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गुरुवार, मार्च 03, 2011

एक पत्रकार हूं!

हर गरीब,
भूखा-नंगा,
बिमार-लाचार,
मेरे लिए मात्र समाचार है.
क्योंकि मैं इन्सान से आगे की चीज- एक पत्रकार हूं!

सोमवार, फ़रवरी 28, 2011

दुख....

तुमने अपना कह लिया,
मेरा सुना ही नहीं.
आए और चले भी गए.......
सबकुछ देखा,
मेरी तरफ मुड़े भी नहीं.

शनिवार, अक्टूबर 02, 2010

जानना जरुरी है.

बार-बार अपने आपको समझाता हूं,
तुम्हे भी बतलाता हूं,
कि मैं परेशान नहीं हूं,
हैरान नहीं हूं.

लेकिन ये सच नहीं है.

अब, तुम जानना चाहोगे,
फिर क्या है सच?
अभी मुझे खुद नहीं पता.

खोज रहा हूं,
फोन में,
कमरे में,
पुरानी यादों में,
गंदी डायरी में,
कमरे के बाहर,
हर जगह,
हर तरफ.

मिल गया तो जरुर बताउंगा,
क्योंकि सच जानना जरुरी है.

गुरुवार, अप्रैल 08, 2010

तेरा बसेरा यहां नहीं....!!


तू कहीं और जा,
तेरा बसेरा यहां नहीं,


खुद की हरकतों से, 

आज बर्बाद है,
कपटी है बना, 

एक वहशी भी तूझ में तैयार है, 

चल जा, तू कहीं और जा…….!!



रविवार, दिसंबर 13, 2009

सुनो तो मेरी भी


हे मर्द, तुमने क्या कहा?

ज़रा दुहराना तो

तुमने कहा- हम औरतें, कोमल हैं,

कमज़ोर हैं!

लाचार हैं साथ तुम्हारे चलने को,

हमारा कोई अस्तित्व नहीं है

बगैर तुम्हारे!


तुम्हारी इन बातों पर,

बचकानी सोच पर,

जी करता है खूब हँसू…….!


सोचती हूँ, कैसे बोलते हो तुम ये सब?

कहीं तुम्हे घमण्ड तो नही

अपनी इस लम्बी कद-काठी का,

चौड़ी छाती का जहाँ कुछ बाल उग आए हैं….!


सच में, अगर घमण्ड है तुम्हें

इन बातो का तो ज़रा सुनो मेरी भी-

तुम मर्दो का आज अस्तित्व है

क्योंकि

किसी औरत ने पाला है

तुम्हे नौ महीने अपने पेट मे !


लम्बी कद-काठी है

क्योंकि

तुम्हारी कुशलता के लिए

प्रयासरत रही है

कोई औरत हमेशा !


छाती चौडी है

क्योंकि

पिलाई है किसी औरत तुम्हे छाती अपनी !


अब सोचो,

फिर बोलो,

कौन लाचार है ?

किसका अस्तित्व नहीं, किसके बगैर?


शुक्रवार, दिसंबर 11, 2009

ठण्ड की काली रात में......

ठण्ड की काली रात में......
कांपती हुई,
सिकुड़ी हुई है.
तंग कपड़ों में लिपटी,
सड़क किनारे लुढ़्की हुई है.
 
गोद में समेटे बच्चे को,
शीतलहर से लड़ रही है.
लड़ते-लड़्ते हांफ रही है,
और सांसों की खुलती गठरी को बांध रही है.
ठण्ड की काली रात में......

अपनी जिन्दगी जी चुकी है,
ऐसी अनगिनत काली और ठण्डी रातें,
सड़क किनारे, स्ट्रीट लाईट में काट चुकी है.

अब, और जीने की चाह नहीं है लेकिन जिन्दा है,
अपने बच्चे की खातिर, जो उससे गर्मी ले रहा है,
और चैन से सो रहा है.
इस ठण्ड की काली रात में....

गुरुवार, अगस्त 13, 2009

बनाने वाले…………

बर्तन बिखरे हुए, सड़क किनारे
चुल्हे पे है रोटी पकती, सड़क किनारे
बच्चे रोते, लडते और सो जाते, सडक किनारे

दिन का सूरज, सड़क किनारे
रात मे चान्द, सड़क किनारे
आना-जाना,
खाना-पीना,
लडाई-झगड़े,
प्यार-मोहबत, सब कुछ इनका सडक किनारे

वास्तव मे, ये महानगरों की सडक बनानेवाले हैं!!!