मंगलवार, जुलाई 27, 2010

गेम की तैयारी और बारिश का पानी

पिछले कुछ समय से दिल्ली को दुलहन की तरह सजाया जा रहा है. अगामी गेम रूपी बारात के लिए साज-सज्जा का काम कछुआ चाल से ही सही लेकिन चल तो रहा ही है. कितने सारे पैसे लग रहे हैं इन तैयारियों में? इसका कोई ठीक-ठीक हिसाब नहीं है. वैसे भी काम के बीच में पैसे का हिसाब कौन रखे, हिसाब-किताब तो आयोजन के बाद की चीज है. तब की तब देखी जाएगी. अभी तो, पूरा सरकारी अमला काम करने में लगा है. सरकारों ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी है.

गरीब को गरीब ही रहने दिया. इन बेचारों ने भी गेम तक चुप ही रहना ठीक समझा. बेघर को दिल्ली से ही बाहर कर दिया. कुत्ते तक को दिल्ली से बाहर भेजने की योजना बन गई. पैसे को पैसा नहीं समझा जा रहा, पानी की तरह बहाया जा रहा है. दिल्ली की आम कही जाने वाली जनता ने भी इन तैयारियों में आने वाले खर्च के बोझ को चुप-चाप उठा रही है.

इस बीच, अफसरान लगातार अपनी बड़ी-बड़ी ए.सी. गाडियों से इन तैयारियों का जायजा लेते रहे और सारी तैयारी वक्त से पहले पूरा कर लेने का भरोसा दिलाते रहे.

इस भरोसे को सुनते और पचाते हुए देश का मीडिया भी इस शादी में शामिल होन के लिए बेचैन सा होता दिखा. कुछ अखबारों ने बारातियों को सही होटल और सही बस रूट की जानकारी देने के लिए बड़े-बड़े किताब भी छापनी शुरु कर दी. टीवी वालों ने अपने-अपने चैनल पर शहनाई की सुरीली तान छेड़ दी और शेरा का एनिमेशन नचाना शुरु कर दिया.

हम यानि आम दिल्ली वाले भी सरी परेशानियों को पीछे धकेलते हुए बारात देखने के लिए तैयार होने लगे. कुछ लोगों ने तो अपने खर्च में कटौती कर के टिकट भी ले लिए.

आने वाले मेहमानों से आटो-टैक्सी ड्राइवरों को कैसे बतियाना चाहिए, कितना किराया लेना चाहिए इसके लिए ट्रेंनिग भी शुरु हो गई. ये अलग बात है कि, आज तक दिल्ली वालों से आटो-टैक्सी वालों को बतियाने का ढ़ंग नहीं सिखाया. अभी कुछ दिन पहले तक सब कुछ ठीक ठाक चल रहा था. सड़कें नई न होते हुए भी, नईं लगने लगी थीं.

लेकिन इस मौनसून की घंटे भर की बारिश ने सब किया धरा बेकार कर दिया. अब तक जितनी मेहनत हुई उस सब पर इस कलमुँही ने पानी बहा दिया. बुरा हो इस बारिश का जिसने हमारे मेहनती अफसर और ईमानदार नेताओं को मुहं छिपाने पर मजबूर कर दिया. ओले पड़े इस बारिश के सर, जिसने दुलहन की तरह तैयार हो रही हमारी दिल्ली का सारा मेकाअप कुछ ही घंटो में उतार दिया और नई नवेली दुलहन को विधवा जैसा बना दिया.

अब जब ऐसा हो गया तो सब के सब सरकार, आफिसर और करमाड़ी साहब के पीछे पड़ गए. ये बेचारे भी क्या करें? एक तो चारो तरफ इतना काम पसरा है. समय करीब आने से जल्दी से जल्दी काम खत्म करने का दवाव है सो अलग. हो सकता है कि इसी जल्दीबाजी की वजह से ये लोग भूल गए होंगे कि जून के महीनें बारिश भी आनी है. बेशक ऐसा ही हुआ होगा. अगर इन धुरंधरों को इस बात का तनिक भी आभास होता कि ऐसा कुछ होने वाला है तो वो पूरी दिल्ली के ऊपर एक “बारीश रक्षा कवक्ष” जैसा कुछ बनावा देते. अगर देश में नहीं बन पाता तो विदेश से मंगवा लेते. फिर उस कवक्ष को विदेश से आए खास तरह के बांस की मदद से पूरी दिल्ली के ऊपर टांग दिया जाता. ठीक वैसे ही जैसे गांव-गवई में शादी के मौके पर तिरपाल या सामियाना ताना जाता है.

फिर इसी सामियाना रूपी कवक्ष के अंदर ही सारी तैयारियां आराम-आराम से धीरे-धीरे सितंबर या फिर अकतुबर तक चलती रहतीं. फिर गेम के दौरान भी यह कवक्ष वैसे के वैसे ही लगा रहता ताकि गेम के दौरान भी बारिश की एक सिंगल बूंद भी दिल्ली की जमीन पर नहीं गिरती.

खैर, जो हुआ सो हुआ. जो कुछ धुल गया, टुट गया उसे दुबारा खड़ा कर लिया जाएगा. हम मेहनती लोग हैं. जो ठान लेते हैं उसे किसी भी किमत पर पूरा करते हैं. सो इस गेम को भी पूरा होना ही पड़ेगा. क्या होगा कुछ पैसे और खर्च करने होंगे. थोड़ी सी ज्यादा मेहनत करनी होगी. जब सरकारी खजाने का मुहं खुला हुआ है तो फिकर काहे का.

वैसे ये कवक्ष वाला आईडिया वाकई दमदार है. इस बारे में आयोजन समीति को विचार करना चाहिए. हो सके तो आगे कि धुलाई और जग हंसाई से बचने के लिए हरकत में आते हुए इसका इंतजाम करवा कर जल्दी से जल्दी दिल्ली को कवर कर देना चाहिए.

शनिवार, मई 15, 2010

मीडिल क्लास को सब कुछ चाहिए.....!

निरुपमा पाठक, एक ऐसा नाम जिसे समाज की दकियानूसी सोच ने, पढ़ेलिखे परिवार ने एक ही झटके में इतिहास बना दिया. ऐसा नहीं है कि अपनी मर्जी से, अपनी पंसद से शादी करने और अपना जीवन साथी चुनने की वजह से किसी लड़की के मारे जाने की यह  अकेली घटना है. हर कुछ दिन के अंतराल पर ऐसी खबरें आती ही रहती हैं. 

कभी उत्तर प्रदेश के किसी राज्य से तो कभी हरियाणा के किसी गांव से. हर दो तीन दिन बाद के अखबार इस बात की गवाही देते हैं कि कैसे अपने ही गोत्र में शादी करने की कोशिश करते एक प्रेमी युगल को मौत के घाट उतार दिया गया. कैसे किसी बाप, चाचा, भाई और मामा ने अपनी ही बच्ची को जिन्दा छत से फेंक दिया.

लेकिन अब तक इस तरह की ज्यादतर घटनाएं हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के उन इलाकों से आती थी जिसे हम शैक्षिक रुप से पिछड़ा हुआ मानते थे या फिर ऐसा सोच कर अब तक इस तरह की घटनाओं से अपने-आप को अलग करते आएं हैं.

लेकिन निरुपमा की हत्या ने हमारे पढ़ेलिखे कहे जाने वाले मीडिल क्लास की असलियत बाहर ला दी है.

इस घटना ने यह साबित कर दिया है कि किस तरह से यह समाज विकास करना चाहता है. अपना रुतबा बढ़ाना चाहता है. चुंकी एक मां-बाप का रुतबा तब ज्यादा बढ़ता है जब उसके बच्चे अच्छी नौकरी में आ जाते हैं और खूब सारा पैसा कमाते हैं सो आज इस क्लास में अपने होनहारों को खूब पढ़ाने की होड़ लगी रहती है. 

जिस इलाके से निरुपमा ताल्लुक रखती थीं वहां और उसके आसपास के इलाकों के मां-बाप अक्सर अपना सब कुछ बेच कर भी बच्चों को पढ़ाने की बात करते दिखते हैं. ऐसा इसलिए कि अगर बच्चा पढ़ लिख कर आफिसर बन गया तो इज्जत बढ़ जाएगी और अगर विदेश चला गया तो खूब सारा पैसा और इज्जत अपने आप आ जाएगा. इन दोनों ही हालत में मां-बाप की इज्जत और झूठी शान बढ़ जाती है. अपने आसपास में इनका कद बढ़ जाता है.

आज से करीब दो साल पहले जब निरुपमा ने कोडरमा से दिल्ली आकर पत्रकारिता में करियर बनाने की बात की होगी तो ऐसा ही कुछ हुआ होगा निरुपमा के परिवार के साथ. तब उसके मां, पिता, दोनों भाई, चाचा और मामा का सर गर्व से उठ गया होगा. सबके सब बहुत खुश हुए होंगे.

 लेकिन जैसे ही निरुपमा ने अपनी जिन्दगी अपने हिसाब से जीने की बात की होगी, अपनी जात-बिरादरी से बाहर जा कर अपने लिए जीवन साथी तलाशने की बात की होगी वैसे ही सब कुछ खत्म हो गया होगा. यहां से हमारा मिडिल क्लास बदल जाता है. 

यहीं से इस क्लास की झूठी शान, पुरानी सोच और दकियानूसी ख्यालों में लिपटा लिबास सामने आ जाता है. हर हाल में अपनी नाक को बचाने के लिए यह समाज हरकत में आ जाता है. सब केवल अपनी इज्जत बचाने के लिए ऐक्ट करने लगते हैं और इस चक्कर में ही देश के संविधान को बौना बता कर सनातन धर्म को सबसे ऊपर बिठा देते हैं. ऐसा ही निरुपमा के पिता ने भी किया.
 
हालांकि इस केस में पुलिस जांच चल रही है और मामला साफ होने में समय लग सकता है. लेकिन उसी समाज से ताल्लुक रखने की वजह से मैं इतना तो दावे के साथ कह सकता हूं कि अगर निरुपमा के परिवार वालों ने उसे मार भी दिया होगा तो भी इस बात की उम्मीद कम ही है कि परिवार के इन लोगों को कोई बड़ी सजा मिले.

इस तरह के मामलों में सब कुछ बड़ी आसानी से मैंनेज होते हुए देखा है मैंने. कुछ पुलिस वाले, डाक्टर और निचली अदालत के जज पैसों से खरीद लिए जाते हैं और कुछ को जाति की इज्जत और भाईचारे के नाम पर लोग अपने साथ कर लेते हैं.

 इसका एक उदाहरण आ भी चुका है. जिस डाक्टर ने निरुपमा की लाश का पोस्टमार्टम किया और टीवी पर एक इंटरव्यू देते हुए यह कहा कि यह मामला साफ-साफ हत्या का लगता है वही डाक्टर दो दिन बाद कहता है कि उसने जल्दबाजी में रिपोर्ट दे दी और गलती हो गई. यह एक मामूली भूल नहीं है बल्कि यह सब कुछ मैनेज होने का उदाहरण है.

 यह इस बात का भी सबूत है कि मिडिल क्लास अपनी झूठी शान के नाम पर कैसे अपने ही बच्चों को मार सकता है और फिर बाद में कानून को ठेंगा दिखाते हुए बच के निकल सकता है.
मुझे इसमें कोई खास हैरानी नहीं होगी अगर निरुपमा पाठक की हत्या की यह गुत्थी उलझते-उलझते जल्द ही एक इतिहास बन जाए.

शुक्रवार, मई 07, 2010

" देशद्रोही है, आतंकवादी है….."

आज क़साब है. इससे पहले अफजल था और उससे पहले भी कोई रहा होगा. ये ऐसे कुछ चेहरे हैं जो समय-समय पर बदलते रहते हैं. लेकिन क्या यही कुछ चेहरे हैं जिसके किये धरे से हम एक समुदाय विशेष की छवि मन-माफ़िक तरीके से गढ़ने लगें? ये चेहरे तो सामने आते हैं और फिर इतिहास बन जाते हैं. लेकिन जो नहीं बदलता वो है मुसलमानों  के बारे में एक सोच. नफरत. दुर्भावना और न जाने क्या-क्या!
यह कभी नहीं बदलता और इसी वजह से हमारे यहां का मुस्लिम खुल कर बोल नहीं पाता. सवाल नहीं उठा पाता. अपने आप को इस देश का उतना नहीं मान पाता, जितना हम यानी हिन्दू मानते हैं. (मैं यहां कोई बंटवारा नहीं करना चाहता और न ही कोई ऐसी बात करना चाहता हूं जिससे कोई विवाद खड़ा हो और मुझे ख्याति मिल जाए.  कुछ लोग ऐसा मानते हैं कि हम अपने को फेमस करने के लिए ऐसा लिखते हैं) बल्कि यह एक कड़वा सच है कि आज भी आम हिन्दू और मुस्लमान के बीच एक गहरी खाई है. जिसे कोई नहीं पाटना चाहता. दोनो वर्ग एक दूसरे को टेढी नज़र से देखते हैं.

 हमारे यहां का हिन्दू, मुसलमानों को आतंकवादी मानता है या फिर ऐसा कट्टर मानता है जो हमेशा हिन्दुओं को मारने के बारे में, खत्म करने के बारे में सोचता है लेकिन यह सच नहीं है. मुस्लिम भी कमोबेश हिन्दुओं को ऐसी ही घृणा और हिकारत भरी नज़रों से देखता है.

 ज्यादातर मुसलमानों में हिंसा का वो दौर आज भी इस तरह से घर कर गया है कि रात के समय सोते हुए भी उन्हें सपने आते हैं कि देश में दंगे शुरु हो गए हैं और कुछ लोग उनके ही घर में घुस कर उन्हें मारना चाहते हैं. मेरे एक दोस्त का छोटा भाई पिछले दिनों इसी तरह का एक सपना देखता है और उठ कर रोने  लगता है. अब यह डर नहीं तो और क्या है? यह एक ऐसा डर है जो बाबरी और गोधरा के बाद हर मुसलमान के मन में बुरी तरह घुस चुका है और निकल नहीं रहा.

 अब डर की एक और कहानी सुनिए- मेरी एक मुसलमान दोस्त है. उसने मुझे एक दिन बताया कि जब दिल्ली में उसका घर बन रहा था तो उसके पापा ने घर में दो दरवाजे बनवाने का फैसला किया. एक आगे की तरफ और एक पीछे की तरफ. जिस तरफ पीछे का दरवाजा बन रहा था उधर मुसलमानों की बस्ती है. उसने बताया कि उसके पापा ने दो दरवाजे इसलिए बनवाने का फैसला लिया ताकि कल को अगर कुछ गलत हो जाए और कोई दंगा हो जाए तो वो सभी को लेकर पीछे वाले दरवाजे से उस मुस्लिम बस्ती में जा सकें. अब आप इसे क्या कहेंगे? 

हम लोगों के घर में भी दो दरवाजे होते हैं लेकिन कोई भी हिन्दू यह सोच कर पीछे का दरवाजा नहीं खोलता होगा कि कल को कोई दंगा हो तो भाग सकें. जान बचा सकें.

फिर मुसलमान ऐसा क्यों सोचते हैं? क्यों घर बनाने से पहले ही घर से बच कर निकलने की सोचते हैं? क्या ये मान लिया जाये कि वो इसे अपना घर नहीं समझते? इसलिये डरते हैं? और अगर ऐसा है तो ये किसकी हार है? आखिर ये असुरक्षा का माहौल क्यों?

जब एक हिन्दु ये कहता है कि कसाब को फ़ांसी नहीं होनी चाहिये तो हम या तो उससे तर्क-वितर्क करते हैं, या ये कह कर पल्ला झाड़ लेते हैं कि फ़लां – फ़लां कम्यूनिस्ट है, फ़लां-फ़लां अपने आप को लीबरल दिखा रहा है. लेकिन जब कोई मुस्लिम ऐसा कहता है  तो सीधी प्रतिक्रिया आती है  –साला, देशद्रोही है, आतंकवादी है…..फ़लाना-ढिमकाना. ऐसा लगता है कि मुसलमानों के बोलते ही हम उनकी जबान निकाल लेना चाहते हैं या उन्हें चुप करा देना चाहते हैं.

ऐसे कैसे और कब तक चलेगा?

मंगलवार, मई 04, 2010

इनसे लड़ना होगा नहीं तो.....!!

झरखंड में जन्मी और दिल्ली में पत्रकारिता करने वाली निरुपमा आज इतिहास बन चुकी है. निरुपमा को किसी खाप पंचायत के सरपंच ने नहीं मारा. उसका गला घोटने वाले उसके अपने थे. शायद, उसके मां-बाप. वैसे हमारे देश के लिए यह कोई नई और अचरज में डालने वाली घटना नहीं है.

अगर कुछ चौकाने वाला है तो वो है देश के मध्यम वर्ग का वो डरावना और खूनी चेहरा जो अपने ऊपर कई नकाब डाले रहता है. इस वर्ग को वो सब कुछ चाहिए जिससे इसका नाम हो. बेटा, बेटी पढ़े. अच्छी नौकरी करे. खूब पैसे कमाएं और बुढापे में इनकी खूब देखभाल करे.


न तो निरुपमा अनपढ़ थी और न ही निरुपमा के जन्मदाता. निरुपमा के पापा एक सरकारी बैंक में बाबू थे और जब उनकी बेटी ने दिल्ली आ कर पत्रकारिता करने की ठानी होगी तो वो अपने समाज में अपना ओहदा बढ़ा हुआ पाते होंगे.

आते-जाते लोगों को यह बताते होंगे कि मेरी बिटिया देश के नंबर वन मीडिया संस्थान में पढ रही है और कल एक फेमस टीवी जर्नलिस्ट बनेगी.

लेकिन जैसे ही बिटीया ने अपनी मर्जी से शादी करने की ठानी और इस बात का ख्याल नहीं रखा कि वो एक पंडित है.

इनलोगों ने अपनी ही बेटी को सुला दिया और कहने लगे कि निरुपमा ने आमहत्या की है. अपनी बेटी की मौत पर आंसू बहाने के बदले पोस्टमार्टम की रिपोर्ट को ही झूठा बतलाने लगे.

यहीं से दिखने लगा इस क्लास का असली चेहरा जो साफ-साफ कह रहा है कि इन्हें अपने बच्चों की खुशी से ज्यादा अपनी झूठी शान प्यारी है. अपनी शान के लिए ये लोग अपने बच्चों को झूठ बोलकर घर बुला सकते हैं. रात में सोते समय अपने घर के भीतर ही उसका गला घोट सकते हैं और बाद में सबके सामने खुल कर कह सकते हैं कि बेटी ने आत्महत्या की है. हद है. इस समाज पर घिन्न आती है.







रविवार, अप्रैल 25, 2010

क्या रैलियों में आम आदमी होता है?



कभी-कभी सोचता हूं कि अगर हमारे देश से गरीबी, भुखमरी, महंगाई और बेरोजगारी खत्म हो जाए तो इन नेताओं की गाड़ी कैसे चलेगी? ये कैसे विधायक, मंत्री और न जाने क्या-क्या बन कर लालबत्ति की गाड़ी से सायरन बजाते हुए जाएंगे और आएंगे? कैसे इनके चेहरे की लाली और बैंक खाते की हरियाली बनी रहेगी?
फिर भी हर नेता (चाहे वो कोई छुट्भैया नेता ही क्यों न हो) अपनी हर बैठक, हर सभा में इन्हीं मुद्दों को खत्म करने की बात करता हुआ दिखता है. वैसे तो होना यह चाहिए कि जहां से दाल-रोटी चलती है उसकी सलामती की दुआ करनी करिए  और आम आदमी करता भी यही है लेकिन अपने नेता, जनसेवक इस मामले में भी अलग हैं.
खैर, अब मैं भी असली मुद्दे की तरफ़ आना चाहता हूं. 21 अप्रैल के दिन देश की मुख्य विपक्षी पार्टी बीजेपी ( यह पार्टी पिछले कुछ दिनों से केवल नाम की विपक्षी पार्टी बन कर रह गई थी) ने महंगाई के मुद्दे पर केन्द्र की यूपीए सरकार को घेरने के लिए देश भर से लोगों को दिल्ली के रामलीला मैदान में इकट्ठा किया. 
करीब-करीब तीन लाख की भीड़ थी. बात भी सही है केवल भीड़ ही थी. रामलीला ग्रांउड ही नहीं इसके आसपास के कई इलाकों ने भी इस दिन यही महसूस किया कि आए लोग केवल एक भीड़ थे. जिन्हें  इतना पता था कि जब-जब  टीवी या फोटो कैमरा उनकी तरफ घुमे तो किस तरह के नारे लगाने हैं और अगर कोई बड़ा नेता सामने से (आखों पर धूप का चश्मा पहने) हाथ हिलाता हुआ  गुजरे तो उसका दिखावटी अभिवादन किस तरह से  करना है. मैं यह सब इसलिए कह पा रहा हूं क्योंकि  मैं भी इस दिन बतौर फोटो-पत्रकार  रामलीला ग्राउंड में मौजुद था.
मैने इसी दौरान यह महसूस किया कि यहां जिन लोगों को आम लोगों का मुखौटा पहना कर, हाथ में पार्टी के झंडे और सर पर कमल खिला कर बिठाया गया था वो केवल बैठने और समय-समय पर एक-आध नारा लगाने के लिए ही बुलाए गएं थे और वो अपना काम बखूबी कर रहे थे. यहां इस रैली में आए ज्यादातर लोगों का न तो महंगाई से कोई सरोकार था और न ही इनकी कमर महंगाई से टूटी और झुकी जा रही थी. आए हुए लोगों को देख कर मुझे ऐसा ही लगा. इनमें से ज्यादातर लोगों के लिए तो यह दिल्ली दर्शन करने का एक अनूठा मौका था सो  आ गए. 
चिलचिलाती धूप में पंडाल के नीचे बैठ लिए और चुंकी भेजने वाले ने कहा था कि वहां जाकर खूब जोर-जोर से नारे लगाने हैं सो लगा लिया. पंडाल में सबसे आगे बैठे कुछ लोग जिन पर धूप सीधे-सीधे पहूंच रही थी वो सुबह के 10 बजे ही इस बारे में बात कर रहे थे कि और कितना समय लगना है यहां. इनकी बातचीत सुनने का मौका मिला तो पता चला कि सभा खत्म होने के बाद ये लोग सबसे पहले इन्डिया गेट फिर अक्षरधाम मंदिर जाएंगे. धूप से और गर्मी से सब के सब बेचैन थे लेकिन पता नहीं क्यों कोई भी पंडाल से उठ कर कहीं छांव में नहीं जा रहा था. 
सब के सब वहीं जमे थे जैसे किसी ने सख्त हिदायत दी हो कि कोई भी पंडाल से बाहर नहीं जाएगा. मेरा कैमरा पूरे पंडाल से लेकर सड़्क तक आम आदमी के उस चेहरे को खोजता रहा जो सही में महगाईं  की मार झेल रहा है लेकिन अफसोस ऐसा कोई भी चेहरा मेरे लेंस के दायरे में नहीं आ सका. हर दफा वही चेहरे सामने आते रहे जो मुंह में पान या गूट्खा दबाए, सर पर पार्टी का झंडा बांधे या पूरे बदन पर ही पार्टी का झंडा लपेटे हुए घूम रहे थे. 
लेकिन मंच पर बैठे लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, सुषमा स्वाराज और पार्टी के नए नवेले अध्यक्ष नीतिन गडकरी इसी भीड़ में आम आदमी को बार-बार देख रहे थे. तभी तो ये सारे नेता अपने-अपने भाषण में बार-बार कह रहे थे कि यह रैली भाजपा की नहीं आम लोगों की है. मुझे नहीं मालुम कि  जनता के इन सेवकों को इस रैली में किस तरह से और कौन सा आम आदमी दिख गया?
खैर, मुझे तो अंत-अंत तक यह भे नहीं मालुम हुआ कि यह रैली पार्टी के नेताओं ने बुलाई क्यों थी? पार्टी के बड़े से बड़े नेता के पास भे मंच से कहने को कुछ खास नहीं था. हर कोई वही बात कर-कर के अपनी कुर्सी पर बैठता गया जिसे देश भर के लोग चाय की दूकान चाय पीते हुए पर या पान की दूकान पर पान खाते हुए करते हैं. 
किसी भे नेता के पास कुछ भी ऐसा कहने को नहीं था जिससे लगे की हां, इस पार्टी में दम है या ऐसा लगे कि अगर यह पार्टी कल सत्ता में आती है तो महंगाई समेत आम आदमी की बहुत सी मुश्किलें आसान होंगी. ऐसा लग रहा था कि मंच से बोलने वाले ज्यादतर नेता गहरी थकान महसूस कर रहे हैं. हो सकता है कि यह थकान एसी  कमरे से बाहर निकलने की वजह से भी हो रही हो. वैसे भे इस तरह की गर्मी से इन नेताओं का रोज का तो कोई वास्ता होता ही नहीं है. 
भाषण खत्म होने के बाद जब संसद तक जाने की बारी आई तो वहां भी यह दिख गया कि आम, आम ही होता है और खास-खास होता है. सभा के बड़े नेता चार गाडियों में सवार हो लिए बाकी के लोग उनके साथ पैदल ही चल पड़े.
इसी बीच एक घटना और हुई कि गर्मी की वजह से पार्टी के नए-नवेले अध्यक्ष को गस्त(चक्कर) आ गया और वो वहीं जमीन पर लुढ़क लिए. अब कोई बताए कि क्या ऐसे होगी लड़ाई महंगाई से?



शुक्रवार, अप्रैल 23, 2010

स्टोरी, जो रोक दी गई...!


 (मेरी इस स्टोरी को मेरे संपादक ने भाजपा के खिलाफ बता कर रोक दिया. चलिए कोई नहीं. अपना ब्लॉग तो है ही. अभी मैं भाजपा के पक्ष में स्टोरी लिख रहा हूं तब तक आप मेरी इस स्टोरी को पढिए जिसे  संपादक महोदय ने रोक दिया.)
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की महंगाई विरोधी रैली 21 अप्रैल को आयोजित की गई.  इस रैली में भाग लेने के लिए हजारों की संख्या में भाजपा कार्यकर्ताओं का हुजूम सुबह ही राजधानी के रामलीला मैदान पहुंचने लगा था.

भाजपा नेताओं के मुताबिक करीब तीन लाख लोगों ने इस रैली में भाग लिया.  रामलीला मैदान में पार्टी के लगभग सभी वरिष्ठ नेताओं ने इस रैली को संबोधित किया.  यहां आए हुए लोगों के हुजुम को पार्टी के जिन नेताओं ने संबोधित किया उसमें प्रमुख रूप से लालकृष्ण आडवाणी, लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज, राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली और पूर्व अध्यक्ष राजनाथ सिंह थे. सबसे ज्यादा  समय  तक पार्टी के वर्तमान राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतिन गडकरे ने कार्यकर्ताओं को संबोधित किया. 
रामलीला मैदान पर कार्यकर्ताओं को संबोधित करने वाले नेताओं में नीतिन गडकरे अंतिम नेता थे. गडकरे के संबोधन के बाद सभी शीर्ष नेता अलग-अलग चार रथों मे सवार हुए और बाकी करीब दस हज़ार  लोग उन रथों के साथ पैदल ही निकल पड़े संसद की तरफ.  पार्टी  के कुछ नेताओं ने बताया कि पार्टी तो ग्राउंड में मौजूद सभी कार्यकर्ताओं और समर्थकों के साथ संसद तक जाना चाहती थी लेकिन दिल्ली की सरकार और प्रशासन ने कानून वय्वस्था बिगड़ने का हवाला देकर ऐसा करने से रोक दिया.


कमोबेस, सभी नेताओं के कहने का एक ही मतलब था कि केन्द्र की मौजूदा सरकार ने महंगाई बढ़ा दी है और इस कमर तोड़ महंगाई से भाजपा ही लोगों को छुटकारा दिला सकती है लेकिन सभा को संबोधित करते हुए पार्टी के किसी भी नेता ने देश की जनता के सामने वो तरीका नहीं बताया जिससे महंगाई को रोका जा सके.
किसी ने भी यह साफ-साफ नहीं कहा कि अगर यह सरकार इस मुद्दे पर सत्ता से बाहर हो जाती है और जनता भाजपा को सरकार बनाने का मौका देती है तो इस पार्टी के लोग किस तरह से महंगाई को कम करेंगे और वो कौन सा फ़ॉर्मुला होगा जिससे देश की बेरोजगार जनता को रोजगार मिल जाएगा.


हालांकि कुछ लोगों का कहना है कि यह रैली सरकार के खिलाफ थी ही नहीं बल्कि यह रैली तो  पार्टी के नए अध्यक्ष नीतिन गडकरे का शक्ति प्रदर्शन था क्योंकि  गत वर्ष दिसंबर में पार्टी का अध्यक्ष बनने के बाद नितिन गडकरी के नेतृत्व में पार्टी का यह पहला और बड़ा सरकार विरोधी आयोजन था। 
इस रैली को लेकर जो अटकलें लगाईं जा रही हैं उसे पार्टी के वरिष्ट नेता और देश के पूर्व गृहमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी के ही एक बयान के बाद हवा मिली है. इसी रैली को संबोधित करते हुए आडवाणी ने इस रैली को गडकरे के नेतृत्व में आयोजित एक अभूतपूर्व रैली करार दिया और यह भी कहा कि इस रैली के आगे पूर्व की सारी रैलियां बौनी साबित हो गईं हैं. ऐसा कहते समय आडवाणी का लहजा सामान्य नहीं था. ऐसा उनलोगों का मानना है जो भाजपा की राजनीति और आडवाणी की शैली को बहुत अच्छे से जानते हैं.


इस रैली में एक बात और ऐसी थी जिसे पार्टी के विरोधी और आलोचक पार्टी में फूट और मतभेद के तौर पर देख रहे हैं. इस रैली में पार्टी के हिन्दुत्व ब्रिगेड के अगुआ और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी मौजूद नहीं थे. 
हालांकि इस बारे में लाल कृष्ण आड़वाणी ने सफाई देते हुए कहा था कि मोदी को कहीं और जाना था सो वो इस रैली में नहीं आ सके लेकिन इस बारे में एक और बात हुई जिस पर ध्यान देने की जरूरत है. मंच से आडवाणी को छोड़कर किसी और नेता ने मोदी का एक बार भी नाम नहीं लिया. यह सामान्य घटना नहीं है. इसी आधार पर कुछ लोग कह रहे हैं कि पार्टी में सब कुछ सामान्य नहीं है.


देखते हैं कि भाजपा की इस रैली से कांग्रेस की सरकार पर कितना और क्या असर पड़ता है और देश की जनता को इस कमर तोड़ महंगाई से कब तक राहत मिलती है. महंगाई कम हो या न हो लेकिन इतना तो हुआ कि देश की राजधानी के कुछ हिस्से इस दिन ठहर गए और कॉमनवेलथ के लिए सज-संवर रही दिल्ली पर खूब सारे पोस्टर और कमल के झंडे खिल गए.



गुरुवार, अप्रैल 15, 2010

आखिर, पानी को बोलना ही पड़ा !!

प्यारे दोस्तों,

जम के पीजिये. मस्त रहिये. इस गरमी को मात देने में बस मैं ही आपकी मदद कर सकता हूं. लेकिन इसके लिये आपको मेरी बात सुननी पड़ेगी. इसे गुहार कहिये, फ़रियाद कहिये, गिला कहिये... या फिर सलाह कहिये.
 
अगर आपलोगों ने अपने इस दोस्त को अब तक नहीं पहचाना है तो हम आपको बता दें कि हम वही हैं जिसके बगैर आप ज़िन्दगी रूक सी जाती है, ठहर सी जाती है. हमारे बिना आप सुबह-सुबह फ्रेश नहीं हो सकते. सुबह में ब्रेकफास्ट, दोपहर में लंच और रात में डिनर के टाईम भी आपको मेरी जरुरत  होती है और अगर खाने में मिर्च ज्यादा तेज हो गई हो तब तो बगैर हमारे काम ही नहीं चल सकता. 

मुझे लगता है कि इतना काफ़ी था. अब आप ये समझ गए होंगे कि मैं कौन हूं?  अगर आप में से कुछ लोग अब भी अपना सर खुजला रहे हैं  और यह सोच रहे हैं कि मैं कौन हूं तो उअनके लिए बता दूं- मैं पानी, जल या वाटर जो कहिए वही हूं. 

हां, हां…वही पानी! जिसके बगैर यहां किसी का काम नहीं चल सकता. हर किसी को मेरी जरुरत है. पेड़-पौधे, कीड़े-मकोरे और आप लोग मतलब इन्सान. यहां तक कि निर्जीव चीज़ों जैसे फ़र्नीचर, गाड़ी और नाजाने क्या-क्या. सब चीज़ों को दुरुस्त रखने के लिये मेरी ज़ुरुरत होती है. प्लीज, आपलोग यह न समझें कि मैं  यहां कोई रोब झाड़ रहा हूं या घंमड कर रहा हूं.  

मैं तो यह सोच के हैरान हो रहा हूं कि एक तरफ तो आपलोग मुझे जीवनदायनी कहते हैं और दुसरे तरफ मुझे यानि पानी को लेकर बहुत लापरवाही बरतते हैं. ये दोनों चीजें साथ-साथ कैसे हो सकती है?  मेरी बात मानिए. मुझे लेकर इस तरह की लापरवाही  न करें…..! यह जो बात मैं आपसे कह रहा हूं हो मेरे लिए नहीं है. मेरा तो नेचर ही है बहना.
 
लेकिन मैं यह नहीं देख सकता कि एक जगह मैं ऐसे ही घंटो बहता रहूं और दूसरी जगह लोग मेरे लिए तरसते रहें, परेशान होते रहें और मेरी तलाश में  घंटो सर पर ड्राम लेकर एक जगह से दूसरी जगह भटकते रहें.
 
हो सकता है कि मेरी बातों को यहां पढकर आप यह सोंचे कि मैं परेशानी को बढ़ाचढ़ा कर पेश कर रहा हूं या फिर आप यह मानें कि इस तरह की दिक्कत दिल्ली या मुम्बई जैसे शहरों में नहीं आएगी. अगर ऐसा सोच रहे हैं तो मैं कहूंगा कि आप गलत हैं और आपको आगे के कुछ महीनों में होने वाली परेशानी का बिल्कुल भी अंदाजा नहीं है.  

साहब, आगे जो कोहराम इन्हीं शहरों में मचने वाली है उसकी खबर आपतक भी पहूंचेगी और अगर एक सुबह आपके बाथरुम या किचन के नलके से मैं नहीं निकलूंगा न….., तब आपको इस बात का अंदाज़ा होगा और तब शायद आप मेरी यहां कही बात को समझेंगे.
 
सच मानिए, मुझे बहुत खराब लगता है जब आप मुझे बगैर काम के घंटो बहते रहने देते हैं. जब जरुरत हो तब मेरा इस्तेमाल करिए और काम होने के बाद फौरन बंद कर दीजिए. अगर आप मेरा इस्तेमाल ध्यान से करेंगे और मुझे बर्बाद नहीं करेंगे तो मुझे भी खुशी होगी और मेरे दूसरे जरुरतमन्दों  को भी मैं आसानी से मिल जाउंगा. अब बात आती हैं  कि आप लोग कैसे मुझे बरबाद करते हैं और मेरी इस बरबादी को कैसे रोका जा सकता है. 

देखिए, आप में से कुछ लोग सुबह जल्दी-जल्दी में अपना सेव बनाते हैं और जब तक सेविंग करते हैं तब तक मैं नलके से बहता रहता हूं. आप में से कुछ लोग सुबह-सुबह अपने गार्डेन में  पानी देते हैं और यह अच्छी बात है क्योंकि मेरी जरुरत तो फुलों को भी है लेकिन यहां भी मुझे फालतु में बहाया जाता है. अगर आप मुझे किसी ड्ब्बे में लेकर पौधों को देंगे तो मेरी बर्बादी को रोका जा सकता है लेकिन अगर आप मेरा इस्तेमाल सीधे पाईप करेंगे तब तो मेरी बरबादी होगी ही न.
 
अब कुछ लोगों को अपनी गाड़ी हर रोज धोने की आदत होती है और ऐसे लोग सीधे नलके से पाईप लगा कर घंटो अपनी गाड़ी साफ करते हैं. अब आप ही सोचिए कि अगर हर गाड़ी वाला अपनी गाड़ी  रोज धोएगा और इसी तरह से घंटो तक धोएगा तो मेरी कितनी बर्बादी होगी. हो यह भी सकता है कि गाड़ी को रोज मुझसे न साफ किया जाए. बल्कि  दस या पन्द्रह दिनों मे एक बार इस काम के लिए मेरा इस्तेमाल किया जाए.
 
वहीं कुछ घरों में काम के समय या बर्तन धोने के समय भी मेरा इस्तेमाल इस तरह से होता है कि मैं  रो देता हूं. एक और जरुरी बात जो मैं  चलते-चलते कहना चाहता हूं कि बारिश के समय भे मैं वैसे ही बरबाद होता हूं.
 
सच मानिए, इस समय मुझे अपनी बरबादी और उन लोगों की किस्मत पर बहुत रोन आता है जो मेरी तलाश में घंटो इधर से उधर भटकते रहते हैं. तब किसी को इस बात के फिक्र नहीं होती कि मुझे स्टोर किया जाए और जरुरत के समय इस्तेमाल किया जाए. लेकिन कुछ लोगों ने इस तरफ काम किया है और उन लोगों से मुझे खुशी है.
 
आप सब की और बहुत सी ऐसी आदतें है जिसकी वजह से मैं बरबाद होता हूं लेकिन मैं इस लेटर में सारी बातें तो नहीं कह पाउंगा और ऐसा करना मुझे अच्छा भी नहीं लगेगा.
 
मैं तो बस इतना कहना चाहता हूं कि मेरे इस्तेमाल में थोड़ी सी सावधानी बरतिए ताकि हर किसी की प्यास बुझ सके और जरुरत पूरी हो सके.
 
वैसे तो आप इंसान हैं, आपको समझाने और बताने की ज़ुरुरत क्या है. विवेक आपके आजू-बाजू ना घूमता तो कैसे छत वाली टंकी में स्टोर करके नलके से मुझे निकालते और फ़िल्टर में डालकर मुझे प्योर करते. मेरा ख़त उम्मीद है आपके ज़ेहन में रहेगा.
 
ठीक है तो फिर मैं चलता हूं आपके नलके में ताकि जब आप नलका घुमाएं तो मैं बाहर आ सकूं और आपकी जरुरत को पूरा कर सकूं.


आपका दोस्त,
पानी

गुरुवार, अप्रैल 08, 2010

तेरा बसेरा यहां नहीं....!!


तू कहीं और जा,
तेरा बसेरा यहां नहीं,


खुद की हरकतों से, 

आज बर्बाद है,
कपटी है बना, 

एक वहशी भी तूझ में तैयार है, 

चल जा, तू कहीं और जा…….!!



शनिवार, अप्रैल 03, 2010

मेरे प्यारे प्रधानमंत्री जी.......

प्यारे प्रधानमंत्री जी,

मेरा नाम रौनक है और हम आपकी दिल्ली से बहुत दूर  एक गांव में रहते हैं.  मेरे साथ मेरी मां है जो पिछले कुछ दिनों से बीमार है. बाबा खेती करते हैं. बड़ा भाई जिसकी उम्र 20 साल है,  बाबा के साथ खेत पर काम करता हैं लेकिन दिल्ली जाना चाहता है. उसका कहना है कि खेती करने से हम कभी भी अमीर नहीं हो सकते. अगर वो दिल्ली जाएगा तो ज्यादा पैसे कमा पाएगा. लेकिन मेरे स्कूल के मास्टर जी तो कहते हैं कि सरकार मतलब आप लोग किसानों के लिए बहुत सी योजनाएं बना रहें तो फिर मेरा भाई ऐसा क्यों कह्ता है कि खेती करने से गरीबी नहीं जाएगी. मुझे तो कुछ समझ नहीं आ रहा है कि मेरा भाई कमाने के लिए दिल्ली ही क्यों जाना चाहता है.

खैर, मैं तो आपको यह चिठ्ठी इसलिए लिख रहा हूं कि कल स्कूल में मास्टर साहब आपस में बात कर रहे थे. जब मैं उनके लिए बगल की चौक से चाय लेकर पहूंचा तो सुना कि आपने कोई शिक्षा का अधिकार कानून लागू किया है. वही लोग कह रहे थे कि इसके बाद 6 साल से 14 साल तक के हर बच्चे को पढ़ाई-लिखाई करने का अधिकार मिल जाएगा.
यह सुन कर मुझे बहुत अच्छा लगा और मैं इसके लिए आपको बधाई देना चाहता हूं. मैं तो आपको यह खत अंग्रेजी में लिखना चाहता था क्योंकि मैंने आपको टीवी पर फटाफट अंग्रेज़ी बोलते हुए सुना है.  आप बहुत अच्छी अंग्रेज़ी बोलते हैं.

मैं आपकी तरह अंग्रेजी बोलना चाहता हूं लेकिन क्या करूं? हमारे स्कूल में अंग्रेज़ी की पढ़ाई ही नहीं होती क्योंकि कोई टीचर ही नहीं है. मुझे लगता है कि आपको इस कानून को लाने से पहले हमारे स्कूल में अंग्रेज़ी के मास्टर साहब को भेजना चाहिए था. वो ज्यादा जरुरी था.  

मैं बहुत पढना चाहता हूं. बहुत, मतलब बहुत….. लेकिन बाबा कहते हैं कि वो मुझे ज्यादा नहीं पढ़ा सकते क्योंकि उनके पास पैसे नहीं है और न हीं कोई काम  है. अभी मैं आठवी क्लास में हूं और मास्टर साहब कहते हैं कि दसवी के बाद स्कूल की पढ़ाई खत्म हो जाएगी और आगे की पढ़ाई के लिए कालेज जाना होगा. लेकिन मेरे बाबा मुझे कालेज में नहीं पढ़ा पाएंगे. अब अगर स्कूल के बाद वो मुझे पढ़ाई छोड़ने के लिए कहते हैं तो मैं क्या करूंगा?

क्योंकि आपने अभी जो कानून लागू किया है उसमें भी तो चौदह साल के उम्र तक के बच्चों को ही शिक्षा का अधिकार मिला है. उसके बाद के उम्र वालों के लिए तो आपने अपने कानून में कुछ कहा ही नहीं. अब ऐसे में तो मेरे लिए आपका यह कानून किसी काम का नहीं हुआ न. बताइए?

मैंने अपने जिस भाई के बारे में आपको बताया था कि वो दिल्ली जा कर काम करना चाहता है वो भी पढ़ना चाहता था. उसने दसवीं पास भी की और अंक भी अच्छे आए थे लेकिन क्या हुआ… वो आगे नहीं पढ़ पाया. क्योंकि हम गरीब हैं और बाबा केवल खेती करते हैं. पता है आपको, बाबा भी भईया को पढ़ाना चाहते थे लेकिन उनके पास पैसे ही नहीं थे सो खूब  रोये और भाई की पढ़ाई छुड़वा दी!

मुझे लगता है कि मेरे साथ भी यही होगा. मुझे भी अपनी पढ़ाई छोडनी होगी और उस वक़्त भी बाबा, मैं और बीमार मां सब खूब रोएंगे.

प्रधानमंत्री जी, अगर आपने शिक्षा देने के लिए कानून बनाया ही तो उसे 14 की बजाय 20 साल तक के बच्चों के लिए कर देते. आपका तो ज्यादा कुछ नहीं जाता पर आपके इस कानून की बजह से मैं और मेरे जैसे कुछ बच्चे तो कालेज का मुंह देख लेते.

वैसे एक बात और कहना चाहता हूं आपसे, हमारे पास अपना घर नहीं है. बाबा बता रहे थे कि आपने घर बनवाने के लिए भी एक योजना “इंदरा आवास योजना” चला रखी है. इस योजना से घर बनबाने के लिए मेरे बाबा हर रोज ब्लॉक जाते हैं और खाली हाथ लौट आते हैं. अभी तक कोई पैसा नहीं मिला. क्या फायदा ऐसी योजनाओं का?

बाबा ने काम के लिए, रोजगार गांरटी योजना से भी कार्ड बनबाया हुआ है लेकिन जब से कार्ड बनबाया है कोई काम नहीं मिला. कहते हैं पैसे नहीं सरकार के पास? आप के पास तो बहुत पैसा है. ऐसा मेरा दोस्त कहता है.
अगर आपके पास भी पैसों की कमी है तब तो आप भी गरीब हुए. लेकिन आप गरीब कैसे हो सकते है? आप तो केवल खेती नहीं करते हैं. बाबा कहते हैं कि जो कवल खेती पर रहता है उसकी किस्मत ही फूट जाती है और किसानी करने वाला गरीब ही रहता है.

प्रधानमंत्री जी, मैं अभी तो एक बच्चा हूं लेकिन बड़ा हो कर आपके जैसा बनना चाहता हूं. न तो मैं अपने भाई की तरह पढ़ाई लिखाई छोड़ कर दिल्ली में काम करना चाहता हूं और न ही अपने बाबा की तरह केवल किसानी करना चाहता हूं.

मैं तो पढ़ लिख कर अपने कलाम चाचा की तरह बहुत बड़ा वैज्ञानिक बनना चाहता हूं लेकिन मुझे कोई रास्ता नहीं सूझ रहा.  अब आप ही बताइए कि मैं क्या करूं?

आपका प्यारा
रौनक.

मंगलवार, मार्च 30, 2010

चुप हो जाओ नहीं तो चलती ट्रेन से फेंक दूंगा

 धर्म हमारे यहां एक बेहद संवेदनशील विषय हैं.  धर्म या भगवान के बारे में कुछ भी बोलने से लाखों लोगों की भावनाएं ऐसे भड़कती हैं जैसे अपनी परछाईं को देखकर भेड़ या लाल कपड़े को देखकर सांड़ भड़कता है. मुझे तो लगता है कि इन्सान इस विषय पर ऐसा भड़कता है कि कुछ देर के लिए मरखंड से मरखंड़ साड़ भी शरमा जाए.

क्यों हम अपने धर्म के बारे में आलोचना का एक शब्द भी नहीं सुनना चाहते. क्यों हम राम को न मानने वालों को चलती ट्रेन से फेंक देने की धमकी दे देते हैं? क्यों हम इस बारे में कोई तर्क नहीं करना चाहते और तर्कपूर्ण बातों को भी अपनी थोंथी दलीलों से पोत देना चाहते हैं? 

मेरी समझ से ऐसा इसलिए होता होगा क्योंकि हम नहीं चाह्ते कि कोई हमारी सोच पर प्रहार करे बल्कि यह चाहते हैं कि हम चीजों को जैसे देख रहे हैं, समझ रहे हैं दूसरे भी वैसा ही समझें और देखें. उसी राह पर चलें जिस राह पर हम चल रहे हैं. वैसे तो भगत सिंह को इस देश में बहुत इज्जत दी जाती है लेकिन धर्म और भगवान के बारे में कही गई उनकी बातों को लोग सिरे से नकार देते हैं. 

मेरा ऐसे कुछ कट्टर हिन्दूओं से पाला पर चुका है. आगे कुछ भी कहने से पहले मैं यहां एक बात साफ कर देना चाहता हूं कि जिन लोगों से मैं उस ट्रेन में मिला वो विश्व हिन्दू परिषद या बजरंग दल के कार्यकर्ता नहीं थे बल्कि हमारे आपके जैसे आम लोग थे. जो एक आम ज़िन्दगी जीते हैं. 

बात ज्यादा पुरानी नहीं है. मैं अपने भाई को बंग्लौर पहूंचा कर ट्रेन से पटना लौट रहा था. संघमित्रा एक्सप्रेस में मेरे साथ जो और सहयात्री थे उनमे से ज्यादातर बिहार या उत्तर प्रदेश के थे. वो लोग भी अपने-अपने बेटे-बेटियों को पहुंचा कर लौट रहे थे. ट्रेन में बैठने के थोड़ी देर बाद ही हम सब की जान पहचान हो गई. 

शम  6:30 की  गाड़ी थी सो पहली रात में हल्की-फुल्की बातचीत हुई और फिर हम सब अपने अपने बर्थ पर सो गए.  दूसरे दिन जैसे-जैसे गाड़ी आगे बढ़ रही थी हमारी बातचीत भी परवान चढ़ रही थी.  दिनभर वही सब बातें होती रहीं जो अक्सर ट्रेन और बसों में यात्रा के दौरान होती हैं. जिन्हें आप रास्ता कटाउ बातें भी कह सकते हैं लेकिन जैसे-जैसे दिन ढलने लगा वैसे-वैसे ही बातचीत का माहौल भी बदलने लगा. 
 
हम लोगों के साथ एक मुस्लिम लड़का भी सफर कर रहा था. वह ज्यादा पढ़ा लिखा नहीं जान पड़ता था. बात कहीं से घूमते फिरते धर्म और खासकर इस्लाम धर्म के बारे में होने लगी थी. करीब करीब चार लोग आरोप लगा रहे थे और अकेले वह लड़का अपनी पूरी क्षमता से अपने धर्म का बचाव कर रहा था. इस सब में एक मोटे ताजे पंडित जी भी थे जो उत्तर प्रदेश से ताल्लुक रखते थे. 

वो कुछ ज्यादा ही आरोप लगा रहे थे. जैसे इस धर्म में तो बच्चे को पैदा होते ही मारकाट सिखाया जाता है. वो अपनी बात को साबित करने के लिए हर फालतू से फालतू तर्क का सहारा ले रहे थे.

जैसे अपनी उपर कही बात को साबित करने के लिए उन्होंन तर्क दिया कि मुस्लमानों में लड़कों का खतना होता है और खतना इसलिए होता है कि  वो खून देख सके और आगे के लिए तैयार हो सके. 

इन सब के बीच मैं चुप था और सोच रहा था कि जल्दी से जल्दी यह विषय बंद हो लेकिन वो तो बोलते ही जा रहे थे. उन्हें पता था कि  मैं पेशे से पत्रकार हूं सो उन्होने इस बारे में राय मागीं. लेकिन मैंने कुछ भी कहने से मना कर दिया. अब उनके साथ-साथ पटना के भी कुछ लोगों ने मुझसे बोलने के लिए कहा. 

मैं बोलना तो चाहता ही था लेकिन माहौल को देखकर चुप था. मैंने उन सभी से कहा कि मैं इस विषय में इसलिए कुछ नहीं बोलना चाहता क्योंकि मैं किसी भी धर्म और किसी भी भगवान नामक सत्ता पर विश्वास नहीं करता. पर बोलना पड़ा. उत्तर प्रदेश वाले पंडित जी ने मुझ पर सवालों की झरी लगा दी. जैसे मेरे पापा का क्या धर्म है? अगर भगवान नहीं है तो यह दुनिया कैसे चलती है? अगर कोई शक्ति नहीं है तो मैं कहां से पैदा हुआ?

ये वही कुछ सवाल थे जो हर एक आस्तिक, एक नास्तिक के सामने रखता है. मैंने भी पूरी कोशिश की जबाव देने की और उन्हें संतुष्ट करने की लेकिन वो नहीं माने. मैंने अपनी बात को भगत सिंह और राहुल संस्कृतायन के सहारे भी कहने की कोशिश की लेकिन कोई फयदा होता नहीं दिखा. हालात इस तरह के हो गए थे कि उस पूरे ड्ब्बे में केवल दो लोग बोल रहे थे. एक पंडित जी और एक मैं.

कुछ लोग बीच-बीच में पंडित जी के साथ हो जाते थे. मैं बिलकुल अकेला पड़ रहा था. सो सोचा कि बात ही बंद कर दूं. लेकिन वो मुझे ऐसा भी नहीं करने दे रहे थे. उनकी बे तर्क की बातें सुन-सुन कर मुझे गुस्सा आ रहा था लेकिन मैं संयम से उनकी हर बात का जवाब देने की कोशिश कर रहा था. उनका चेहरा लाल हो गया था. वो बोलते-बोलते मेरे बिलकुल पास वाली सीट पर आ गए थे. 

उन्होंने कहा कि इतने सारे लोग जो धर्म और भगवान को मानते हैं क्या वो सारे बेवकूफ हैं? मैंने कहा, ऐसा नहीं है लेकिन वो सारे लोग मुझे अंधे लगते हैं जिन्हें केवल अपना धर्म और अपना भगवान दिखता है. क्या है भगवान का अस्तिव? किसने देखा है भगवान को
 
ये अंधापन नहीं है तो और क्या है कि एक पथर की मुर्त्ती जो बिना आपकी मदद से हिल भी नहीं सकता उसमे आपको अपना भगवान दिखता है. आप उस राम को जपते हैं और मर्यादा पुरुष कहते हैं जो अपनी गर्भवती पत्नी को अकेले जंगल में छोड़ देता है. मैंने कहा, अगर आपके राम आज होते तो उनकी पत्नी ने तलाक ले लिया होता और वो जेल में सजा काट रहे होते. 

मेरे इतना कहते ही उनका गुस्सा सातवें आसमान पर पहूंच गया और उन्होंने मुझे चेतावनी देते हुए कहा, “अगर तुमने आगे एक शब्द और बोला तो यहीं ट्रेन से फेंक दूंगा.” 

उनके इस बोल के साथ ही वो बातचीत खत्म हो गई. वो अपने बर्थ पर चले गए और सारे लोग मुझे सांत्वना देने लगे और मैं उस वक्त बिल्कुल शांत था. आसपास खड़े किसी ने भी उनको यह नहीं कहा कि आपने गलत बोला. इसके उलट कुछ लोग मुझे ही समझा रहे थे कि ऐसे नहीं बोलना चाहिए था. 

शायद सही कह रहे थे वो लोग कि मुझे अपने विचार नहीं रखने चाहिए थे. चुप रहना चाहिए था क्योंकि यहां वैसे लोग नहीं चाहिए जो धर्म के पाखंड में नहीं पड़ना चाहते हैं और इस बारे में खुल कर बोलना चाहते हैं.

बुधवार, फ़रवरी 24, 2010

आम आदमी, आम आदमी और केवल आम आदमी!!

आम जनता के द्वारा निर्वाचित और देश की आम सी दिखने वाली रेल मंत्री ने साल 2010 का रेल बजट पेश कर दिया.


जैसे हर नेता या कहें तो जनसेवक चुनाव के वक्त आम जनता के नाम की माला जपता है. वैसे ही रेल मंत्री और वित्त मंत्री बजट पेश करते वक्त आम जनता के नाम का माला फेरते दिखते हैं. जब भी कोई रेल या वित्त मंत्री अपना बजट भाषण पढ़ता है तो सबसे ज्यादा इसी शब्द “आम जनता” को दुहराता है.

चाहे बजट में इस वर्ग के लिए कुछ हो या न हो लेकिन बात आम जनता की ही होती है. पीछे जब लालू महाराज ने एक फुल एसी ट्रेन चलवाई तो उसे भी आम जनाता के लिए बताया. बाद में वह ट्रेन मझोले अमीरों के लिए चलती दिखने लगी.

लेकिन इसके लिए उस टाइम के रेल मंत्री या उनके अफसरों को तो दोष नहीं ही दिया जा सकता. उन्होंने तो सोचा होगा कि ट्रेन का नाम गरीब रथ है तो गरीब ही चढे़गे.

इस फैसले की ही तर्ज पर लालू ने कई और अहम फैसले लिए थे और उसे आम आदामी के लिए गया बताया था. लेकिन उसके बाद समय बदला और लालू जी की कुर्सी पर ममता जी बैठ गईं. अब ममता जी आम आदमी के लिए फैसलें कर रही हैं. मैं इसकी गारंटी दे सकता हूं कि इनके द्वारा लिया गया हर फैसला भी आम आदमी के लिए ही होगा. ये दीगर है कि उस फैसले से आम आदमी का कुछ भला होता भी है या नहीं.

सोमवार, फ़रवरी 01, 2010

हनुमान हो लिए राम विरोधी

राजनीति खेल का एक ऐसा मैदान है जहां हर कोई हमेशा अपना-अपना दाव चलता रहता है. यहां कुछ भी पहले से तय नहीं होता. इस मैदान का कोई  भी  रेफरी या अंपायर दावे से कुछ भी नहीं कह सकता. 

इधर हमेशा कोई न कोई खेल चलता रहता है. मजे की बात तो यह है कि इस मैदान के खिलाड़ी  हमेशा डटे रहते है और वह भी पूरे मनोयोग से. यहां हर कोई किसी न किसी पर अपना दाव चलाने के  लिए तैयार बठा होता है. 

अब देखिए, अभी कुछ दिन पहले तक मुलायम सिंह और अमर सिंह एक दूजे के लिए बने दिखते थे. अमर के लिए मुलायम राम थे और मुलायम के लिए अमर सिंह छोटे भाई थे. जब भी मैंने अमर सिंह का कोई इंटर्व्यू टीवी पे देखा तो उसमे अमर सिंह को मुलायम के बारे में कसीदे पढ़ते हुए पाया. अपने को कभी मुलायम का भक्त तो कभी राम भक्त हनुमान कहते हुए पाया. 

लेकिन पिछले दिनों एक ही झटके में आज के हनुमान अपने राम से अलग हो गए. सारी यारी-दोस्ती और भक्ति चुल्हे में डाल दिया और तो और हनुमान अपने राम के सबसे बड़े दुश्मन के बारे में कसीदे पढ़ने लगे.

कहीं ये कसीदे इसलिए तो नही पढ़े जा रहे कि राजनीति का यह हनुमान अपने राम के कट्टर विरोधी की गोद में बैठने की तैयारी कर रहा हो. लेकिन अभी कुछ भी कहना अपने आप को झूठा बनाने की तैयारी करना है. सो मैं यह नही कहना चाहूंगा कि अमर मुलायम से अलग होकर माया की जाल में फंसने की तैयारी कर रहे है. फिर वही बात सामने आती है कि यह राजनीति है यहां कभी भी कुछ भी संभव है. 

यह भी हो सकता है कि अमर सिंह  ने बहन जी की तारीफ में जो कुछ भी कहा है वो केवल मुलायम एंड पार्टी को चौंकाने के लिए था, या फिर वो करना कुछ और चाह रहे हों लेकिन मीडिया और मुलायम के नीतिकारों का ध्यान बांटने के लिए ऐसा कहा हो.

खैर, एक बात तो जरुर है कि वगैर आग के लपटें नहीं उठती मतलब अमर सिंह के घर कुछ न कुछ तो पक रहा है.

एक बात तो तय है कि अमर सिंह के इस ब्यान के बाद मुलायम सिंह अपनी साइकिल- सवारी की कला को और बेहतर करने के बारे में सोच रहे होंगे. सोचना भी चाहिए क्योंकि एक बहुत पुरानी कहावत है "घर का भेधी लंका ढ़ाय".

सोमवार, जनवरी 25, 2010

कल एक और गणतंत्र दिवस




हर बार की तरह कल एक और गणतंत्र दिवस का समारोह होगा और आज शाम गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर देश की आम जनता के नाम राष्ट्रपति का संदेश राष्ट्रीय चैनल पर प्रसारित किया जाएगा. इस अवसर पर सब कुछ राष्ट्रिय होगा, सरकारी होगा.


क्या मकसद है इस दिन को मनाने का? मेरे समझ नहीं आता. क्यों जरुरी है राजपथ पर परेड और ये दिखावा? क्या इस दिन को मनाएं बिना हमे इस बात का एहसास नहीं होगा कि हम आज़ाद हैं?

शनिवार, जनवरी 16, 2010

कुछ ऐसा हो जो दिखे

आजकल टीवी की दुनिया में एक भूचाल आया हुआ है. कुछ समाचार चैनल के बड़े पत्रकार त्राहिमाम, त्राहिमाम कर रहे हैं. कोई अपनी खीज फेसबुक पर छोटे-छोटे टॉपिक डाल कर मिटा रहा है तो कुछ बड़े पत्रकार ब्लॉग पर पोस्ट लिखकर अपना दुख जाहिर कर रहे हैं.


लेकिन ये भूचाल, ये छटपटाहट इन पत्रकारों के एक बहुत छोटे से कुनबे में आया है. ऐसा नहीं है कि हर कोई त्रस्त है. कुछ लोग चिल्ला रहे हैं. चीख रहे हैं लेकिन बाकी़ मज़े में हैं.


जो भूचाल आया हुआ है उसका नाम है टीआरपी. जी हां, यह वही साप्ताहिक रिपोर्ट हैं जिसके भरोसे हमारे टीवी वाले ज़िंदा हैं. लेकिन पिछले कुछ दिनों से कुछेक पत्रकार को समाचार पर टीआरपी की मार अखरने लगी है.
आज उन्हें इस बात का अफसोस हो रहा है कि वो समाचार के नाम पर नाटक दिखा रहे हैं और यह पत्रकारिता नहीं है. बिल्कुल सही कह रहे हैं लेकिन एकाएक इस बात का अंदाजा कैसे हुआ इन लोगों को. टीवी से तो समाचार बहुत पहले गायब हो गया था. लेकिन उस वक्त इनलोगों को न तो कोई ऐतराज था और न ही कोई अफसोस.


उस वक्त इन लोगों को टीआरपी से भी कोई एतराज नहीं था. सभी मस्ती में थे. जब एक चैनल ने भूत-पिचास की खबरे दिखानी शुरु की, खबरों में से खबर निकालकर नाटक दिखाना शुरु किया तो उसकी टीआरपी बढ़ गई.
इसके बाद तो सभी चैनल इसी ओर दौड़ने लगे. हर कोई दौड़ा. किसी ने भी रुकने की और सोचने की जरुरत महसूस नहीं की. उस वक्त किसी को भी पत्रकारिता की सुध नहीं थी या कहें तो किसी ने भी इस ओर देखने की जरुरत नहीं समझी.


जब, सब दौडते-दौड़ते थकने लगे, सांस फुलने लगी, चेहरा गंदा होने लगा. आखों से गर्म हवाएं निकलने लगी तो पत्रकारिता और खबर की याद आने लगी.


पिछले दिनों जिन पत्रकारों ने भी ’टीआरपी” को कोसा है, टैम को लेकर पोस्ट या लेख लिखा है वो ऐसे टीवी चैनल के साथ जुड़े हैं जिसकी टीआरपी अच्छी नहीं है. इन बड़े पत्रकारों के चैनल्स ने वो सब कुछ किया जो टीआरपी बटोरने के लिए किया जाना चाहिए लेकिन फिर भी इनकी नैया हिचकोले खा रही है. डगमगा रही है.
इस हालत में इन संपादकों को ऐसा लग रहा होगा कि “न इस पार के रहे न उस पार के’.


तो ख्याल आया कि क्यों न टीआरपी को ही कोसा जाए. ताकि लोगों की नजर में बेहतर पत्रकार की छवी बनी रहे.
जैसा कि ये संपादक अपने लेख में लिख रहे हैं कि टीआरपी से नुकसान हो रहा है और इसे बंद किया जाना चाहिए तो ऐसी ही आवाज उन चैनलों के मालिकों की तरफ से भी आनी चाहिए जो अभी टीआरपी की मलाई खा रहे हैं.


इस बारे में काम करने की जरुरत है. इन लिखाड़ समाचार संपादकों को चाहिए कि वो इस मसले पर अपनी बिरादरी में एक राय बनाएं और कुछ ठोस कदम उठाएं जो फेसबुक, ब्लॉग और अखबार के अलावा उनके चैनलों पर भी दिखे.

रविवार, जनवरी 10, 2010

मीडिया का क्या करें?

पश्चिम बंगाल के एक वयोबृद्ध नेता और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री बिमार हैं. बंगाल के एक अस्पताल में उनका इलाज चल रहा है.

इस तरह के खबरों के बीच एक खबर आती है कि बिमार नेता नहीं रहे. वो स्वर्ग के लिए निकल गए हैं. लेकिन अगले दिन खबर मिलती है कि नेता के मरने की खबर झूठी थी. नेता अभी भी अस्पताल में हैं और मौत से लड़ रहे हैं.

अब कोई बताए कि मीडिया के माध्यम से दी गई उस झूठी खबर के लिए कौन जिम्मेवार है?

क्या कारण है कि किसी के मरने से पहले ही उसके मौत की खबर दे दी जाती है. जब इस तरह की खबर आई तो मुझे अपनी एक दोस्त की बातें याद आने लगी.

कुछ दिन पहले वो एक न्यूज एंजेसी के साथ बतौर पत्रकार काम करती थी. उसने वहां देखा कि जैसे ही कोई नेता या प्रतिष्ठित व्यक्ति बिमार पड़ता है या अस्पताल जाता है तो उन  व्यक्तियों के उपर ऐसे पैकेज तैयार होने लगते हैं जिसे मरने के बाद फौरन चला्या जा सके.

उसने कहा कि ऐसा करते वक्त पत्रकार उस आदमी को मरने से पहले ही अपनी स्क्रिप्ट में मार देते हैं.

लेकिन अब तो ऐसा लगता है कि पत्रकार किसी को केवल अपनी स्क्रिप्ट में ही नहीं मारता बल्कि उस बिमार आदमी को पब्लिकली भी मार देता है.

ये सब देख कर लगता है कि नामी आदमी न बनने में ही भलाई है. कम से कम जिन्दा रहते हुए कोई मारेगा तो नहीं.

आप क्या सोचता हैं?

शुक्रवार, जनवरी 08, 2010

दिल्ली का ये कैसा गांव है?


“मुनिरका गांव” साउथ दिल्ली के बीचों-बीच का एक ऐसा इलाका जो अब केवल नाम के लिए ही गांव है. यहां कुछ भी गांव जैसा नहीं है.  न लोग और न जगह.



फिर भी इसे गांव ही कहा और लिखा जाता है. सवाला उठता है कि अगर इस इलाके में गांव जैसा कुछ भी नहीं है तो इसे गांव क्यो कह्ते हैं?

इसका एक जवाब जो हर कोई बड़ी आसानी से दे देता है कि इस इलाके से सबसे ज्यादा वोट पड़ते हैं सो कोई भी पार्टी इन कथित गांवो पर हाथ नहीं डालना चाहती और इसे जस का तस बने रहने देती है.

लेकिन क्या यही एक कारण है कि मुनिरका जैसे गांव आज भी दिल्ली के बीच में बने हुए हैं. इस इलाके का अगर कोई सर्व कराया जाए या कोई एक बार इस इलाके में आए तो आसानी से यह बात समझ सकता है कि यहां एक खास जाति वर्ग के दबदबा के कुछ भी गांव जैसा नहीं है.

बल्कि मै तो कहूंगा कि यहां गांव के नाम पर एक अराजकता बनी हुई है. अगर आप इस इलाके में रेंट पर रहते हैं तो आपके कोई औकात नहीं है, कोई इज्जत नहीं है.

आप कभी भी, कहीं भी, हल्की सी बात के लिए सामुहिक तौर पर पीटे जा सकते हैं. यहां यह मतलब नहीं रखता की गलती किसकी है? अगर आपकी गलती हुए तब तो कोई कहना ही नहीं है लेकिन अगर आपकी कोई गलती नहीं भी हुई तो भी आप मार खा सकते हैं और कोई कुछ नहीं बोलेगा, कोई नहीं बचाएगा.

अगर आप में से कुछ लोगों को लगे कि मैं किसी पूर्वाग्रह से ग्रसित हो कर ऐसा लिख और बोल रहा हूं तो मेरा मुनिरका आने का निमंत्रण स्वीकार करें.

आएं और खुद अपनी आखों से देखें दिल्ली के इस गांव के रहन-सहन को और फिर फैसला करें. कोई जल्दे नहीं है.

वैसे भी हम लोग कोई फैसला नहीं कर सकते. फैसला करने वाले तो कहीं और बैठते हैं. उन्हें तो मालुम भी नहीं होगा कि कहां क्या हो रहा है.

आज लिख रहा हूं लेकिन यह सब पिछले तीन साल से देख रहा हूं. मुझे समझ नहीं आता कि क्यों यह आज भी गांव कहा जाता है. मुझे इसका ठीक-ठीक कारण नहीं पता सो मैं कोई जवाब देने की हालत में नहीं हूं.

अगर आपके पास कोई जवाब हो तो जरुर दीजिए.