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सोमवार, नवंबर 07, 2011

यात्रा के निहितार्थ...

आगामी चौबीस नवबंर को नीतिश कुमार के नेतृत्व वाली मौजूदा राज्य सरकार के कार्यकाल का एक साल पूरा हो जाएगा. लेकिन सरकार द्वारा एक साल पूरा किए जाने की चर्चा कहीं नहीं दिखेगी. क्योंकि इसी माह की नौ तारीख को नीतिश बाबू “सेवा यात्रा” पे निकल रहे हैं. जाहिर सी बात है कि जब मुख्यमंत्री राज्य के दौड़े पे है  तो मीडिया उस यात्रा को ही कवर करने में अपना ज्यादा समय और पन्ना खर्चेगा. यात्रा को छोड़ के कौन इस तरफ ध्यान देना चाहेगा कि बीते एक साल में मौजूदा सरकार ने राज्य की जनता के लिए क्या-क्या किया? कौन-कौन से निवेश इस एक साल में राज्य की जमीन पे उतड़े.?  आमजन को प्रभावित करने वाले कौन-कौन से फैसले सरकार ने लिए? नीतिश के सुशासन राज्य में जो बियाडा जमीन घोटाले की बात सामने आई उस केस में क्या प्रगति हुई? फारबिसगंज में जो गोली चली और जो पुलिसिया तांडव हुआ उसके लिए चार माह बाद  भी किसी को अभी तक सजा क्यों नहीं मिली?

इसमे कोई शक नहीं कि नीतिश ने राज्य के पिछले आरजेडी शासन से बेहतर शासन व्यवस्था स्थापित करने की कोशिश की है और कुछ मामलों में इनकी सरकार ने सफलता भी हासिल की है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं हुआ कि नीतिश सर्वेसर्वा हो गए. और इनकी सरकार में कोई खामी या कमी है ही नहीं. राज्य की मीडिया द्वारा अभी तो सरकार की कमियों को छुपाया जा रहा है लेकिन यह स्थिति ज्यादा दिनों तक नहीं रह सकती है. यह बात नीतिश कुमार और उनके सहयोगियों को समझ लेनी चाहिए. 

खैर, अभी नवबंर का महीना है और जैसा कि मैंने उपर ही कहा कि इस महीने मीडिया में ज्यादातर बातें नीतिश कुमार की “सेवा यात्रा” की ही होंगी तो क्यों न हम भी यहां “सेवा यात्रा” और इसी के साथ शुरु हो रहीं  कुछ दूसरी यात्राओं तक अपना फोकस रखें. जी हां…इस महीने नीतिश ही अकेले यात्रा पे नहीं होंगे. राज्य की राजनीति में अपने लिए जगह की तलाश में गांव-गांव घुमने लालू यादव भी निकलेंगे और सबसे मजेदार बात- नीतिश सरकार की सहयोगी पार्टी बीजेपी के राज्य अध्यक्ष डॉ. सी.पी.ठाकुर  भी भ्रष्टाचार के खिलाफ अलख जगाने की चाहत लिए पूरे राज्य की यात्रा पर संभवत: इसी महीने में निकलेंगे. सी.पी. ठाकुर अपने यात्रा की शुरूआत कहां से करेंगे और किस तारीख को करेंगे इसकी घोषणा तो अभी नहीं हुई है लेकिन इतना तय मानिए कि इनकी यात्रा नीतिश  की “सेवा यात्रा”  के कुछेक दिन आगे ही शुरू होगी.

जिस दिन नीतिश अपनी “सेवा यात्रा” पश्चिम चंपरण से शुरु करेंगे ठीक उसी दिन आरजेडी सुप्रिमो लालू यादव गया से अपनी यात्रा ’गांव-गांव” के लिए रवाना होगें. नीतिश अपनी यात्रा में गांव-गवई का औचक निरिक्षण करेंगे (निरिक्षण कितना औचक होगा इसका तो उपर वाला ही  मालिक है) और देहातों में चल रही योजनाओं के बारे में जानकारी लेंगे. ऐसा दावा है मुख्यमंत्री के दफतर का. लेकिन कौन बुद्दू नहीं जानता कि इन यात्राओं का मतलब होता है लोगों के साथ सरकारी खर्चे पे जनसंपर्क. जिसका फायदा यात्रा करने वाले को अगामी चुनाव में मिलना तय माना जाता  है.

नीतिश की यात्रा के लिए पूरा सरकारी अमला है तो दूसरी तरफ लालू के लिए केवल उनके कार्यकर्ता जिनकी संख्या भी अब काफी कम हो गई है. नीतिश के लिए अपनी यात्रा में बोलने के लिए काफी कुछ है. पता नहीं लालू अपनी यात्रा में राज्य की जनता से क्या कह रहे हैं. क्योंकि फिलहाल ज्यादातर मौकों पर वो खूद बोलते-बोलते भुल जाते हैं कि क्या कह रहे थे और आगे क्या कहना है. तब उनके अगल-बगल में बैठे लोग धीरे से उनके कान में फूंक मारते और फिर लालू बोलने लगते. लेकिन नीतिश के साथ ऐसा नहीं है. वो किसी भी मंच पे बोलने के मामले में रत्ति भर भी नहीं चुकते. खूब बोलते हैं और चबा-चबा के बोलते हैं. यह नीतिश की वाकपटुता ही है कि उनके द्वारा राज्य में विकास के नाम पे कुछ सड़के ही मोटे तौड़ पे देखती हैं लेकिन वो सारी वाहवाही अपने नाम किए जा रहे हैं.

जैसा की लेख के शुरू में ही बताया गया कि नीतिश और लालू की यात्राओं के साथ एक यात्रा सी.पी. ठाकुर की भी है. बीजेपी की इस यात्रा का मतलब साफ है कि वो अब नीतिश को अकेले सारी वाह-वाही लेने देने के मूड में नहीं है. भगवा पार्टी पहले ही इस बात से खफा है कि नीतिश की पार्टी राज्य में हो रहे ज्यादातर विकास का लाभ लपक ले रही है और बीजेपी सहयोगी और प्रमुख पार्टी होने के बाद भी मुह ताकती रह जा रही है. कुछ हलकों में तो बीजेपी की इस यात्रा को आगामी लोकसभा के चुनाव में जेडीयू और बीजेपी में होने वाले लगवा की तैयारी से भी जोड़ के देखा जा रहा है. तैयारी हो भी क्यों न. राजनीति में कोई भी रिश्ता पर्मानेंट थोड़े न होता है. लेकिन बीजेपी द्वारा घोषित यह यात्रा हड़बड़ी में घोषित यात्रा लगती है. किसी दूसरी यात्रा के बारे में सोंचना चाहिए था. अभी-अभी तो आडवाणी अपनी भ्रष्टाचार विरोधी यात्रा लेकर बिहार से गुजरे हैं तो फिर  से एक भ्रष्टाचार विरोधी यात्रा. फंडा कुछ जम नहीं रहा.

मतलब अगर दो टूक शब्दों में कहें तो नवंबर का महीना यात्रामय होगा लेकिन तीनों की तीनों यात्राएं करने वालों से राज्य की जनता को कुछ खास मिलेगा नहीं. क्योंकि तीनो यात्री इन यात्राओं से कुछ न कुछ पाने की आस लिए निकल रहे हैं. हां…नीतीश की यात्रा से राज्य की जनता का कुछ पैसा बरसात की पानी के तरह जरुर बह जाएगा.  नीतीश राज्य में बने रहने के लिए यात्रा पर हैं. लालू यात्रा के माध्यम से राज्य की सत्ता में लौटने का प्रवेश द्वार खोज रहे हैं और डॉ. ठाकुर अपनी यात्रा से नीतिश और जेडीयू को  एक प्राईवेट मैसेज  चाहते हैं कि अब बस.

मंगलवार, फ़रवरी 08, 2011

किसान हूं, सरकार नहीं.

मेरे खेत को उजाड़ दो,
घर को भी उखाड़ दो,
फिर अपने विकास का झंडा वहां गाड़ लो,

मैं कुछ नहीं कहूंगा,
कुछ नहीं करूंगा,
क्योंकि मुझे ज़मीन चीरना आता है,
सीना फाड़ना नहीं आता.

शनिवार, नवंबर 27, 2010

सपनों का बिहार.....!!

एक बिहारी होने के नाते इस बात की खुशी है कि आज हमारा राज्य कई मामलों और मसलों में देश को एक नई राह दिखा रहा है. आज बिहार मर्गदर्शक की भुमिका में है. राज्य की जनता को बिहारी होने का गर्व महसूस हो रहा है. 

लेकिन अभी भी राज्य में कई मसलों और मुद्दों पर बात होनी चाहिए. कुछ बदला है. बहुत कुछ बदलना बाकी है.पिछली सरकार ने अपना काम किया है. सड़कें बनी हैं. स्कूलों में बच्चों की संख्या बढ़ी है. गरीब-गुरबों के लिए सरकारी खजाने से पैसे आए. 

लेकिन क्या इतना भर ही काफी है. क्या केवल सरकार के जिम्मेवार होने और काम करने से एक बिहारी के “सपनों का बिहार” बन सकता है? नहीं…..ऐसा बिल्कुल नहीं है. 

अगर वाकई बिहार को एक बेहतर और कामयाब राज्य बनना है तो सरकार और जनता दोनों को कदमताल करते हुए चलना होगा. राज्य की आम जनता को भी सुन्दर बिहार के लिए खड़ा होना होगा. लड़ना होगा. 

अबतक हम यह कह रहे थे कि राज्य का शसन ही सो रहा है तो जनता क्या करे? लेकिन अब ऐसा नहीं है. हमसब ने दूबारा से उस सरकार और नेता में विश्वास जताया है जिसने राज्य की जनता में विकास की ललक पैदा की है. हमने, उस नेता को आगे किया है जिसमें राज्य की जनता को आगे बढ़ाने का हौसला है. हमने उस सरकार को दूबारा बनाने का फैसला किया है जिसके पास राज्य के विकास के लिए एक तय कार्यक्रम है. और इससे यही साबित होता है कि हमलोग विकास चाहते हैं.  सुख-शांति और रोजगार चाहते हैं. लेकिन हमारी ये चाहत केवल वोट देकर सरकार बनवा देने भर से पूरी नहीं होगी. 

हमे भी राज्य की जनता होने के नाते अपनी-अपनी ज़िम्मेदारी समझनी होगी.  हमारा जहां, जो काम है उसे ईमानदारी और लगन से करना होगा. तभी राज्य की तस्वीर असल में बदलनी शुरु होगी. और यह असली बदलाव होगा. इसी तरह से हमारे सपनों का बिहार खड़ा हो सकता है. इसका कोई शर्ट-कर्ट नहीं है. जब तक हम यानी एक आम बिहारी आलसी, भ्रष्टाचारी और घुसखोर बना रहेगा तब तक राज्य का सही मायने में विकास संभव ही नहीं है. 

हमे सरकार को  विश्वास दिलाना होगा कि आप पैसे भेजिए, योजनाएं बनाइए. जमीन पर उसे लागू जनता करवा लेगी. हम करवाएंगे. 

हमे आने वाली सरकार का बोझ हल्का करना होगा. सरकार को यह विश्वास दिलाना होगा कि जिसका जो हक है उसे वो मिलेगा. दूसरा कोई भी उसका हक नहीं खाएगा और अगर किसी ने भी गरीब या जरुरतमंद का हिस्सा लेने की कोशिश की तो जनता उसे बेनकाब कर देगी.  

हमें यह समझना होगा कि अगर हम अपने अंदर यह बदलाव लाते हैं. राज्य की मदद करते हैं तो इससे किसी दूसरे का कोई भला नहीं होगा. बल्की इससे हमारे बच्चों के लिए ही एक सुन्दर और ईमानदार “बिहार” तैयार होगा. 

“ सपनों का बिहार” बनाना केवल एक सरकार और कुछेक नेताओं के बस में नहीं है. इसके लिए जरुरी है कि हर बिहारी उठ खड़ा हो और कहे- “मुझे बनाना है अपने सपनों का बिहार”

गुरुवार, नवंबर 12, 2009

अपना गांव अच्छा नहीं लगा.


अभी एक-दो दिन पहले ही अपने गांव से लौटा हूं, इस बार मेरा गांव प्रवास करीब-करीब बीस दिनों का था सो मेरे पास कुछ ज्यादा टाइम था, अपने उस गांव को देखने-समझने का जहां मैं पैदा हुआ, जवान हुआ. पहले अपना गांव अच्छा लगता था, वहां के लोग और उनकी बातें सुहाती थी. वो जैसे भी थे, अच्छे थे.

वो सारे लोग मुझे अबकी बार अच्छे नहीं लगे, वो इसलिए कि आज भी मेरे गांव का भूमिहार चाहता है कि चमार, डोम, मुसहर उसे नीचे तक झुक कर सलाम ठोके, गाली सुनकर भी उन्हें (भूमिहारों को) मालिक कहे, भूखा रहकर भी उनकी बेगारी करे.

मंगलवार, अक्टूबर 20, 2009

छठ पूजा की हार्दिक शुभकामनाएं.......!!!


आज ही अखबार में पढ़ा रहा था कि पूरब की तरफ जाने वाली ट्रेनों में रेलमपेल की स्थिति है, क्योंकि छठ पूजा में सब बिहारी अपने घर जाना चाहते हैं.

तो साथियों, आपका ये बिहारी भी आज अपने गांव जा रहा है. छठ पूजा के बाद आपसब से मुलाक़ात होगी. चलते-चलते, आप सब ब्लौगर दोस्तों को छठ पूजा की हार्दिक शुभकामनाएं.......!!!

जब लौट कर आउंगा, तो आपको  बतालाउना कि जाने के लिए ट्रेन टिकट का जुगार कैसे हुआ ?
अभी तो बस निकलने की जल्दी है, सो चलता हूँ.

शुक्रवार, सितंबर 18, 2009

अब आपको भी शादी कर लेनी चाहिए......


एक लंबे समय बाद फिर आ गया हूँ आपके साथ, अपने ब्लॉग पर । मैं छुट्टी पर था, करीब एक साल बाद अपने गॉंव, दूर तक फैले खेतों और अपनी माँ जो कुछ समय से जब भी फोन करती तो एक सवाल हमेशा पूछती कब आओगे? और मैं हमेशा किसी न किसी वजह से उसे आगे की तारीख देता रहता था। तो अब मैं वहीं था।

अब चुकी मेरे पास डाटा-कार्ड नही था और नेट की सुविधा गॉंव से काफी दूर थी सो मैं दूर था अपने ब्लॉग से। यहाँ एक बात साफ-साफ कहूं तो शुरू के कुछ दिन ही मुझे ब्लॉग से अलग रहने का मलाल हुआ।

गॉंव पहुँचने के तीन-चार दिन बाद, एक दिन रात को मैं इस बारे में सोंच रहा था की नेट की उपलब्धता होती तो मैं गॉंव से भी अपने ब्लॉग पर लिखता रहता फिर मुझे लगा की सही ही था कि वहाँ मेरे पास यह सुविधा नही थी। क्योंकि बेफिक्री से गॉंव की सड़कों पर घुमाने के लिए...... गॉंव में रहे-सहे अपने दोस्तों से(जो अब शादीशुदा ज़िंदगी जी रहें हैं) बतियाने का जिसमे वो अपनी शादी के पहले की खुशी और उसके बाद के झमेलों के बारे में खूब बतलाते थे ......
अपने माय( माँ ) से अंधेरे कमरे में लेटे-लेटे गपियाने का और उनसे वो सारी बातें सुंने का मौका गवां देता जो मेरी गैरहाजरी में गाँव में हुई।

ये बात अलग है कि माँ ने इसी बातचीत के दौरान ये भी बतला दिया कि मेरे हमउम्र और मेरे साथ पढ़नेवाले कितने लड़कों की शादी हो गयी और उनमे से किस-किस के माँ-बाप दादा-दादी बनने वालें हैं.........

भाई, ये तो मैंने भी महसूस किया है कि मुझसे छोटे-छोटे कई लड़कों की शादी हो गयी उनमे से कुछेक तो अपने बच्चों के बाप भी बन चुके हैं और उन्ही में से एक जनाब ने बातचीत में अब मुझे भी शादी कर लेनी चाहिए की नसीहत भी दे डाली और तर्क दिया कि शादी एक ख़ास उम्र तक कर लेनी चाहिए।

जब मैंने पूछा कि वो अपनी शादी से खुश हैं तो वो 15 से 19 के बीच का नौजवान एकाएक 60 साल का बूढा हो गया और गोद में लिए अपने बच्चे को देखते हुए बोला " इ क्या है खुशी की चिन्हासी(निशानी) ही तो है अब त इहे सबकुछ है....." इस बात को सुनकर मुझे हंसी आने लगी तो मैं वहां से हट गया।
तो, अब मैं इस उलझन में हूँ कि शादी कि सही उम्र क्या है? क्या आप बतलायेंगे .......शादी की सही उम्र ?