शुक्रवार, मई 18, 2012

उन्होंने बात बढ़ाई…आप भी तो कुछ हिम्मत करिए!



(इस विषय पे लेख दो महीने बाद क्यों?
जवाब:-आज एक बैठकी के दौरान हरिवंश जीके इसी लेख की बात निकल चली. सामने से कहा गया-आखिर उन्होंने ने ही क्यों लिखा? इस सवाल के बाद करीब-करीब दो घंटे तक बात होती रही. वहीं से लौट के मैंने अपने मन की बात लिखने की कोशिश की.)

मार्च महीने के किसी तारीख को प्रेस काउंसिल के चेयरमैन मार्कंडेय काटजू पटना आए थे. उन्होंने एक सभा को संबोधित करते हुए कहा था-बिहार में मीडिया आज़ाद नहीं है, ऐसा उन्होंने सुना है. काटजू के इस बयान से बहुतेरों की सहमति है. मेरी भी. वाकई बिहारी मीडिया में कुछ तो गड़बड़ है. इस गड़बड़ी के कई कारक हैं. इनके बारे में चर्चा फिर कभी.

प्रेस काउंसिल चेयरमैन के इस बयान को अगले दिन सभी अखबारों ने दो-चार कॉलम की खबर में समेट दिया. लगा था कि यह मामला भी दूसरे मामलों की तरह खो जाएगा. लेकिन प्रभात खबर के प्रधान संपादकहरिवंश जीने इस बयान को आधार बना के अपने अखबार में दो पेज का एक लेख लिख दिया. लेख, प्रभात खबर के 27 मार्च के अंक में प्रकाशित हुआ. एक बार फिर से काटजू के बयान और बिहार में मीडिया की हालत पे चर्चा शुरू हुई.

काटजू के बयान के बाद बिहार के सभी अखबारों(प्रभात खबर को छोड़ के)के बड़े-बड़े संपादक चुप रहे. हरिवंश जी को छोड़कर किसी संपादक ने अपना पक्ष सार्वजनिक तौर पे नहीं रखा. किसी संपादक ने इस मसले को (प्रेस काउंसिल चेयरमैन के बयान) बहस का मुद्दा नहीं बनाया. सब ने इग्नोर किया. लेकिन हरिवंश जी ने, पूरी ईमानदारी से अपना पक्ष, अपने मंच(एक अखबार के संपादक के लिए अपनी बात कहने का सही मंच उसका अखबार ही हो सकता है.) से पाठकों के सामने रखा. चाहते तो वो भी चुप रहते. लेकिन उनहोंने चुप्पी ओढ़ने के बदले लिखा और खुल के लिखा. अपनी बात लेख(वो किसी मंच से भाषण दे कर भी अपनी बात कह सकते थे) के रूप में रखा. क्योंकि छपे हुए शब्द हमेशा जिन्दा रहते हैं. दो पन्ने के आलेख में हरिवंश जी ने अपना पक्ष रखा. अपने अखबार का पक्ष रखा. पक्ष में तर्क दिए.

कायदे से होना यह चाहिए था कि खुल के अपनी बात सामने रखने के लिए हरिवंश जी की तारीफ होनी चाहिए थी और एक बहस आरंभ होनी चाहिए थी. लेख में लिखी गईं बातों और दिए गए तर्कों से असमति हो सकती है और होनी भी चाहिए. लेकिन असहमति रखने वालों को अपनी बात और अपने तर्कों को संपादक तक पहूंचाना चाहिए था. किसी भी माध्यम से. पत्र, ईमेल या फोन के माध्यम से(हरिवंश जी हर माध्यम से जुड़े हैं और सहज उपलब्ध होते हैं. उनके पास जो भी जाता है उसे देखते-पढ़ते है. कायदे का होने पर अखबार में जगह भी देते हैं.)

लेकिन तो हरिवंश जी की तारीफ हुई और हीं किसी ने उनके लेख के जवाब में कुछ तर्कसंगत लिखा. बल्कि इस साहसी लेख के बाद हुआ वो जो नहीं होना चाहिए था.

भाई लोगों ने इस गंभीर मसले को बेकार की बतकुच्चन तक समेट दिया. चाय की दुकान पे चाय की चुसकी लेते हुए. पान कल्ले में दबाते हुए या सिगरेट सुलगाते हुए बातें होती रहीं. इन बातों का स्तर काफी घटीया रहा. कुछ लोग संपादक को चौक-चौराहों पर काफि बुरा-भला भी कह जाते हैं. लेकिन वो यह भुल जाते हैं कि ऐसा कहने और बोलने का स्पेस भी(लेख लिखकर) हरिवंश जी ने ही दिया है.

चौक-चौराहों पे बतकही में उलझे रहने वाले सुधी जनों को चाहिए था कि वो उस लेख को पूरा पढ़ते(मेरा विश्वास है कि पटना के ज्यादातर सुधी पत्रकारों ने या बुद्धिजिवियों ने लेख नहीं पढ़ा होगा) और फिर अपनी बात, कायदे से संपादक तक पहूंचाते. एक मर्यादिय भाषा में.
लेकिन आज मार्च को बीते हुए दो महीने हो चुका है. किसी ने. किसी भी मंच से कुछ नहीं लिखा हरिवंश जी की बातों से असहमति जताते हुए. और एक सार्थक बहस होते-होते रह गई. इसके लिए दोषी कौन? प्रभात खबर के संपादक, जिन्होंने पाठकों के सामने अपना पक्ष रखा और बहस की जमीन तैयार की या फिर राज्य की बौद्धिक जमात?

अपनी असहमति को जाहिर करने का. अपनी बात कहने की हिम्मत होनी चाहिए. इससे बचते हुए. पीठ पीछे कुछ से कुछ कहने और अंदाजा लगाने का कोई फायदा नहीं है. इससे कुछ हासिल नहीं होता. हमे बहस के मैदान में आना चाहिए. किसी भी मुद्दे पे. हरिवंश जी के लिखे पर जिन्हें भी आपत्ति है वो खुल के आएं. बोलें. एक बहस की शुरूआत करें. बेकार में आरोप लगाते रहने का कोई फायदा नहीं. बल्कि जो भी बौद्धिक जन ऐसा कर रहे हैं वो बौने साबित हो रहे हैं. क्योंकि किसी के पीठ पीछे उसके बारे में कुछ से कुछ कहते रहना हमारे बौनेपन को ही दिखाता है. तो बौना होने से बचिए. हिम्मत दिखाइए. दो महीने बाद ही सही एक हेल्थी डीवेट को शुरू करिए. अभी भी देरी नहीं हुई है.

4 टिप्‍पणियां:

मनरागी ने कहा…

तो हरिवंश जी की बात मान ली जाए और ये समझ लिया जाए कि बिहार में मीडिया स्वतंत्र है? एक तो सर्वज्ञात है कि बिहार की मीडिया अघोषित तानाशाही के दौर में है. ऐसे में जो गिने-चुने विश्वसनीय नाम हैं उनका ढीठ होना तकलीफदेह है. जैसा कि हरिवंश कहते हैं कि क्या मीडिया को तभी स्वतंत्र माना जाएगा जब चाहे जाति-संहार हो न हो, बलात्कार हो न हो, गुंडागर्दी हो न हो, उसकी खबर ज़रूर छापी जाए? ये भी हरिवंश उस दिन के अखबार में लिखते हैं जिस दिन उसी अखबार के एक पेज पर परिजनों के सामने गैंगरेप की एक घटना को ढाई सौ शब्दों के कॉलम में दफना दिया जाता है. ये हरिवंश और योगेन्द्र यादव ही थे जिनके नीतीश के साथ खड़े होने पर हमने संदेह नहीं किया था... आज अपने उस विश्वास पर संदेह होने लगा है. बाकी अखबार कम से कम चुप हैं, वे तो चोरी के साथ सीनाजोरी भी कर रहे हैं. हरिवंश अकेले नीतीश के बारे में खुलकर इसलिए लिख रहे हैं क्यूंकि उनके पास लिखने (क्यूंकि वे प्रो ही लिखते हैं) का अधिकार है. लिखा था. डॉक्टर रेहान घनी ने भी लिखा था सरकार, सत्ता और धर्म के बारे में. वे भी उर्दू डेली 'पिंडर' के मुख्य संपादक ही थे. पहले उनका कॉलम 'दो टूक' बंद कर दिया गया. फिर उनका डिमोशन हो गया. आजिज आकर उन्होंने इस्तीफा दिया. उनका मैं सम्मान करता हूं. उन्होंने बहुत से लेख लिखे हैं. पठनीय, सोचनीय... लेकिन ये, माफ कीजिएगा, स्वीकार्य नहीं है.

विकास कुमार ने कहा…

बिल्कुल इसमे कोई शक नहीं कि बिहार की मीडिया के साथ कुछ तो दिक्कत है. और जो हर दिन की अखबार में दिखता है उसे मान लेने का कोई मतलब ही नहीं है. चाहे हरिवंश जी कहें या कोई दूसरा देव पुरुष.

लेकिन यहां मैं यह साफ कर देना चाहता हूं कि हरिवंश जी ने कहीं यह नहीं कहा या लिखा कि वो ऐसा कह रहे हैं और इसे मान लेना चाहिए. सब को सहमत हो जाना चाहिए. वो कह ही नहीं सकते. ये उनका स्वभाव ही नहीं है. उनकी पत्रकारिता और शैली बहस को जन्म देने की है. बहस को निपटा देने की नहीं.

अपनी इसी शैली की(बहस चलाने वाली) वजह से उन्होंने काटजू के बयान पे अपनी बात रखी होगी. दूसरे लोग जहां चुप रहे वो सामने आए. अपनी बातों और अपने तर्कों के साथ. इसे चोरी और सीनाजोरी कह देना कतई सही नहीं होगा.

इसे इस तरह से देखा जाना चाहिए कि जब एक पूर्वन्यायाधीश और प्रेस काउंसिल का चेयरमैन एक खुले सभा में बिहार की मीडिया के बारे में एक राय
रख के जाता है या कहें तो संपादकों की कार्यशौली पे आरोप लगा के जाता है(आरोप सही प्रतित होते हैं, इसमे कोई शक नहीं)तो फिर संपादकों के लिए अपनी बात रखनी हो तो वो कहां जाए? किस मंच से अपनी बात रखे? मेरे विचार से एक संपादक के लिए अपनी बात रखने का सही मंच अखबार का संपादकीय पन्ना ही है. हरिवंश जी ने अपने उस मंच का इस्तेमाल किया. अपनी बात रखी. खुल के. बजाए इसकी चिन्ता किए कि उनके इस लेख को "चोरी और सीनाजोरी" भी कहा जा सकता है.
जाहिर है कि उस लेख में वो अपने पत्र और दूसरे अखबारों का बचाव कर रहे हैं. वो करेंगे भी क्योंकि वो अपने उपर लगे आरोप का जवाब दे रहे हैं. लेकिन खुलेआम अपनी बातों के साथ आने के लिए बहुत साहस की जरुरत होती है और यहां यह साहस हरिवंश को छोड़ के दूसरे संपादकों ने नहीं दिखाई.

दूसरी बात कि अगर काट्जू के बयान के बाद दूसरे सभी संपादक चुप थे तो हरिवंश जी को भी चुप ही रहना चाहिए था इससे सहमति का कोई सवाल ही नहीं है.-अव्वल तो चुप रहना. नजरे बचा के निकल जाना कोई रास्ता है नहीं. हर आरोप पे बात होनी चाहिए. चुपचोरी से नहीं. खुलेआम. बहस होनी चाहिए.पक्ष-विपक्ष में लिखा जाना चाहिए.खुब लिखा जाना चाहिए. क्योंकि जब बहुत सी बातें आपस में टकरातीं हैं तो उससे कुछ हल जैसा निकलता है. अगर "किसी हल" के निकलने की गुंजाईश नहीं हो तो भी बातें और बहसें होनी ही चाहिए.

सोंचने की बात है कि जैसा कि काटजू ने कहा और चले गए. अगर हरिवंश जी ने उसके बाद कुछ नहीं लिखा होता(जो कि जरुरी नहीं था क्योंकि दुसरे संपादकों ने नहीं लिखा तो उनके उपर कोई पहाड़ नहीं टुट पड़ा. हरिवंश जी भी नहीं लिखते तो उनकी संपादकी खतरे में नहीं पड़ जाती)तो आज जितनी भी थोड़ी-बहुत बातें इस बारे में हो जा रही हैं वो नहीं होतीं(बल्कि मेरे हिसाब से होना यह चाहिए था कि हरिवंश जी के लेख के बाद कई लेख उनके जवाब में लिखा जाना चाहिए था. उनकी बातों और तर्कों से असहमति जताते हुए. उनकी बातों को खारिज करते हुए. इसकी मुझे उम्मीद भी थी राज्य की बौद्धिक जमात से लेकिन ऐसा नहीं हुआ.फिर निराशा हुई.)



दूसरी बात, पिंडर का मामला मेरी जानकारी में भी है. यह बहुत ही गलत हुआ.

मनरागी ने कहा…

पिंडर वाले मामले पर फिर वे चुप क्यूं रहे... बहस को जन्म देने का ये कैसा आधार है... कि आप मीडिया को सही सरकार को सही ठहराने का खेल खेलने लगें... क्या आपने नहीं पढ़ा है वह लेख? और अगर लेख पढकर भी आप श्रद्धा से नहाए हुए हैं तो मुझे ये कहते हुए दुःख होगा कि आप उन्हें लेकर बायस्ड हैं... यह अंध-श्रद्धा है.

विकास कुमार ने कहा…

"और अगर लेख पढकर भी आप श्रद्धा से नहाए हुए हैं तो मुझे ये कहते हुए दुःख होगा कि आप उन्हें लेकर बायस्ड हैं... यह अंध-श्रद्धा है."

मनरागी साहब...सारी बातें, सारे तर्क और बहस करने का मिजाज यहीं आ कर खत्म हो जाता है जब कोई आपको और आपके विचारों को "अंध-श्रद्धा" कह के निकल ले. जब सामने वाले ने आपके मन और मिजाज के बारे में तुगलकी फरमान सुना ही दिया तो फिर कहने को क्या बचता है.

इस वजह से इस मुद्दे से जुड़े हज़ार तर्क होने के बाद भी अब उसके बारे में बात करने का कोई फायदा नहीं है. हालाकि ऐसा लगा कि सरकार फैसला सुनाने की जल्दी में थे सो यह भुल गए कि मैंने कहीं यह नहीं कहा कि हरिवंश जी ने उस लेख में जो लिखा वो अकाट्य है. ब्रम्हा के लिखे शब्द हैं और वो(हरिवंश जी) बिल्कुल सही हैं.

खैर, आपने लिखने का मिज़ाज पहले से बना लिया होगा सो लिख के निकल लिए या फिर आपको जल्दी रही होगी किसी बात की.

आखरी बात, मुझे हरिवंश जी अच्छे लगते हैं. हिन्दी मीडिया में. अखबारी जगत में. प्रभाष जी के बाद सबसे समझदार और स्वभाव से नरम और सामने वाले को पूरा सम्मान देने वाले लगते हैं(कभी मिलेंगे तो समझ जाएंगे. सो उनके प्रति श्रधा तो है मेरे मन में. और हो भी क्यों न. श्रधा होने के हज़ार कारण है. हिन्दी पत्रकारिता में आप ही कोई ऐसा नाम बताएं जिसने एक समय में पेड न्यूज के खिलाफ ऐसा मुहिम चलाया और अपने ही अखबार में सूचना छापी कि अगर मेरा रिपोर्टर आपसे पैसे मांगता है तो आप सीधे पलां नंबर पर फोन करें और सीधे प्रधान संपादक को बताएं. आज के समय के किसी एक ऐसे संपादक नाम बतला दीजिए जिसे गुमला से एक पान दुकान वाला भी फोन करता है.और बतियाता है. उनका हालचाल पुछता है और वो भी उससे आराम से बतियाते हुए, उसके बाल-बच्चों के बारे में पुछते हैं. उसकी कुशलक्षेम पुछते हैं. सो आदर और सम्मान किसी एक चीज से पैदा नहीं होती. और न ही एक किसी घटना से आदर या सम्मान कह हो जाता है. बाकि वो संपादक हैं. लिखते हैं. जरुरी नहीं कि हर विषय से मेरी उनसे सहमति हो ही लेकिन उनके लिए मन में सम्मान और आदर तो है ही.और रहेगा ही.

लेकिन अंध-श्रधा होती तो मैं सचिन, सलमान या अन्ना समर्थकों की तरह अपनी बात रखता.-चाहे कुछ भी हो जाए, सलमान सही हैं. सचिन भगवान हैं और अन्ना से महान कोई पैदा ही नहीं हुआ इस धरती पे.