रविवार, जनवरी 15, 2012

एक बच्ची की जिद-जुनून से बदली तसवीर-तकदीर


दस साल पहले की बच्ची अनिता आज अपने गांव -जवार के लिए प्रेरणा बन चुकी है.

बिहार में मुजफ्फरपुर जिले के एक गांव पटियासा जलाल की रहने वाली है अनिता. कुशवाहा बहुल गांव है यह. समाजशास्त्र से एमए की पढ़ाई पूरी कर चुकी अनिता से मिलने पर, बोलने-बतियाने पर किसी सामान्य लड़की की तरह ही दिखती-लगती हैं. लेकिन बात उद्यमिता पर आती है तो किसी सधी हुई उद्यमी की तरह गुणा-गणित से लेकर अन्य तरीकों को ऐसे समझाती हैं, जैसे बचपन से अनिता को किसी संस्थान में इसकी विधिवत ट्रेनिंग दी गयी हो. अनिता की बातों में इरादों के प्रति दृढ़ता का भाव, अदम्य साहस और मुसीबतों-चुनौतियों से लड़ने का माद्दा उन्हें सामान्य लड़कियों से अलग कतार में खड़ा कर देता है.

बचपन से अनिता को उद्यमिता की ट्रेनिंग तो कहीं नहीं मिली लेकिन खुद के बुते मात्र बारह साल की उम्र में ही अनिता ने खुद के लिए रास्ता खोजा, जो आज उनके गांव ही नहीं पूरे इलाके के लिए प्रेरणा का स्रोत बन संभावनाओं के नये द्वार को खोल रहा है. अनिता का वह फैसला था मधुमखी पालन का. आज अनिता खुद लगभग शहद के कारोबार से साल में तीन लाख रुपये की कमाई कर रही है. अनिता की बनायी लीक पर चल पूरा गांव-जवार भी हजार से लाख का आंकड़ा छू रहा है. अनिता पर यूनिसेफ वृत्तचित्र बना चुकी है, नाम दूर-देस तक फैल रहा है लेकिन एक नन्हीं बच्ची के लिए यह सब इतना आसान नहीं था.

मधुमक्खियों के नाम से ही डरने की उम्र में अनिता उनके साथ रचने-बसने-खेलने का फैसला लीं थी. उस समाज में, जहां मैट्रिक के बाद लड़कियों के लिए संभावनाओं के सारे द्वार ससुराल में खोलने की कोशिश शुरू कर दी जाती है. अनिता उन दिनों को याद करते हुए बताती हैं- तब मैं नौंवी क्लास में पढ़ती थी. मधुमक्खी पालन का फैसला ली तो अचानक ही मानो विरोध का पहाड़ टूट पड़ा. मेरे फैसले का घर से बाहर तक खूब विरोध हुआ. पिता एक खेतिहर मजदूर थे. घर की स्थिति भी ठीक नहीं थी. फैसले का विरोध करते हुए किसान पिता ने दो टूक शब्दों में कह दिया था- यह कतई संभव नहीं, नामुमकिन है, क्योंकि यह काम लड़कियों का नहीं. अनिता अपने पिता से जुबान तो नहीं लड़ा सकी लेकिन हार भी नहीं मानी. पिता के प्रतिकूल फैसले के बाद मां को अपने पक्ष में किया. मां के सहयोग से अनिता ने चार हजार रुपय में मधुमखी के दो बक्से खरीद लिए.
फैमली फोटो: अनिता के साथ उनका समूचा परिवार आज मुसकुरा रहा है.
अनिता खुल के हंसते हुए बताती हैं- ““ं...तब मैं छोटी थी. मेरे घर के सामने जो लिची बगान है (हांथ से घर के सामने के लिची बगान की तरफ इशारा करती हैं.) इसमे लिची के सीजन में बाहर से बक्से आते थे. मुझे याद है कि शुरू के दो चार दिन तो मैं वहां इस लालच के साथ जाती थी कि ताजे शहद चखने को मिल जाएंगे. लेकिन फिर पता नहीं कब मुझे उन्हें काम करते देखना अच्छा लगने लगा. उनका बक्से की सफाई करना. हनी चेंबर (बक्से में दो अलग-अलग चेंबर होते हैं जिसमें से एक को हनी चेंबर कहा जाता है क्योंकि इसी चेंबर में मधुमखियों द्वारा जमा किया गया शहद रहता है.) से शहद निकालना. बिमार मक्खियों को दवा देना आदि-आदि. धीरे-धीरे मुझे इन कामों को देखने में मजा आने लगा. करीब-करीब दस दिन लगातार घंटो उनके साथ बैठने के बाद मुझे लगा कि अरे...यह काम तो बहुत आसान है. बस फिर क्या था. शुरुआत हो गई”

बचपने में अपने घर के सामने मधुमक्खी पालन देखने जाना, उसके साथ खेलना, काम करना ही अनिता के लिए मधुमक्खी पालन और उद्यमिता की ट्रेनिंग भी होती रही. काम शुरू करने के करीब-करीब सालभर बाद अनिता ने राजेन्द्र कृषि विश्वविद्यालय, पूसा से छह दिवसीय प्रशिक्षण कोर्स में हिस्सा लिया. अनिता ने दो बक्सों और चार हजार की पूंजी के साथ जो शुरुआत की थी उसके अच्छे नतीजे आए. एक सीजन जो की छह से सात महीने का होता है. इसमें अनिता को छह हजार का मुनाफा हुआ. फायदा हुआ तो अनिता ने एक बार फिर अपने किसान पिता को समझाया. अनिता कहती हैं, जब फायदा हुआ तो पिताजी को भी बातें समझ में आ गयीं और वे मना करने की बजाय खुद भी हमारे साथ हाथ बटाने लगे.

पिता के सहयोग से अनिता का मनोबल बढ़ा. घर से अनिता का विरोध बंद हुआ तो गांव-समाज ने दुत्कारना और तरह-तरह की बातें शुरू की. अनिता ने परवाह नहीं की. अगले सीजन में कुल सौ बक्सों के साथ काम करना शुरू की. अनिता बताती हैं,‘‘ एक दिन जब मैं साइकिल से कॉलेज जा रही थी तो पड़ोस की बसंती चाची ने रोककर जो समझाया  वो आज भी नहीं भूल पाती. चाची ने मुझसे कहा कि यह काम मर्दों का है. एक लड़की हो कर मुझे इस काम में टांग नहीं फंसाना चाहिए. इससे गांव की हंसाई होगी और दुसरी लड़कियों के शादी-ब्याह में भी दिक्कत होगी. तब से लेकर आज तक बहुत से लोगों ने बहुत कुछ कहा. मुझसे, मेरे घरवालों से लेकिन मैंने किसी को कभी कुछ नहीं कहा. क्योंकि मुझे कुछ कहने के बजाय काम करने में मजा आता था और आज भी आता है.”

लगाव: अनिता मधुमंखियों से एक जुड़ाव महसूस करती हैं. 
अनिता की मां रेखा देवी कहती हैं कि यह सब अनिता ने किया है, हमने तो सिर्फ अपना फर्ज निभाकर उसका नैतिक समर्थन किया. अनिता की मां बताती हैं, देखते ही देखते बहुत कुछ बदल गया है हमारे घर-परिवार और समाज में भी.  वह कहती हैं, जिस पक्के मकाने के नीचे आप और हम बैठे हैं. वहां तीन-चार साल पहले तक एक  छोटी सी झोपड़ी हुआ करती थी. जिसमें दाखिल होने के लिए कमर तक झुक जाना पड़ता था. और भी बहुत कुछ बदला. आज मेरे दोनों बेटे पढ़ रहे हैं. हमलोग ठीकठाक खा-पी रहे हैं. पहले तो कई बार खाने की भी दिक्कत हो जाती थी.

यह तो अनिता के घरवालों की बात हुई. घर-परिवार से बाहर गांव और जवार में भी ऐसे परिवर्तन अनिता की बदौलत हो रहे हैं. अनिता ने गांव की अपनी चाची, भाभी और बहनों को भी इस तरक्की में शामिल करने के बारे में सोंचा. गांव की महिलाओं को इकठ्ठा कर के उसने उन्हें समझाया कि वो सभी भी मधुमक्खीं पालन कर सकती हैं. और अपने परिवार को आर्थिक मदद  पहूंचा सकती हैं. सबसे पहले अनिता के कहने पर उसकी उसी चाची ने काम शुरु किया जिसने कभी उसे कहा था कि यह काम लड़कों का है और लड़की होकर उसे इस काम में टांग नहीं फंसाना चाहिए. गांव की बसंती देवी कहती हैं कि उन्होंने शुरू-शुरू में अनिता को मना जरुर किया था लेकिन आज उन्हें इस बात का गर्व है कि अनिता इस गांव की बेटी है. बसंती के साथ उनके तीनों बेटे भी अब मधुमक्खी पालन का ही काम करते हैं. अपने परिवार में आए बदलाब के बारे में बताते हुए बसंती कहती हैं, “ तीन साल से इस व्यवसाय में हैं. आज मेरे तीनों बेटे के पास अस्सी-अस्सी बक्से हैं. सब अपना-अपना काम कर रहे हैं. लेकिन तीनों बेटो ने मिलकर घर बना लिया है. शरमाते हुए कहतीं है, “रंगीन टीवीओ लग गई (गया) है.”

आज से एक दशक पहले अनिता ने अनजाने में ही जिस बदलाव की नींव रखी थी उसका ही यह कमाल है कि आज अनिता द्वारा बनाए गए सेल्फ हेल्प ग्रुप में दो सौ महिलाएं हैं. गांव के लगभग हर घर में मधुमक्खी पालन हो रहा है. कभी खेती-पथारी में मजदूरी और दिहाड़ी पर मजदूरी करने वाले मर्द व्यवसायी हो गए हैं. देहरी से बाहर भी कदम रखने में हिचकनेवाली और बंदिशों से मजबूर महिलाएं कुरुक्षेत्र (हरियाणा) और लुधियाना (पंजाब) से घुम कर और मधुमक्खी पालन के नए-नए तरीके सीख रही हैं और गांव में प्रयोग कर रही हैं. शहद की बड़ी कारोबारी कंपनियों के एजेंट अब अनिता के गांव तक पहुंचते हैं.

यह सब तो तत्काल प्रभाव के नमूने हैं. कुछ बदलाव ऐसे भी हुए हैं, जिसका असर बाद के दिनों में दिखेगा. 2002 से पहले तक जिस गांव में लड़कियों को ज्यादा पढ़ाना बेकार समझा जाता था. आज स्थितियां ठीक उलट गयी हैं. कभी अनिता के मधुमखी पालन करने के फैसले पर विरोध दर्ज करानेवाले सत्यनारायण कुशवाहा कहते हैं. “ ऊ सब बात छोडि़ए. हम त पुराने लोग हैं सो बुरा लगा त बोल दिया लेकिन ई लड़कया ने जौन किया वो बिना पढ़े-लिखे नहीं हो सकता था. इहेलिए अब लड़कियों को भी बहुते पढ़ाना-लिखाना है. ऊ जौनो काम करना चाहेंगी उसे करने देना चाहिए. समय बदल रहा है.”

भी अब समय की बदलाव को भांप रहे हैं और यह सब संभव हुआ इस नौवी की छात्रा अनिता के उस प्रयास की वजह से जिसे उसने चुप-चाप आकार दिया. बगैर कुछ बोले.  बगैर किसी को कुछ समझाए. अपने पूरे गांव को यह समझा दिया कि हवा बदल रही है.

गुरुवार, दिसंबर 29, 2011

"लोकपाल" गीत, कविता या फिर आप जो समझ के पढ़ लें!


 लोकपाल बिल पास हुआ. जन लोकपाल न सही, सरकारी वाला ही. पूरा नहीं थोड़ा ही सही. वैसे भी कब्ज में पूरा का पूरा तो, एक बार में कयम चुर्ण से भी नहीं निकलता. फिर ये तो सरकार के लिए पुराना कब्ज जैसा लग रहा था. सभी के सभी नेता ऐंठ रहे थे. कई दिनों से. थोड़े से के निकलने पे ही सब ने थोड़ी चैन तो ली होगी. खैर, गांधीवादी डॉक्टर लगे हुए हैं, कह रहे हैं कि पूरा निकाल के ही दम लेंगे.

 चलिए...अच्छा है...

अभी तो आप इस गंभीर विषय से जुड़ा मेरा एक बिल्कुल ताजा माल पढिए. यकिन मानिए. अगर आप सामने होते तो पूरे सुर में सुनाता. बिल्कुल "डॉ. कुमार विश्वास" की तरह. कोई नहीं! अभी नहीं तो फिर कभी. बिना अफसोस किए  इसे पढिए और अगर आपतक वही बात  पहूंचे जो हम पहूंचाना चाहते हैं तो ताली के बजाय  "कमेंट" पोस्ट कर जानकारी दीजिएगा (यह तरीका कुमार विश्वास का है. यहां, इतनी तो तमीज है कि जिसका जो माल है उसे उसका क्रेडिट दे दिया जाए)


सरकार बहादूर कर गए मनमानी, अन्ना का अनशन पड़ा न भारी.
कंग्रेस कहे हमने किया, वायदा पूरा. ले आए और पास कराया लोकपाल बिल, पूरा.
बेजेपी लगे है बिलबिलाए,  जैसे खा ली हो ललका मिरचाई.


टीम अन्ना के पांव जमे हैं. हुकारों पे हुंकार फूंके है.
"बिगुल लड़ाई की बजती रहेगी"-टीवी ने,  अन्ना उपवाच बाताए.
सब ने जम के प्रोमो चलाए फिर दिओ ब्रेकिंग-ब्रेकिंग चिल्लाए.


नए-नए लड़कवन ने खुबे "मैं हूं अन्ना" टाईप टोपिया लहड़ाए.
दिल्ली छोड़, मुंबई जमाए...
सब के सब, संसद और सांसद को हैं खुबे गरियाए.
 सब हैं चोर साले-  हर कोई यही है बतिआए.


ई सब के बीच, भ्रष्टाचार है देखो मुस्काय.
कहे-"पहले अपने में फरियाओ......
फिर बच-बचा जाओ तो हमरी तरफ(भ्रष्टाचार) की तरफ आओ."

(भ्रष्टाचार के खात्मे के लिए खुद को मिटा तक देने वाले उन क्रांतिकारी दोस्तों को एक सप्रेम भेंट जिनमे मुझे ही नहीं पूरे देश को भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव दिखाई पड़ रहे हैं. मित्रों आपके माथे की यह गांधीकट-अन्ना वाली टोपी एक दिन जरुर रंग लाएगी. बस आप लोकपाल लाओ का नारा पूरे मन से बुलंद करते रहें. बस कुछ ही दूरी पर वह भारत है जो भ्रष्टाचार से मुक्त है. बिल्कुल तैयार आपके लिए.)

सोमवार, नवंबर 21, 2011

चलाचली की बेला में छत्तर का मेला...



दस नवंबर की सुबह छ: बजे का समय. पटना को उत्तर बिहार से जोड़ने वाली गांधी सेतू पर बड़ी और छोटी गाड़ियां एक लाईन से खड़ी हैं. यातायात पूरी तरह ठप्प है. केवल मोटरसाइकलें निकल पा रही हैं.  अहले सुबह सेतू पर यातायात ठप्प होने एक मात्र कारण है- आज कार्तिक पूर्णिमा का होना और आज से ही विश्व प्रसिद्ध सोनपुर मेले का आरंभ होना.  माथे पर गठरी रखे, छोटे बच्चों का हाथ पकड़े और  खुद से न चल पाने वाले छोटे बच्चों को गोद में चिपकाए लोगों का रेल्ला सोनपुर की तरफ बढ़ रहा है. इस रेल्ले में औरतों की संख्या मर्दों की तुलना में ज्यादा  मालूम होती है.

यह रेल्ला, कार्तिक पूर्णिमा के अवसर  पर गंगा में डुबकी लगाने, स्थानीय हरिहरनाथ मंदिर में जल चढ़ाने और साल में एक बार लगने वाले छत्तर मेला (सोनपुर मेला का स्थानिय नाम) में घुमने, खरीदारी करने, तरह-तरह  के करतब  देखने और खाने-पीने के लिए आसपास के ज्यादातर इलाकों से, हर साल निकलता है. मेला देखने और गंगा स्नान करने के लिए आनेवाले, मेला स्थल और गंगा घाट तक पहूंचने के लिए करीब-करीब सात से आठ किलोमीटर की दूरी पैदल तय करते है क्योंकि कार्तिक पूर्णिमा के दिन होने वाले विशाल जुटान को देखते हुए स्थानीय प्रशासन हाजीपुर से सोनपुर की तरफ जाने वाली गाडियों को बद करवा देता है.

कार्तिक पूर्णिमा से शुरू होकर अगले पच्चीस-तीस दिनों तक चलने वाले इस सोनपुर मेले को देश-दुनियां में एशिया के सबसे बड़े पशु मेले के तौर पर जाना जाता है लेकिन मेले की यह पहचान पिछले कुछ सालों से मिटती जा रही है. मेले में बिक्री के लिए आने वाले पशुओं की संख्या लगातार घटती जा रही है. चाहे वो दुधारू मवेशी गाय और भैंस हो या पूर्व में शान की सवारी समझे जाने वाले हाथी, घोड़ा या उंट हों. शुरू-शुरू में इस मेले में पूरे मध्य एशिया से व्यापारी पर्शियन नस्ल के घोड़ों, हाथी, अच्छी किस्म के ऊंट और दुधारू मेवेशियों के लिए यहां तक आते थे. लेकिन यह सिलसिला पिछले कुछ सालों से बंद है. अब इस मेले में जानवरों की खरीद-बिक्री न के बराबर होती है. कहें तो अब यह मेला बड़े जानवरों की प्रदर्शनी भर बन के रह गया है.  इस बार के मेले में गोरखपुर से अपने हाथी के साथ आए उदय ठाकुर बड़े शान से कहते हैं, "अब हाथी तो मुश्किल से ही इस मेले में बिकें लेकिन हम तो इस बार मेले में केवल चार  हाथी घुमाने के लिए आते हैं. हाथी है. मेले में लाएं हैं. मेला घुमाएंगे और वापस ले जाएंगे" बातचीत में उदय ठाकुर बताते हैं कि गोरखपुर से यहां तक हाथी को आने में दो सप्ताह का समय और उन्हें बीस हजार का खर्चा आया है. इस बातचीत से यह तो साफ हो जाता है कि अब यहां जानवरों के खरीदार नहीं आते. जब खरीदार ही नहीं आएंगे तो कौन केवल शौक के लिए या जानवर को मेला घुमाने के लिए बीस हजार रुपए लगा कर यहां तक आएगा. यह समस्या सोनपुर मेले के स्वर्णिम इतिहास को धीरे-धीरे मिटाता जा रहा है.
जानवरों के अलावा मेले में जरुरत की हर छोटी-बड़ी चीजों की दुकाने सजी हैं. बच्चों के मनोरंजन के लिए मौत का कुंआ, इक्षाधारी नाग-नागीन का खेल, झूले और खेल-खिलौनों की दुकाने लगी हैं तो दूसरी तरफ जवान लड़कों और मर्दों  के मनोरंजन के लिए कई थियेटर कम कपड़े पहने लड़कियों  के आदमकद  कटआउट्स लगाए मेले में खड़े है. थिएटरों में काफी कम छोटे कपड़े पहने हुए लड़कियों के नाच शाम से शुरू  हो जाते हैं और फिर देर रात तक केवल थिएटर के अंदर और बाहर ही चहलपहल दिखती है. यह एक विडंबना ही है कि पशुओं के लिए विख्यात  मेले में आज इन थिएटरों का प्रमुखता से कब्जा है. मेले की हालिया पहचान भी इन थिएटरों से ही जुड़ रही है.   थिएटरों पर नाच की आड़ में अश्लीलता परोसने के आरोप भी लगे हैं और इन आरोपों की वजह से एक बड़ा वर्ग सोनपुर मेले को ही अश्लील मानने लगा है और इस तरफ रुख करने से बचने लगा है.

 अपनी असल पहचान खोते और अश्लीलता का आरोप झेलते इस मेले का इतिहास काफी पुराना और दुरुस्त है. माना जाता है कि यह मेला मौर्यकाल से लगता आ रहा है. चंद्रगुप्त मौर्य, सेना के लिए हाथी खरीदने हरिहर क्षेत्र आते थे. 1888 में यहीं पर सर्वप्रथम गोरक्षा पर विचारगोष्ठी का आयोजन हुआ था.  स्वतंत्रता आंदोलन में भी सोनपुर मेला बिहार की क्रांतिकारी गतिविधियों का केंद्र रहा है. वीर कुँअर सिंह लोगों में अंग्रेजी हुकूमत से संघर्ष के लिए जागरूक करने और अपनी सेना में बहाली के लिए यहां आते थे. अंग्रेजों के शासनकाल में ही इसे "एशिया का सबसे बड़ा पशु-मेला" नाम दिया गया था.

 हालाकिं तमाम आरोपों और मेले के मिटते जाने की शंका और आशंकाओं के बीच इस मेले में आने वाले आम देहाती लोग को देखने-सुनने के बाद ऐसा लगता है कि ये लोग अपनी परेशानियों को पीछे छोड़ के यहां आते हैं. जमकर मस्ती करते हैं. जरुरी के सस्ते सामानों की खरीददारी करते हैं. खाते-पीते हैं और मेले के बारे में बोलते-बतियाते शाम ढ़ले अपने घर को लौट जाते हैं. मेले में आने वालों की संख्या और उनके मिजाज को देखकर इतना तो विश्वास हो ही जाता है कि सोनपुर मेला देहात की आम जनता का अपना मेला है.

जलढ़री: सोनपुर मेला, कार्तिक पूर्णिमा के दिन से प्रारंभ होता है. इस दिन को गंगा में स्नान करने और सोनपुर के हरीहर नाथ मंदिर में भगवान विष्णु की मुर्ति पर गंगा-जल से जलढ़री करने का रिवाज है. इस मौके पर राज्य के दूर-दराज वाले इलाकों से भी भक्तों की भीड़ गंगा स्नान करने और हरीहर नाथ मंदिर में जल चढाने है. 


 हाथी-बाजार: सोनपुर मेले को एशिया में सबसे बड़े जानवरों के मेले के तौर पर जाना-पहचाना जाता है. लेकिन मेले की यह पहचान बड़ी तेजी से सिमट रही है. इस बार के मेले में केवल चार हाथी आए. इस हाथी का नाम है-राजा. हाथी के मालिक गोरखपुर के रहने वाले उदय  ठाकुर हैं. 

 

नौटंकी  की जगह  थिएटर कंपनियां: पहले, तीस दिनों तक चलने वाले  मेले में दूर-दूर  के व्यापारी, जानवर  खरीदने-बेचने वाले आते थे और तीस दिनों तक स्थायी तौर पर यहीं रहते थे सो मेले में नौटंकी दिखाने वाले भी भारी मात्रा में आते थे और  लैला-मजनूं और  दही वाली गुजरी की कहानियों का मंचन कर के लोगों का मन बहलाती थीं. आज नौटंकी वाले, वालियों की जगह बड़ी-बड़ी थिएटर कंपनियों ने ले लिया है और पराम्परिक कहानियों के मंचन की जगह  फिल्मी आयटम  सॉंग और भोजपुरी गानों पर  होने वाले अश्लील नाच ने ले लिया है.


 आराम का वक्त: अकसर  लोग मेले में घूमते-घूमते थकान महसूस करने लगते हैं. अपनी थकान को भगाने के लिए लोग मेले के बगल वाली साधू गाछी (आम का बागीचा जिसे साधू गाछी के नाम से जाना जाता है.) में बैठ, आपस में बतियाते, कुछ खाते-पीते और एकाध झपकी लेते देखे जाते हैं. 
 
 
 कमाई का आसान रास्ता: तस्वीर में कंधे पर बांसुरियों को लादे जो लड़का खड़ा है वह दस  वर्षिय “अरमान” है. अरमान, बांसुरी बेचने का काम करता है. वैसे तो उसे बांसुरी बेचने के लिए हर रोज इलाके के अलग-अलग जगहों पर पैदल जाना होता है. लेकिन अगल कुछ दिनों तक  अरमान  आसानी से हर रोज दो सौ रुपय की कमाई करता रहेगा. उसे केवल इतना भर करना होगा कि अपनी बांसुरियों के साथ मेले में आ के खड़ा हो जाए.
 
 
 खरीद-बिक्री: वैसे तो यहां हर  तरह  के सामानों की खरीद-बिक्री होती है लेकिन इस मेले में श्रिंगार-पटार के सामानों को बेचननिहार और खरीदने वाली महिलाएं बहुलता से दिखती है. मेले में हर तरफ, सड़क  किनारे लगाए गए किसी छोटे से दुकान पर  गवईं औरतों की टोली श्रिंगार के सस्ते सामानों की खरीददारी करती दिखती हैं.
 
 
खेल-तमाशा: मेले में हर तरफ कोई न कोई खेल-करतब  चलता रहता है लेकिन “मौत का कुआं” का कतरब  देखने  वालों की संख्या सबसे  ज्यादा होता है. इस खेल में दो मोटरसाईकिल  चालक लकड़ी की खड़ी दिवार पे मोटरसाईकिल दौड़ाते हुए तरह-तरह  के  करतब  दिखाते हैं. दर्शक, दस रुपय का टिकट लेकर इस खेल का मजा लेते हैं और चेहरे पे आश्चर्य का भाव लिए बाहर निकलते हैं.


घुड़दौड़: इलाके के पुराने लोग बताते हैं कि कालांतर में घोड़ों की यह दौड़ इसलिए हुआ  करती थी कि खरीददार अच्छे नस्ल के घोड़ों को पहचान सकें, चाल देख सकें. लेकिन पिछले कुछ वर्षों  के दौरान मेले में आने वाले घोड़ों की संख्या और घोड़ों के खरीददार दोनों में भारी कमी आई है. फिलहाल यह दौड़ मेले में आने वालों का मनोरंजन करती है.

 

सोमवार, नवंबर 07, 2011

यात्रा के निहितार्थ...

आगामी चौबीस नवबंर को नीतिश कुमार के नेतृत्व वाली मौजूदा राज्य सरकार के कार्यकाल का एक साल पूरा हो जाएगा. लेकिन सरकार द्वारा एक साल पूरा किए जाने की चर्चा कहीं नहीं दिखेगी. क्योंकि इसी माह की नौ तारीख को नीतिश बाबू “सेवा यात्रा” पे निकल रहे हैं. जाहिर सी बात है कि जब मुख्यमंत्री राज्य के दौड़े पे है  तो मीडिया उस यात्रा को ही कवर करने में अपना ज्यादा समय और पन्ना खर्चेगा. यात्रा को छोड़ के कौन इस तरफ ध्यान देना चाहेगा कि बीते एक साल में मौजूदा सरकार ने राज्य की जनता के लिए क्या-क्या किया? कौन-कौन से निवेश इस एक साल में राज्य की जमीन पे उतड़े.?  आमजन को प्रभावित करने वाले कौन-कौन से फैसले सरकार ने लिए? नीतिश के सुशासन राज्य में जो बियाडा जमीन घोटाले की बात सामने आई उस केस में क्या प्रगति हुई? फारबिसगंज में जो गोली चली और जो पुलिसिया तांडव हुआ उसके लिए चार माह बाद  भी किसी को अभी तक सजा क्यों नहीं मिली?

इसमे कोई शक नहीं कि नीतिश ने राज्य के पिछले आरजेडी शासन से बेहतर शासन व्यवस्था स्थापित करने की कोशिश की है और कुछ मामलों में इनकी सरकार ने सफलता भी हासिल की है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं हुआ कि नीतिश सर्वेसर्वा हो गए. और इनकी सरकार में कोई खामी या कमी है ही नहीं. राज्य की मीडिया द्वारा अभी तो सरकार की कमियों को छुपाया जा रहा है लेकिन यह स्थिति ज्यादा दिनों तक नहीं रह सकती है. यह बात नीतिश कुमार और उनके सहयोगियों को समझ लेनी चाहिए. 

खैर, अभी नवबंर का महीना है और जैसा कि मैंने उपर ही कहा कि इस महीने मीडिया में ज्यादातर बातें नीतिश कुमार की “सेवा यात्रा” की ही होंगी तो क्यों न हम भी यहां “सेवा यात्रा” और इसी के साथ शुरु हो रहीं  कुछ दूसरी यात्राओं तक अपना फोकस रखें. जी हां…इस महीने नीतिश ही अकेले यात्रा पे नहीं होंगे. राज्य की राजनीति में अपने लिए जगह की तलाश में गांव-गांव घुमने लालू यादव भी निकलेंगे और सबसे मजेदार बात- नीतिश सरकार की सहयोगी पार्टी बीजेपी के राज्य अध्यक्ष डॉ. सी.पी.ठाकुर  भी भ्रष्टाचार के खिलाफ अलख जगाने की चाहत लिए पूरे राज्य की यात्रा पर संभवत: इसी महीने में निकलेंगे. सी.पी. ठाकुर अपने यात्रा की शुरूआत कहां से करेंगे और किस तारीख को करेंगे इसकी घोषणा तो अभी नहीं हुई है लेकिन इतना तय मानिए कि इनकी यात्रा नीतिश  की “सेवा यात्रा”  के कुछेक दिन आगे ही शुरू होगी.

जिस दिन नीतिश अपनी “सेवा यात्रा” पश्चिम चंपरण से शुरु करेंगे ठीक उसी दिन आरजेडी सुप्रिमो लालू यादव गया से अपनी यात्रा ’गांव-गांव” के लिए रवाना होगें. नीतिश अपनी यात्रा में गांव-गवई का औचक निरिक्षण करेंगे (निरिक्षण कितना औचक होगा इसका तो उपर वाला ही  मालिक है) और देहातों में चल रही योजनाओं के बारे में जानकारी लेंगे. ऐसा दावा है मुख्यमंत्री के दफतर का. लेकिन कौन बुद्दू नहीं जानता कि इन यात्राओं का मतलब होता है लोगों के साथ सरकारी खर्चे पे जनसंपर्क. जिसका फायदा यात्रा करने वाले को अगामी चुनाव में मिलना तय माना जाता  है.

नीतिश की यात्रा के लिए पूरा सरकारी अमला है तो दूसरी तरफ लालू के लिए केवल उनके कार्यकर्ता जिनकी संख्या भी अब काफी कम हो गई है. नीतिश के लिए अपनी यात्रा में बोलने के लिए काफी कुछ है. पता नहीं लालू अपनी यात्रा में राज्य की जनता से क्या कह रहे हैं. क्योंकि फिलहाल ज्यादातर मौकों पर वो खूद बोलते-बोलते भुल जाते हैं कि क्या कह रहे थे और आगे क्या कहना है. तब उनके अगल-बगल में बैठे लोग धीरे से उनके कान में फूंक मारते और फिर लालू बोलने लगते. लेकिन नीतिश के साथ ऐसा नहीं है. वो किसी भी मंच पे बोलने के मामले में रत्ति भर भी नहीं चुकते. खूब बोलते हैं और चबा-चबा के बोलते हैं. यह नीतिश की वाकपटुता ही है कि उनके द्वारा राज्य में विकास के नाम पे कुछ सड़के ही मोटे तौड़ पे देखती हैं लेकिन वो सारी वाहवाही अपने नाम किए जा रहे हैं.

जैसा की लेख के शुरू में ही बताया गया कि नीतिश और लालू की यात्राओं के साथ एक यात्रा सी.पी. ठाकुर की भी है. बीजेपी की इस यात्रा का मतलब साफ है कि वो अब नीतिश को अकेले सारी वाह-वाही लेने देने के मूड में नहीं है. भगवा पार्टी पहले ही इस बात से खफा है कि नीतिश की पार्टी राज्य में हो रहे ज्यादातर विकास का लाभ लपक ले रही है और बीजेपी सहयोगी और प्रमुख पार्टी होने के बाद भी मुह ताकती रह जा रही है. कुछ हलकों में तो बीजेपी की इस यात्रा को आगामी लोकसभा के चुनाव में जेडीयू और बीजेपी में होने वाले लगवा की तैयारी से भी जोड़ के देखा जा रहा है. तैयारी हो भी क्यों न. राजनीति में कोई भी रिश्ता पर्मानेंट थोड़े न होता है. लेकिन बीजेपी द्वारा घोषित यह यात्रा हड़बड़ी में घोषित यात्रा लगती है. किसी दूसरी यात्रा के बारे में सोंचना चाहिए था. अभी-अभी तो आडवाणी अपनी भ्रष्टाचार विरोधी यात्रा लेकर बिहार से गुजरे हैं तो फिर  से एक भ्रष्टाचार विरोधी यात्रा. फंडा कुछ जम नहीं रहा.

मतलब अगर दो टूक शब्दों में कहें तो नवंबर का महीना यात्रामय होगा लेकिन तीनों की तीनों यात्राएं करने वालों से राज्य की जनता को कुछ खास मिलेगा नहीं. क्योंकि तीनो यात्री इन यात्राओं से कुछ न कुछ पाने की आस लिए निकल रहे हैं. हां…नीतीश की यात्रा से राज्य की जनता का कुछ पैसा बरसात की पानी के तरह जरुर बह जाएगा.  नीतीश राज्य में बने रहने के लिए यात्रा पर हैं. लालू यात्रा के माध्यम से राज्य की सत्ता में लौटने का प्रवेश द्वार खोज रहे हैं और डॉ. ठाकुर अपनी यात्रा से नीतिश और जेडीयू को  एक प्राईवेट मैसेज  चाहते हैं कि अब बस.

शुक्रवार, अक्टूबर 21, 2011

खोज...


ये आखें, मेरी सांसे-

शहर की भीड़ में,
चौक की चाय दूकान में
गांव की आरमियत में,
खेत-खलिहान में,
मेले  और रेले में,
राजनितिक या सामजिक सेमिनार में,
हर सभा और संगत में,
तुम्हे खोजती हैं.

महसूस तो करता हूं, तुम्हे. लेकिन दिखती नहीं हो, कहीं.
क्यों भला?

शुक्रवार, अक्टूबर 14, 2011

सिविल सोसाईटी सदस्य: ये क्या हो रहा है?


टीम अन्ना के एक प्रमुख सदस्य हैं, प्रशांत भूषण. इन्हें देश के एक वरिष्ठ वकील के तौर पे भी जाना जाता है. कुछेक दिन पहले प्रशांत ने कश्मीर समस्या के उपर अपनी राय दी. प्रशांत ने जो कहा उसे यहां दुहराने की जरुरत नही है लेकिन उस प्रतिक्रिया के बाद प्रशांत भूषण के साथ जो व्यवहार किया गया उसकी निंदा होनी चाहिए. आरोपियों को पकड़ा जाना चाहिए और उन्हें समझाया जाना चाहिए कि इस देश में हर किसी को बोलने का अधिकार है, अपनी बात रखने का अधिकार है लेकिन किसी के साथ मार-पिटाई करने की छुट किसी को भी नही है.

खैर, इस धटना के बाद टीम अन्ना के दूसरे सदस्य जिस तरह से प्रशांत भूषण से किनारा कर रहे हैं. अन्ना हजारे जो बयान दे रहे हैं वो उस दुखद घटना से भी ज्यादा पीड़ादायक है. और इस तरह के बयान से यह भी साफ हो रहा  है कि टीम अन्ना के लिए इस देश में केवल एक समस्या है, भ्रष्टाचार. जबकि ऐसा कतई नहीं है. भ्रष्टाचार इस देश के लिए एक बड़ी समस्या है. इसमें कोई शक नही. कोई अपत्ति नही.

लेकिन इसके अलावा भी बहुत बड़ी-बड़ी सममस्याएं हैं इस देश में. जैसे- कश्मीर समस्या, नक्सल समस्या, गरीब-मजदूरों की समस्या और पूर्वोत्तर राज्यों की समस्या. क्या इन समस्याओं पे बात नही होनी चाहिए?

पिछले कुछ दिनों में अन्ना हजारे और उनके साथी सिविल सोसाईटी के नेता और प्रवक्ता के रूप में सामने आए हैं. अपने-आप को सिविल सोसाईटी के रूप में देश के सामने पेश किया है. देश के एक बड़े वर्ग का समर्थन भी मिला. फिर क्या दिक्कत है? क्या यह माना जाए कि अन्ना को जो समर्थन मिला था वो केवल जनलोकपाल के मुद्दे पे मिला था?

इसमे कोई शक नही कि प्रशांत जैसे  बयान के बाद टीम अन्ना को मिला कथित विशाल जन समर्थन एक पल में हवा हो जाएगा. प्रशांत क्यों, स्वयं अन्ना ही कश्मीर या पूर्वोत्तर के बारे में एसे बयान देते जो कि जायज है और व्यवहारिक भी है तो उनके साथ भी ऐसी घटनाएं घट सकती हैं. लेकिन इस डर से चुप रहना भी तो जायज नहीं है. भ्रष्टाचार के आलावे जो गंभीर समस्याएं हैं इस देश में और उन प्रॉबलेम्स से जुझ रहे लोग भी तो सिविल सोसाईटी का ही हिस्सा हैं.

 उनके लिए भी तो अन्ना को हुंकाराना चाहिए. किरण वेदी को तिरंगा लहराना चाहिए, अरविंद केजरिवाल को हर टीवी शो में जा कर अपनी बात रखनी चाहिए और प्रशांत भूषण और उनके पिता को कानूनी किताबों में आंख गड़ाना चाहिए. लेकिन ऐसा करने के बदले टीम अन्ना के दूसरे सद्स्य प्रशांत के बयान को उनका निजी बयान बता के खूद को इस घटाना से अलग करने की मुहिम में लगे हुए हैं. आज तो अन्ना ने भी टीवी पे बयान दिया कि  बयान प्रशांत के निजी विचार थे. कोई नहीं कह रहा कि प्रशांत द्वारा दिया गया बयान टीम अन्ना का सामुहिक ब्यान था.

लेकिन सवाल यह है कि प्रशांत ने कश्मीर मुद्दे पे जो बयान दिया वो सही था या गलत. अगर सही कहा तो अन्ना और उनके दूसरे साथियों को प्रशांत के साथ खड़े रहना चाहिए और अगर गलत कहा या ऐसा कुछ कहा जिससे टीम अन्ना या अन्ना हजारे सहमत नही हैं तो अन्ना को मीडिया के माध्यम से देश को बताना चाहिए कि वो कश्मीर मुद्दे पे क्या राय रखते हैं?  जैसे टीम के एक सद्स्य कुमार विश्वास ने देश को साफ-साफ बताया कि प्रशांत ने कश्मीर पे जो बयान दिया है उससे वो सहमत नही हैं. वो इस मसले पे अलग राय रखते हैं. वैसे, कुमार के इस बयान का कोई खास  महत्व नहीं है. क्योंकि जो लोग भी कुमार के कवि संमेलन में बैठे होंगे वो उनकी इस राय से पहले से ही परिचित होंगे और कुमार का कद अन्ना, किरण और अरविन्द की तुलना में बहुत बौना है.

कहने का मतलब कि टीम के नेता अन्ना हजारे. सदस्य, किरण वेदी और अरविंद केजरिवाल को भी कुमार विश्वास की तरह साफ-साफ लहजे में बात करनी चाहिए.

अगर सिविल सोसाईटी के लोग भी नेताओं की तरह घुमा-फिरा के या छुपा-छपा के बतियान करेंगे तो कैसे चलेगा. उन्हें तो हर मुद्दे पर साफ-साफ बोलना चाहिए जैसे वो रामलीला मैदान से बोल रहे थे और उसी तेवर के साथ जो तिहार के बाहर दिखा था.