सोमवार, मई 23, 2011

सरकारी गरीब की खोज( पार्ट -1)


पटना के अपने आफिस में अभी पहूंच कर फेसबुक खोला ही था कि हमारे दिल्ली आफिस से फोन आया. जब फोन आया तो मुझे उठाना ही था सो मैंने उठाया और जैसे सभी फोन उठाते ही “हैलो” से शुरुआत करते हैं वैसे मैंने भी हौले से हैलिया दिया.

दिल्ली आफिस: सुनिए……अंग्रेजी में बीपीएल के उपर एक स्टोरी जा रहे है तो उसके लिए पटना से एक केस स्टडी चाहिए. हो जाएगा न?

मैं (पटना आफिस से): किस तरह का?

दि०आ०: कुछ दिन पहले  ये तय हुआ है कि शहरी क्षेत्र में रहने वाला जो व्यक्ति रोजाना 20 रुपय से ज्यादा खर्च करेगा वो गरीबी रेखा से उपर माना जाएगा. ग्रामीण क्षेत्र के लिए 15 रुपय रोजाना खर्च करने की सीमा तय की गई है. आपको एक गरीब खोजना है और उससे पूछना है कि अगर उसे एक दिन में बीस रुपय खर्च करने हो तो वो क्या करेगा? मामला समझ में आ गया न?  एक बात और….जिससे भी बात करेंगे उसकी एक हाई रेजुलेशन फोटो भी चाहिए.

मैं: हां…..हो जाएगा. ( मन में चल रहा था कितना आसान काम है. बिल्डिंग से नीचे उतरते हीं बहुत से गरीब मिल जाएंगे.)

दि० आ०: ठीक है फिर भेजिए…….आज शाम तक ही चाहिए.

 मैं: हो जाएगा…….भेजता हूं, शाम तक.

फोन कट गया. मैं गरीब खोजने की जुगत में लग गया. इस दौरान और बहुत कुछ हुआ लेकिन उसे बताने बैठूंगा तो बहुत लिखना पड़ेगा और ज्यादा लिखना अपन को पंसंद नही. मुंह से चाहे जितना बकवा लो. लिखने में नानी याद आने लगती है मेरी.

इसलिए थोड़ा जम्प मारते हुए आपको सीधे बिल्डिंग से सड़क पे ले चलता हूं.

सड़क पे बहुत से रिक्शे, ठेले वाले सर्र-सर्र भागती गाडियों के बीच रेंग रहे थे. कुछ लोग पेड़ की छांव में रिक्शे की पीछे वाली सीट पर दुबके अउंघा रहे थे.

मैं इस सोंच से दुबला हुआ जा रहा था कि किसे रोकूं. जो सवारी लेकर जा रहा है वो रुकेगा नहीं. जो सोने की कोशिश कर रहा है उसे अपने पत्रकारिय काम के लिए उठा देना ठीक नहीं. फिर धेयान आया कि जो खाली हो और जगा हो उसे पकड़ा जाए. सो एक ऐसा रिक्शा वाला मिल ही गया. मैं उसके पास गया. बोला, “मेरा नाम विकास है. आपका क्या नाम है?”

रिक्शा वाले भाई ने मुझे उपर से नीचे तक एक्सरे किया. उसके आंख का कैमरा मेरे पेट के पास लटके बैग तक आकर रुक गया. वहीं देखते हुए बोला, “ नाम से का मतलब. कहां चलना है ये बताइए.”

“जाना नहीं है. आपसे बात करनी है. पत्रकार हूं.” मैंने कहा.

कान पे हांथ रखते हुए उसने ऐसे पूछा जैसे उसे सुनाई न दिया हो. लेकिन माजरा कुछ और था सो मैंने उसे सफाई दी, “ अखबार में लिखता हूं. आपसे कुछ बतियाना है”

 अबकी वो समझ गया. “बताइए का कहना-सुनना है?”

“आपका लाल कार्ड बना है” मैंने पूछा.

बगैर एक पल बिताए उसने कहा, “ नहीं बना है.”

“काहे नहीं बना है’ मैं बोला.

“का करना है आपको….. ये न बताइए. हमरा लाल कार्ड बना चाहे न बना आपको का मतलब है उससे?” थोड़ा तमतमा कर बोला.

मैंने मुस्कुराते हुए फिर कहा, “बताइए न….. लिखना है कि काहे नहीं बना?”

“का हो जाएगा आपके लिखने से. बही न होगा जो मुखिया जी चाहेगा( राज्य का नहीं, उसके पंचायत का). ऊ चाहता है कि हम कार्ड बनवाने के लिए उसके आगे-पीछे करें . हमसे ई न होगा. हम अपना बाप का नज़ायज सुनवे नहीं करते हैं. ऊ मुखिया है तो का हुआ. कौनो लाट है का.”

वो थोड़ा ज्यादा ही गुस्से में आ गया. वैसे भी यह गरीब मेरे काम का नहीं था. मुझे तो सरकारी मायता वाला गरीब चाहिए था. ऐसा गरीब जिसे सरकार ने गरीबी रेखा के नीचे माना हो. सो मैंने इस बातचीत को यहीं पे लपेट लिया.( पत्रकारिय गुण भी तो यही है न. जहां स्टोरी नहीं बन रही वहां समय गंवाना बुरबकई है.)

नोट: पाठक( दो-चार जो भी हों.)  हिज्जे की गलतियों पर धेयान न दें. यह गलती यहां थोक में मिलेगी.

3 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत बढ़िया!

मनोज कुमार ने कहा…

लाल-पीला कार्ड से राजनीति तो चल सकती है किसी रिक्शे वाले की ज़िन्दगी नहीं। पहले तो खर्चने के लिए दस-बीस तो कमाना होगा ना।
बहुत ही सुंदर रिपोर्ट।

मनरागी ने कहा…

तथ्यात्मक भूल यह है कि योजना आयोग का यह फ़ैसला आज नहीं कुछ दिन पहले ही आया था.