यानी हिन्दू मानते हैं. (मैं यहां कोई बंटवारा नहीं करना चाहता और न ही कोई ऐसी बात करना चाहता हूं जिससे कोई विवाद खड़ा हो और मुझे ख्याति मिल जाए.  कुछ लोग ऐसा मानते हैं कि हम अपने को फेमस करने के लिए ऐसा लिखते हैं) बल्कि यह एक कड़वा सच है कि आज भी आम हिन्दू और मुस्लमान के बीच एक गहरी खाई है. जिसे कोई नहीं पाटना चाहता. दोनो वर्ग एक दूसरे को टेढी नज़र से देखते हैं.

 हमारे यहां का हिन्दू, मुसलमानों को आतंकवादी मानता है या फिर ऐसा कट्टर मानता है जो हमेशा हिन्दुओं को मारने के बारे में, खत्म करने के बारे में सोचता है लेकिन यह सच नहीं है. मुस्लिम भी कमोबेश हिन्दुओं को ऐसी ही घृणा और हिकारत भरी नज़रों से देखता है.

 ज्यादातर मुसलमानों में हिंसा का वो दौर आज भी इस तरह से घर कर गया है कि रात के समय सोते हुए भी उन्हें सपने आते हैं कि देश में दंगे शुरु हो गए हैं और कुछ लोग उनके ही घर में घुस कर उन्हें मारना चाहते हैं. मेरे एक दोस्त का छोटा भाई पिछले दिनों इसी तरह का एक सपना देखता है और उठ कर रोने  लगता है. अब यह डर नहीं तो और क्या है? यह एक ऐसा डर है जो बाबरी और गोधरा के बाद हर मुसलमान के मन में बुरी तरह घुस चुका है और निकल नहीं रहा.

 अब डर की एक और कहानी सुनिए- मेरी एक मुसलमान दोस्त है. उसने मुझे एक दिन बताया कि जब दिल्ली में उसका घर बन रहा था तो उसके पापा ने घर में दो दरवाजे बनवाने का फैसला किया. एक आगे की तरफ और एक पीछे की तरफ. जिस तरफ पीछे का दरवाजा बन रहा था उधर मुसलमानों की बस्ती है. उसने बताया कि उसके पापा ने दो दरवाजे इसलिए बनवाने का फैसला लिया ताकि कल को अगर कुछ गलत हो जाए और कोई दंगा हो जाए तो वो सभी को लेकर पीछे वाले दरवाजे से उस मुस्लिम बस्ती में जा सकें. अब आप इसे क्या कहेंगे? 

हम लोगों के घर में भी दो दरवाजे होते हैं लेकिन कोई भी हिन्दू यह सोच कर पीछे का दरवाजा नहीं खोलता होगा कि कल को कोई दंगा हो तो भाग सकें. जान बचा सकें.

फिर मुसलमान ऐसा क्यों सोचते हैं? क्यों घर बनाने से पहले ही घर से बच कर निकलने की सोचते हैं? क्या ये मान लिया जाये कि वो इसे अपना घर नहीं समझते? इसलिये डरते हैं? और अगर ऐसा है तो ये किसकी हार है? आखिर ये असुरक्षा का माहौल क्यों?

जब एक हिन्दु ये कहता है कि कसाब को फ़ांसी नहीं होनी चाहिये तो हम या तो उससे तर्क-वितर्क करते हैं, या ये कह कर पल्ला झाड़ लेते हैं कि फ़लां – फ़लां कम्यूनिस्ट है, फ़लां-फ़लां अपने आप को लीबरल दिखा रहा है. लेकिन जब कोई मुस्लिम ऐसा कहता है  तो सीधी प्रतिक्रिया आती है  –साला, देशद्रोही है, आतंकवादी है…..फ़लाना-ढिमकाना. ऐसा लगता है कि मुसलमानों के बोलते ही हम उनकी जबान निकाल लेना चाहते हैं या उन्हें चुप करा देना चाहते हैं.

ऐसे कैसे और कब तक चलेगा?

मंगलवार, मई 04, 2010

इनसे लड़ना होगा नहीं तो.....!!

झरखंड में जन्मी और दिल्ली में पत्रकारिता करने वाली निरुपमा आज इतिहास बन चुकी है. निरुपमा को किसी खाप पंचायत के सरपंच ने नहीं मारा. उसका गला घोटने वाले उसके अपने थे. शायद, उसके मां-बाप. वैसे हमारे देश के लिए यह कोई नई और अचरज में डालने वाली घटना नहीं है.

अगर कुछ चौकाने वाला है तो वो है देश के मध्यम वर्ग का वो डरावना और खूनी चेहरा जो अपने ऊपर कई नकाब डाले रहता है. इस वर्ग को वो सब कुछ चाहिए जिससे इसका नाम हो. बेटा, बेटी पढ़े. अच्छी नौकरी करे. खूब पैसे कमाएं और बुढापे में इनकी खूब देखभाल करे.


न तो निरुपमा अनपढ़ थी और न ही निरुपमा के जन्मदाता. निरुपमा के पापा एक सरकारी बैंक में बाबू थे और जब उनकी बेटी ने दिल्ली आ कर पत्रकारिता करने की ठानी होगी तो वो अपने समाज में अपना ओहदा बढ़ा हुआ पाते होंगे.

आते-जाते लोगों को यह बताते होंगे कि मेरी बिटिया देश के नंबर वन मीडिया संस्थान में पढ रही है और कल एक फेमस टीवी जर्नलिस्ट बनेगी.

लेकिन जैसे ही बिटीया ने अपनी मर्जी से शादी करने की ठानी और इस बात का ख्याल नहीं रखा कि वो एक पंडित है.

इनलोगों ने अपनी ही बेटी को सुला दिया और कहने लगे कि निरुपमा ने आमहत्या की है. अपनी बेटी की मौत पर आंसू बहाने के बदले पोस्टमार्टम की रिपोर्ट को ही झूठा बतलाने लगे.

यहीं से दिखने लगा इस क्लास का असली चेहरा जो साफ-साफ कह रहा है कि इन्हें अपने बच्चों की खुशी से ज्यादा अपनी झूठी शान प्यारी है. अपनी शान के लिए ये लोग अपने बच्चों को झूठ बोलकर घर बुला सकते हैं. रात में सोते समय अपने घर के भीतर ही उसका गला घोट सकते हैं और बाद में सबके सामने खुल कर कह सकते हैं कि बेटी ने आत्महत्या की है. हद है. इस समाज पर घिन्न आती है.







रविवार, अप्रैल 25, 2010

क्या रैलियों में आम आदमी होता है?



कभी-कभी सोचता हूं कि अगर हमारे देश से गरीबी, भुखमरी, महंगाई और बेरोजगारी खत्म हो जाए तो इन नेताओं की गाड़ी कैसे चलेगी? ये कैसे विधायक, मंत्री और न जाने क्या-क्या बन कर लालबत्ति की गाड़ी से सायरन बजाते हुए जाएंगे और आएंगे? कैसे इनके चेहरे की लाली और बैंक खाते की हरियाली बनी रहेगी?
फिर भी हर नेता (चाहे वो कोई छुट्भैया नेता ही क्यों न हो) अपनी हर बैठक, हर सभा में इन्हीं मुद्दों को खत्म करने की बात करता हुआ दिखता है. वैसे तो होना यह चाहिए कि जहां से दाल-रोटी चलती है उसकी सलामती की दुआ करनी करिए  और आम आदमी करता भी यही है लेकिन अपने नेता, जनसेवक इस मामले में भी अलग हैं.
खैर, अब मैं भी असली मुद्दे की तरफ़ आना चाहता हूं. 21 अप्रैल के दिन देश की मुख्य विपक्षी पार्टी बीजेपी ( यह पार्टी पिछले कुछ दिनों से केवल नाम की विपक्षी पार्टी बन कर रह गई थी) ने महंगाई के मुद्दे पर केन्द्र की यूपीए सरकार को घेरने के लिए देश भर से लोगों को दिल्ली के रामलीला मैदान में इकट्ठा किया. 
करीब-करीब तीन लाख की भीड़ थी. बात भी सही है केवल भीड़ ही थी. रामलीला ग्रांउड ही नहीं इसके आसपास के कई इलाकों ने भी इस दिन यही महसूस किया कि आए लोग केवल एक भीड़ थे. जिन्हें  इतना पता था कि जब-जब  टीवी या फोटो कैमरा उनकी तरफ घुमे तो किस तरह के नारे लगाने हैं और अगर कोई बड़ा नेता सामने से (आखों पर धूप का चश्मा पहने) हाथ हिलाता हुआ  गुजरे तो उसका दिखावटी अभिवादन किस तरह से  करना है. मैं यह सब इसलिए कह पा रहा हूं क्योंकि  मैं भी इस दिन बतौर फोटो-पत्रकार  रामलीला ग्राउंड में मौजुद था.
मैने इसी दौरान यह महसूस किया कि यहां जिन लोगों को आम लोगों का मुखौटा पहना कर, हाथ में पार्टी के झंडे और सर पर कमल खिला कर बिठाया गया था वो केवल बैठने और समय-समय पर एक-आध नारा लगाने के लिए ही बुलाए गएं थे और वो अपना काम बखूबी कर रहे थे. यहां इस रैली में आए ज्यादातर लोगों का न तो महंगाई से कोई सरोकार था और न ही इनकी कमर महंगाई से टूटी और झुकी जा रही थी. आए हुए लोगों को देख कर मुझे ऐसा ही लगा. इनमें से ज्यादातर लोगों के लिए तो यह दिल्ली दर्शन करने का एक अनूठा मौका था सो  आ गए. 
चिलचिलाती धूप में पंडाल के नीचे बैठ लिए और चुंकी भेजने वाले ने कहा था कि वहां जाकर खूब जोर-जोर से नारे लगाने हैं सो लगा लिया. पंडाल में सबसे आगे बैठे कुछ लोग जिन पर धूप सीधे-सीधे पहूंच रही थी वो सुबह के 10 बजे ही इस बारे में बात कर रहे थे कि और कितना समय लगना है यहां. इनकी बातचीत सुनने का मौका मिला तो पता चला कि सभा खत्म होने के बाद ये लोग सबसे पहले इन्डिया गेट फिर अक्षरधाम मंदिर जाएंगे. धूप से और गर्मी से सब के सब बेचैन थे लेकिन पता नहीं क्यों कोई भी पंडाल से उठ कर कहीं छांव में नहीं जा रहा था. 
सब के सब वहीं जमे थे जैसे किसी ने सख्त हिदायत दी हो कि कोई भी पंडाल से बाहर नहीं जाएगा. मेरा कैमरा पूरे पंडाल से लेकर सड़्क तक आम आदमी के उस चेहरे को खोजता रहा जो सही में महगाईं  की मार झेल रहा है लेकिन अफसोस ऐसा कोई भी चेहरा मेरे लेंस के दायरे में नहीं आ सका. हर दफा वही चेहरे सामने आते रहे जो मुंह में पान या गूट्खा दबाए, सर पर पार्टी का झंडा बांधे या पूरे बदन पर ही पार्टी का झंडा लपेटे हुए घूम रहे थे. 
लेकिन मंच पर बैठे लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, सुषमा स्वाराज और पार्टी के नए नवेले अध्यक्ष नीतिन गडकरी इसी भीड़ में आम आदमी को बार-बार देख रहे थे. तभी तो ये सारे नेता अपने-अपने भाषण में बार-बार कह रहे थे कि यह रैली भाजपा की नहीं आम लोगों की है. मुझे नहीं मालुम कि  जनता के इन सेवकों को इस रैली में किस तरह से और कौन सा आम आदमी दिख गया?
खैर, मुझे तो अंत-अंत तक यह भे नहीं मालुम हुआ कि यह रैली पार्टी के नेताओं ने बुलाई क्यों थी? पार्टी के बड़े से बड़े नेता के पास भे मंच से कहने को कुछ खास नहीं था. हर कोई वही बात कर-कर के अपनी कुर्सी पर बैठता गया जिसे देश भर के लोग चाय की दूकान चाय पीते हुए पर या पान की दूकान पर पान खाते हुए करते हैं. 
किसी भे नेता के पास कुछ भी ऐसा कहने को नहीं था जिससे लगे की हां, इस पार्टी में दम है या ऐसा लगे कि अगर यह पार्टी कल सत्ता में आती है तो महंगाई समेत आम आदमी की बहुत सी मुश्किलें आसान होंगी. ऐसा लग रहा था कि मंच से बोलने वाले ज्यादतर नेता गहरी थकान महसूस कर रहे हैं. हो सकता है कि यह थकान एसी  कमरे से बाहर निकलने की वजह से भी हो रही हो. वैसे भे इस तरह की गर्मी से इन नेताओं का रोज का तो कोई वास्ता होता ही नहीं है. 
भाषण खत्म होने के बाद जब संसद तक जाने की बारी आई तो वहां भी यह दिख गया कि आम, आम ही होता है और खास-खास होता है. सभा के बड़े नेता चार गाडियों में सवार हो लिए बाकी के लोग उनके साथ पैदल ही चल पड़े.
इसी बीच एक घटना और हुई कि गर्मी की वजह से पार्टी के नए-नवेले अध्यक्ष को गस्त(चक्कर) आ गया और वो वहीं जमीन पर लुढ़क लिए. अब कोई बताए कि क्या ऐसे होगी लड़ाई महंगाई से?



शुक्रवार, अप्रैल 23, 2010

स्टोरी, जो रोक दी गई...!


 (मेरी इस स्टोरी को मेरे संपादक ने भाजपा के खिलाफ बता कर रोक दिया. चलिए कोई नहीं. अपना ब्लॉग तो है ही. अभी मैं भाजपा के पक्ष में स्टोरी लिख रहा हूं तब तक आप मेरी इस स्टोरी को पढिए जिसे  संपादक महोदय ने रोक दिया.)
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की महंगाई विरोधी रैली 21 अप्रैल को आयोजित की गई.  इस रैली में भाग लेने के लिए हजारों की संख्या में भाजपा कार्यकर्ताओं का हुजूम सुबह ही राजधानी के रामलीला मैदान पहुंचने लगा था.

भाजपा नेताओं के मुताबिक करीब तीन लाख लोगों ने इस रैली में भाग लिया.  रामलीला मैदान में पार्टी के लगभग सभी वरिष्ठ नेताओं ने इस रैली को संबोधित किया.  यहां आए हुए लोगों के हुजुम को पार्टी के जिन नेताओं ने संबोधित किया उसमें प्रमुख रूप से लालकृष्ण आडवाणी, लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज, राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली और पूर्व अध्यक्ष राजनाथ सिंह थे. सबसे ज्यादा  समय  तक पार्टी के वर्तमान राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतिन गडकरे ने कार्यकर्ताओं को संबोधित किया. 
रामलीला मैदान पर कार्यकर्ताओं को संबोधित करने वाले नेताओं में नीतिन गडकरे अंतिम नेता थे. गडकरे के संबोधन के बाद सभी शीर्ष नेता अलग-अलग चार रथों मे सवार हुए और बाकी करीब दस हज़ार  लोग उन रथों के साथ पैदल ही निकल पड़े संसद की तरफ.  पार्टी  के कुछ नेताओं ने बताया कि पार्टी तो ग्राउंड में मौजूद सभी कार्यकर्ताओं और समर्थकों के साथ संसद तक जाना चाहती थी लेकिन दिल्ली की सरकार और प्रशासन ने कानून वय्वस्था बिगड़ने का हवाला देकर ऐसा करने से रोक दिया.


कमोबेस, सभी नेताओं के कहने का एक ही मतलब था कि केन्द्र की मौजूदा सरकार ने महंगाई बढ़ा दी है और इस कमर तोड़ महंगाई से भाजपा ही लोगों को छुटकारा दिला सकती है लेकिन सभा को संबोधित करते हुए पार्टी के किसी भी नेता ने देश की जनता के सामने वो तरीका नहीं बताया जिससे महंगाई को रोका जा सके.
किसी ने भी यह साफ-साफ नहीं कहा कि अगर यह सरकार इस मुद्दे पर सत्ता से बाहर हो जाती है और जनता भाजपा को सरकार बनाने का मौका देती है तो इस पार्टी के लोग किस तरह से महंगाई को कम करेंगे और वो कौन सा फ़ॉर्मुला होगा जिससे देश की बेरोजगार जनता को रोजगार मिल जाएगा.


हालांकि कुछ लोगों का कहना है कि यह रैली सरकार के खिलाफ थी ही नहीं बल्कि यह रैली तो  पार्टी के नए अध्यक्ष नीतिन गडकरे का शक्ति प्रदर्शन था क्योंकि  गत वर्ष दिसंबर में पार्टी का अध्यक्ष बनने के बाद नितिन गडकरी के नेतृत्व में पार्टी का यह पहला और बड़ा सरकार विरोधी आयोजन था। 
इस रैली को लेकर जो अटकलें लगाईं जा रही हैं उसे पार्टी के वरिष्ट नेता और देश के पूर्व गृहमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी के ही एक बयान के बाद हवा मिली है. इसी रैली को संबोधित करते हुए आडवाणी ने इस रैली को गडकरे के नेतृत्व में आयोजित एक अभूतपूर्व रैली करार दिया और यह भी कहा कि इस रैली के आगे पूर्व की सारी रैलियां बौनी साबित हो गईं हैं. ऐसा कहते समय आडवाणी का लहजा सामान्य नहीं था. ऐसा उनलोगों का मानना है जो भाजपा की राजनीति और आडवाणी की शैली को बहुत अच्छे से जानते हैं.


इस रैली में एक बात और ऐसी थी जिसे पार्टी के विरोधी और आलोचक पार्टी में फूट और मतभेद के तौर पर देख रहे हैं. इस रैली में पार्टी के हिन्दुत्व ब्रिगेड के अगुआ और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी मौजूद नहीं थे. 
हालांकि इस बारे में लाल कृष्ण आड़वाणी ने सफाई देते हुए कहा था कि मोदी को कहीं और जाना था सो वो इस रैली में नहीं आ सके लेकिन इस बारे में एक और बात हुई जिस पर ध्यान देने की जरूरत है. मंच से आडवाणी को छोड़कर किसी और नेता ने मोदी का एक बार भी नाम नहीं लिया. यह सामान्य घटना नहीं है. इसी आधार पर कुछ लोग कह रहे हैं कि पार्टी में सब कुछ सामान्य नहीं है.


देखते हैं कि भाजपा की इस रैली से कांग्रेस की सरकार पर कितना और क्या असर पड़ता है और देश की जनता को इस कमर तोड़ महंगाई से कब तक राहत मिलती है. महंगाई कम हो या न हो लेकिन इतना तो हुआ कि देश की राजधानी के कुछ हिस्से इस दिन ठहर गए और कॉमनवेलथ के लिए सज-संवर रही दिल्ली पर खूब सारे पोस्टर और कमल के झंडे खिल गए.



गुरुवार, अप्रैल 15, 2010

आखिर, पानी को बोलना ही पड़ा !!

प्यारे दोस्तों,

जम के पीजिये. मस्त रहिये. इस गरमी को मात देने में बस मैं ही आपकी मदद कर सकता हूं. लेकिन इसके लिये आपको मेरी बात सुननी पड़ेगी. इसे गुहार कहिये, फ़रियाद कहिये, गिला कहिये... या फिर सलाह कहिये.
 
अगर आपलोगों ने अपने इस दोस्त को अब तक नहीं पहचाना है तो हम आपको बता दें कि हम वही हैं जिसके बगैर आप ज़िन्दगी रूक सी जाती है, ठहर सी जाती है. हमारे बिना आप सुबह-सुबह फ्रेश नहीं हो सकते. सुबह में ब्रेकफास्ट, दोपहर में लंच और रात में डिनर के टाईम भी आपको मेरी जरुरत  होती है और अगर खाने में मिर्च ज्यादा तेज हो गई हो तब तो बगैर हमारे काम ही नहीं चल सकता. 

मुझे लगता है कि इतना काफ़ी था. अब आप ये समझ गए होंगे कि मैं कौन हूं?  अगर आप में से कुछ लोग अब भी अपना सर खुजला रहे हैं  और यह सोच रहे हैं कि मैं कौन हूं तो उअनके लिए बता दूं- मैं पानी, जल या वाटर जो कहिए वही हूं. 

हां, हां…वही पानी! जिसके बगैर यहां किसी का काम नहीं चल सकता. हर किसी को मेरी जरुरत है. पेड़-पौधे, कीड़े-मकोरे और आप लोग मतलब इन्सान. यहां तक कि निर्जीव चीज़ों जैसे फ़र्नीचर, गाड़ी और नाजाने क्या-क्या. सब चीज़ों को दुरुस्त रखने के लिये मेरी ज़ुरुरत होती है. प्लीज, आपलोग यह न समझें कि मैं  यहां कोई रोब झाड़ रहा हूं या घंमड कर रहा हूं.  

मैं तो यह सोच के हैरान हो रहा हूं कि एक तरफ तो आपलोग मुझे जीवनदायनी कहते हैं और दुसरे तरफ मुझे यानि पानी को लेकर बहुत लापरवाही बरतते हैं. ये दोनों चीजें साथ-साथ कैसे हो सकती है?  मेरी बात मानिए. मुझे लेकर इस तरह की लापरवाही  न करें…..! यह जो बात मैं आपसे कह रहा हूं हो मेरे लिए नहीं है. मेरा तो नेचर ही है बहना.
 
लेकिन मैं यह नहीं देख सकता कि एक जगह मैं ऐसे ही घंटो बहता रहूं और दूसरी जगह लोग मेरे लिए तरसते रहें, परेशान होते रहें और मेरी तलाश में  घंटो सर पर ड्राम लेकर एक जगह से दूसरी जगह भटकते रहें.
 
हो सकता है कि मेरी बातों को यहां पढकर आप यह सोंचे कि मैं परेशानी को बढ़ाचढ़ा कर पेश कर रहा हूं या फिर आप यह मानें कि इस तरह की दिक्कत दिल्ली या मुम्बई जैसे शहरों में नहीं आएगी. अगर ऐसा सोच रहे हैं तो मैं कहूंगा कि आप गलत हैं और आपको आगे के कुछ महीनों में होने वाली परेशानी का बिल्कुल भी अंदाजा नहीं है.  

साहब, आगे जो कोहराम इन्हीं शहरों में मचने वाली है उसकी खबर आपतक भी पहूंचेगी और अगर एक सुबह आपके बाथरुम या किचन के नलके से मैं नहीं निकलूंगा न….., तब आपको इस बात का अंदाज़ा होगा और तब शायद आप मेरी यहां कही बात को समझेंगे.
 
सच मानिए, मुझे बहुत खराब लगता है जब आप मुझे बगैर काम के घंटो बहते रहने देते हैं. जब जरुरत हो तब मेरा इस्तेमाल करिए और काम होने के बाद फौरन बंद कर दीजिए. अगर आप मेरा इस्तेमाल ध्यान से करेंगे और मुझे बर्बाद नहीं करेंगे तो मुझे भी खुशी होगी और मेरे दूसरे जरुरतमन्दों  को भी मैं आसानी से मिल जाउंगा. अब बात आती हैं  कि आप लोग कैसे मुझे बरबाद करते हैं और मेरी इस बरबादी को कैसे रोका जा सकता है. 

देखिए, आप में से कुछ लोग सुबह जल्दी-जल्दी में अपना सेव बनाते हैं और जब तक सेविंग करते हैं तब तक मैं नलके से बहता रहता हूं. आप में से कुछ लोग सुबह-सुबह अपने गार्डेन में  पानी देते हैं और यह अच्छी बात है क्योंकि मेरी जरुरत तो फुलों को भी है लेकिन यहां भी मुझे फालतु में बहाया जाता है. अगर आप मुझे किसी ड्ब्बे में लेकर पौधों को देंगे तो मेरी बर्बादी को रोका जा सकता है लेकिन अगर आप मेरा इस्तेमाल सीधे पाईप करेंगे तब तो मेरी बरबादी होगी ही न.
 
अब कुछ लोगों को अपनी गाड़ी हर रोज धोने की आदत होती है और ऐसे लोग सीधे नलके से पाईप लगा कर घंटो अपनी गाड़ी साफ करते हैं. अब आप ही सोचिए कि अगर हर गाड़ी वाला अपनी गाड़ी  रोज धोएगा और इसी तरह से घंटो तक धोएगा तो मेरी कितनी बर्बादी होगी. हो यह भी सकता है कि गाड़ी को रोज मुझसे न साफ किया जाए. बल्कि  दस या पन्द्रह दिनों मे एक बार इस काम के लिए मेरा इस्तेमाल किया जाए.
 
वहीं कुछ घरों में काम के समय या बर्तन धोने के समय भी मेरा इस्तेमाल इस तरह से होता है कि मैं  रो देता हूं. एक और जरुरी बात जो मैं  चलते-चलते कहना चाहता हूं कि बारिश के समय भे मैं वैसे ही बरबाद होता हूं.
 
सच मानिए, इस समय मुझे अपनी बरबादी और उन लोगों की किस्मत पर बहुत रोन आता है जो मेरी तलाश में घंटो इधर से उधर भटकते रहते हैं. तब किसी को इस बात के फिक्र नहीं होती कि मुझे स्टोर किया जाए और जरुरत के समय इस्तेमाल किया जाए. लेकिन कुछ लोगों ने इस तरफ काम किया है और उन लोगों से मुझे खुशी है.
 
आप सब की और बहुत सी ऐसी आदतें है जिसकी वजह से मैं बरबाद होता हूं लेकिन मैं इस लेटर में सारी बातें तो नहीं कह पाउंगा और ऐसा करना मुझे अच्छा भी नहीं लगेगा.
 
मैं तो बस इतना कहना चाहता हूं कि मेरे इस्तेमाल में थोड़ी सी सावधानी बरतिए ताकि हर किसी की प्यास बुझ सके और जरुरत पूरी हो सके.
 
वैसे तो आप इंसान हैं, आपको समझाने और बताने की ज़ुरुरत क्या है. विवेक आपके आजू-बाजू ना घूमता तो कैसे छत वाली टंकी में स्टोर करके नलके से मुझे निकालते और फ़िल्टर में डालकर मुझे प्योर करते. मेरा ख़त उम्मीद है आपके ज़ेहन में रहेगा.
 
ठीक है तो फिर मैं चलता हूं आपके नलके में ताकि जब आप नलका घुमाएं तो मैं बाहर आ सकूं और आपकी जरुरत को पूरा कर सकूं.


आपका दोस्त,
पानी