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मंगलवार, सितंबर 07, 2010

आपको हुई असुविधा के लिए खेद है.....!


करीब दो घंटे से किसी भी ए.सी. बस के न आने से परेशान एक दिल्लीवासी ने डीटीसी मुख्यालय में फोन घुमा दिया.

करीब दो रिंग के बाद दुसरी तरफ से एक भले मानस की आवाज आई, “डीटीसी हेल्पलाईन में आपका स्वागत है…बताइए आपकी क्या समस्या है?”

फोन करने वाले व्यक्ति को इस नंबर से इतनी सुसज्जित हिन्दी की उम्मीद नहीं थी. सो थोड़ा घबरा गया. फोन को कान से हटा कर देखा फिर थोड़ा मुस्काते हुए बोला, “भाई साहब, क्या कर रहे हैं आपलोग? सुबह का टाईम है. आफिस जाना है. एक भी बस नहीं आई पिछले दो घंटे से. आखिर, चक्कर क्या है?”

व्यक्ति ने अपनी सारी भड़ास निकालते हुए एक हीं सांस में पूरी बात कह डाली. 

“सर, आपको हुई असुविधा के लिए हमे खेद है!” दूसरी तरफ बैठे डीटीसी के अधिकारी ने कहा.
बस स्टॉप पर घंटे से खेड़े व्यक्ति को अब यह सुसज्जित शब्दवाण की तरह लग रहे थे.

अधिकारी की बात बीच में काटते हुए बोला, “खेद-वेद की छोडिये….ये बताइए कि ए.सी. बस कब तक आ रही है?”
 दूसरी तरफ से आवाज आई, “ए.सी. बस अगले कुछ दिनों तक नहीं आएगी. असुविधा के लिए खेद है!” 
अबकी, फोन करने वाले ने कड़ती आवाज में पूछा, “क्यों? क्यों नहीं आएगी भला?”

डिटीसी हेल्पलाईन वाले ने बिल्कुल नम्रता से जवाब दिया, “सर, अगामी गेम के लिए गाड़ियों को अभी से बुक कर लिया गया है. आपको कुछ दिन तक ब्लू लाईन में सवारी करनी होगी. गेम के बाद हम आपको पूरी सेवा दे पाएंगे. तब तक हुई असुविधा के लिए हमे खेद है…...! आपका दिन शुभ हो..!

इससे पहले की फोन करने वाला कुछ बोलता. दुसरी तरफ से टीं…टीं…टीं की आवाज आने लगी.

बुधवार, अगस्त 25, 2010

हे कलमाड़ी, आप न घबराना.

सुरेश कलमाड़ी जी,
नमस्ते,
वैसे तो पत्र के शुरु में हालचाल पूछा जाता है लेकिन मैं ऐसा करके जले पर नमक छिड़कने का काम नहीं करूंगा. हर रोज जानकारी मिलती रहती है कि कैसे आप जैसा एक खांटी खेल प्रेमी और देश की इज़्ज़त का सच्चा रखवाला परेशान किया जा रहा है.

रोज, सुबह की अखबार खोलते हीं सबसे पहले आपकी खैरियत जानने के लिए गेम से जुड़ी खबरों की तरफ आंखे दौड़ाता हूं. लेकिन हर दिन निराशा ही हाथ लगती है. रोज कोई कोई आपको बुरा-भला बोल कर निकल जाता है. एक दो दिन पहले तो हद ही हो गई. शांत चित्त और प्रसन्न मुख वाले प्रधानमंत्री जी ने भी आपको हड़का दिया. ज्यादातर मौके पर केवल मुस्कान बिखेरकर निकल जाने वाले अपने सरदार जी से भी चुप नहीं रहा गया

मुझे समझ नहीं रहा कि आपने ऐसा क्या कर दिया है जो हर कोई आपकी तरफ हुडकी मार रहा है. मुझे क्या, ज्यादातर लोगों को नहीं पता होगा कि हुआ क्या है. बस बोलना है सो बोले जा रहे हैं.
कोई सामने कर बताए तो कि आपने किया क्या है? आखिर दोष क्या है?

अगर आपकी कोई गलती है तो वो बस इतनी कि आपने इस भुक्खड़ और हमेशा ही गरीबी में रहने वाले देश के लिए इतने बड़े गेम की मेजबानी हासिल की

आपने तो अच्छा ही सोचा था. आपको क्या पता था कि यहां के लोग इंदिरा जी के काल में भी गरीब थे और आज मनमोहन की सरकार में भी हैं. वैसे ज्यादातर नेता आपको इस बात के लिए नहीं कोस रहे कि आपने इस गेम की मेजबानी क्यों ली और इतना पैसा एक गेम के लिए क्यों खर्चा जा रहा है. इन्हें भी पता है कि इस देश से गरीबी अब तक गई है और आगे कभी जाएगी. यहां गरीब के अमीर बनने का एक ही आसान रास्ता है. सबको नेता बनना पड़ेगा. केवल नेता से काम नहीं चलेगा. मंत्री बनना पड़ेगा. जो गरीब लोग वक्त रहते नेतागिरी में गए उनका आज देखिए. दस-पांच लखपति को तो अपने अगल-बगल रखते हैं

खैर, मैं मुद्दे से भटक गया था. माफ करिएगा! इस देश में सबको ज्यादा बोलने की आदत है. क्या नेता, क्या जनता और क्या पत्रकार. सबके-सब अति बोलक्कड़ होते हैं. बड़े बुजुर्ग कह गए हैं कि ज्यादा बोलने से काम खराब होता है. हर कोई आपको बोल रहा है, झाड़ रहा है और इससब में खेल की तैयारी खाक होगी बस भसड़ हो रहा है. आप ऐसा मत होने दीजिए. जिस मन और हिम्मत से आपने गेम का आयोजन दुनियां से छीना था उसी लगन से लगे रहिए

अगर ध्यान लगाने में दिक्कत हो रही हो तो एक-दिन के लिए बाबा रामदेव जी के यहां से हो आइए. बड़ा अच्छा ध्यान लगवाते हैं. वैसे उन्हें भी आपकी तरह देश की इज़्ज़त बहुत प्यारी है. तभी तो बाबागिरी छोड़कर राजनीति के अखाड़े में लंगोट बांधने के लिये तैयार हैं. रामदेव जी आपको निराश नहीं करेंगे वो हर संभव आपकी मदद करेंगे

हंसी तो तब आती है जब घुसखोड़ी, घपलों और घोटालों के दम पर खड़े हमारे माननीय जनसेवक आपको गेम में हो रही भ्रष्टाचार के लिए गरियाते हैं. क्या जमाना गया है? जिन पर घोटालों के अनगिनत मामले लदे हैं, जो गरीबों के पैसे से पार्क और पार्कों में अपनी आदमक़द मुर्तियां लगवा रहे हैं वही लोग आप पर निशाना साध रहे हैं. जो राहत का सामान और कचरा तक कोंच कर ठाठ से बैठे हैं वही नेता आप पर गरीबों के पैसे लुटाने का आरोप लगा रहे हैं

मैं कहता हूं कि अगर आप एकाध करोड़ लुटा भी रहे हैं या कुछ लाख-वाख इधर-उधर हो भी जाता है तो इसमे गलत क्या है. इतना बड़ा आयोज़न है तो हल्का-फुल्का इधर-उधर तो होगा ही. इसमे कौन सी नई बात है!

सो कलमाड़ी जी, मैं आपको कहना चाहता हूं कि आप इन गीदड़ भवकियों से हड़किएगा मत. ये सब तो चलता रहेगा. एक कहावत है हमारे इलाके मेंहाथी चले बाज़ार, कुत्ता भौंके हज़ार”. बस समझिए ऐसा ही कुछ हो रहा है. एक बार खेल खत्म हुआ कि सबकुछ हज़म हो जाएगा

जहां तक बात हो रही है जांच की तो उसके बारे में आपसे क्या कहना. हमारे यहां के जांच तो बस चलते हैं, और चलते हैंबस चलते ही जाते हैं. इनका कोई नतीज़ा नहीं निकलता. वैसे ये-सब तो आप मुझसे बेहतर ही जानते हैं. आपकी दाढ़ी के बाल तो पक चुके हैं ये सब देखते-समझते. सो आप डरिएगा नहीं. घबराइएगा नहीं. टूटिएगा नहीं. बस अपने मिशन में लगे रहिए. मिशन कॉमनवेल्थ गेम

हां चलते-चलते एक जरुरी बात. इनसब झमेलों से थोड़ा समय निकालकर अपने परिवार को भी दीजिए क्योंकि बुरे वक्त में आपका परिवार ही आपके साथ रहेगा. वैसे खुदा करे कि आप जैसे सच्चे सिपाही को कभी कोई बुरा टाईम देखना पड़े

आपकी सलामती और लम्बी उमर की दुआ के साथ इस पत्र को खत्म करता हूं. विशेष बातें किसी प्रेस बैठक में मिलने पर.
आपके जज़्बे को सलाम!!
राष्ट्रमंडल खेल की जय हो!! 
 

बुधवार, फ़रवरी 24, 2010

आम आदमी, आम आदमी और केवल आम आदमी!!

आम जनता के द्वारा निर्वाचित और देश की आम सी दिखने वाली रेल मंत्री ने साल 2010 का रेल बजट पेश कर दिया.


जैसे हर नेता या कहें तो जनसेवक चुनाव के वक्त आम जनता के नाम की माला जपता है. वैसे ही रेल मंत्री और वित्त मंत्री बजट पेश करते वक्त आम जनता के नाम का माला फेरते दिखते हैं. जब भी कोई रेल या वित्त मंत्री अपना बजट भाषण पढ़ता है तो सबसे ज्यादा इसी शब्द “आम जनता” को दुहराता है.

चाहे बजट में इस वर्ग के लिए कुछ हो या न हो लेकिन बात आम जनता की ही होती है. पीछे जब लालू महाराज ने एक फुल एसी ट्रेन चलवाई तो उसे भी आम जनाता के लिए बताया. बाद में वह ट्रेन मझोले अमीरों के लिए चलती दिखने लगी.

लेकिन इसके लिए उस टाइम के रेल मंत्री या उनके अफसरों को तो दोष नहीं ही दिया जा सकता. उन्होंने तो सोचा होगा कि ट्रेन का नाम गरीब रथ है तो गरीब ही चढे़गे.

इस फैसले की ही तर्ज पर लालू ने कई और अहम फैसले लिए थे और उसे आम आदामी के लिए गया बताया था. लेकिन उसके बाद समय बदला और लालू जी की कुर्सी पर ममता जी बैठ गईं. अब ममता जी आम आदमी के लिए फैसलें कर रही हैं. मैं इसकी गारंटी दे सकता हूं कि इनके द्वारा लिया गया हर फैसला भी आम आदमी के लिए ही होगा. ये दीगर है कि उस फैसले से आम आदमी का कुछ भला होता भी है या नहीं.