मंगलवार, जून 26, 2012

सादी ज़िन्दगी, सादी मौत...

बिहार में हर साल एक बिमारी तय मौसम में. तय समय पे आती है. और बगैर किसी शोर-शराबे के हर साल कुछ बच्चों को मौत की नींद सुला जाती है. यह भी कमाल की बात है कि इस बिमारी के शिकार केवल गरीब के बच्चे ही होते हैं. जैसे प्रकृति कह रही हो-क्या करोगे तुम जी के. चलो. इस दुनियां मे गरीबो के लिए ज़िन्दगी जीना सबसे कठीन है. 
जैसा कि पिछले पंद्रह सालों से होता आया है. इस इलाके में. जून के महीने के साथ. गर्मी बढ़ने के साथ. बिमारी ने बच्चों को निगलना शुरू किया. और आज एक महीने बाद, बताया जा रहा है कि 233 गरीब बच्चे मौत ही नींद सो चुके हैं. बताइए…किस समाज में रह रहे हैं, हम. एक महीने के अंदर. 233 मौतें. एक बिमारी से. वैसी बिमारी जो पिछले पंद्रह साल से आ रही है. हर साल. फिर भी कोई हो-हल्ला नहीं. हर तरफ शांति. चुप्पी. जैसे इस बिमारी से केवल गरीब के बच्चे ही नहीं मर रहे. पूरा का पूरा बिहारी समाज मर गया हो. और समूचे बिहार में मरघट सी शांति पसरी हो. कहीं कोई आवाज नहीं. 
एक साल तक पटने में रहा हूं. छोटे-छोटे मुद्दों को लेकर लोग करगील चौक पे धरने पे बैठ जाते हैं. डाक-बंगला चौराहा जाम होता रहा है. लेकिन 233 बच्चों की मौत पे चुप्पी? 
शायद ये चुप्पी इसलिए कि जो मर रहे हैं वो गरीब-गुरबे हैं. जिन्हें आज भी केवल वोट-बैंक समझा जाता है. जिन्दा लोग नहीं!
2011 की जुलाई महीने में इस बिमारी को पास से देखने-समझने का मौका मिला. दो दिन मुजफ्फरपुर और दो दिन गया में रह कर. एक दोपहर को मुजफ्फरपुर के केजरीवाल अस्पताल में पहूंचा था. कदम सीधे-सीधे दूसरे तल्ले के उस बड़े से कमरे की तरफ बढ़ चले थे जिसे “इंसेफलाइट- वार्ड” का नाम दिया गया था. 
एक हॉलनुमा कमरा. करीब-करीब पच्चीस बेड. हर बेड पे एक बच्चा लेटा हुआ. बच्चे की मुरथारी में उसकी मां-दादी या नानी बैठी हुई. बच्चे…कोई पांच बरिष का तो कोई सात तो कोई दो या तीन बरिष का. सबके-सब बेहोश. पेट फुला हुआ. आंखे बंद. नाक और मुंह में एक पाईप ठुंसी हुई. कुछ आखें खुली तो थी लेकिन डॉक्टर ने बताया कि केवल खुलीं हैं. पिछले कई दिनों से. कुछ सेंस नहीं है इनके पास….! बिमार बच्चों का सेंसलेस होना तो समझ आता है. लेकिन यह समझ नहीं आता कि पिछ्ले सोलह साल से सरकारें और पब्लिक क्यों सेंसलेस हुई पड़ी है?
उन्हीं दिनों, बिहार के दो इलाकों के अस्पतालों से  ली गईं कुछ तस्वीरें नीचे पोस्ट की गईं हैं. कोई कैप्शन नहीं. कोई नाम नहीं. केवल सादी तस्वीरें-

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गुरुवार, जून 14, 2012

वो अपना सम्मान करवा लेते हैं...

(कुछ समय पहले जब मैं प्रभात खबर के प्रधान संपादक और देश के जानेमाने पत्रकार हरिवंश जी से मिला था तब मैंने सोचा था कि इस विषय पे कुछ नहीं लिखूंगा. यह विचार इस वजह से था कि अमूमन यह मान लिया जाता है-“देखो ससुरा चाटुकारिता कर रहा है. नौकरी के लिए.”  इस खतरे से बचने के लिए ही आजतक मैंने इस सब्जेक्ट पे कुछ नहीं लिखा. लेकिन अपने उस साथी का धन्यवाद जिन्होंने यह कह कर लिखने को मजबूर कर दिया कि मैं हरिवंश जी के प्रति अंध-श्रधा जैसे रोग से पीडित हूं.
मुझे अपने पे विश्वास है. भरोसा है. मैं जानता हूं खुद को. मैं इस रोग से पीडित नहीं हो सकता कभी भी. किसी के लिए. लेकिन हरिवंश जी के लिए मेरे मन में बहुत सारा सम्मान और ढ़ेर सारी श्रधा है. और मैं उनके प्रति यह श्रधा हमेशा अपने भीतर जगाए रखना चाहता हूं! दूसरी बात, जो वायदा मैंने अपने-आप से तभी कर लिया था जब हरिवंश जी से मिलने का दौर शुरू हुआ था. उसे यहां भी डाल दे रहा हूं ताकि कुछ भाई लोग यह न समझे कि मैं प्रभात खबर में नौकरी चाहता हूं. या प्रभात खबर से कुछ और चाहता हूं. वायदा है-चाहे कुछ भी हो जाए. कितना भी बुरा हो जाए, मेरे साथ. मैं प्रभात खबर में के साथ तब तक बतौर नौकर नहीं जुड़ना चाहूंगा जब तक प्रधान संपादक हरिवंश जी रहेंगे. इसकी वजह साफ है. उनके साथ नौकरी करूंगा तो उस प्यार के कम हो जाने का खतरा रहेगा जो मुझे उनसे मिल रहा है.)
सुबह-सुबह हरिवंश जी अपने गांव वाले घर के आंगन में बैठे हुए.
हरिवंश जी को बतौर पत्रकार और संपादक, पिछ्ले दो तीन-चार साल से जानता हूं. उन दिनों पढ़ाई खत्म हो चुकी थी. नौकरी के लिए भागदौड़ मची रहती थी. एक नौकरी छोड़ चुका था. दूसरी नौकरी के तौर पे भड़ास4मीडिया के दफ्तर में जाने लगा था. थोड़े समय के इस नौकरी ने मुझे हरिवंश जी के लेखों से मिलवाया. उनदिनों भडास के पास उनके लेख पीडीएफ फर्मेट में आते थे. साईट पे लगाने के लिए. मुझे उस लेख को वर्ड पे टाईप करने के लिए दिया जाता था. पहली नज़र में तो मैं डर ही गया. लगा था -इतना सारा. टाईप करना होगा.

लेकिन जैसे ही लेख को पढ़ने बैठा. बहता चला गया. छोटी-छोटी लाईनें. बिल्कुल नदी की तरह बहती भाषा में दमदार और विचारत्तोजक बातें. टाईप कितना और कैसा होता रहा इसका तो अंदाजा नहीं लेकिन हर सोमवार को उस लंबे लेख का इंतज़ार रहने लगा…एक दो लेख तो मैं अपने कमरे पे भी ले गया. दोस्तों को दिखाया. सबसे तारीफ की. सब का तो पता नहीं लेकिन इस नाम “हरिवंश” के लिए श्रधा के बीज वहीं से  पड़ गए, मन की ज़मीन में.

कुछ दिनों बाद दूसरी नौकरी भी छुट गई. और हर सोमवार को मिलने वाला लंबा लेख भी छुट गया. (उनदिनों जेब में इतने पैसे नहीं होते थे कि साईबर कैफे जाकर स्टोरी या लेख पढ़ी जाए. साईबर का रुख तो तभी किया जाता था जब में पांच-दस ईमेल आईडी इकट्ठे आ जाएं ताकि दस रुपए में ज्यादा से ज्यादा जगहों पर नौकरी के लिए आवेदन पहूंचाया जा सके.)

लेख पढ़ने का सिलसिला खत्म हो गया. लेकिन नाम जहन में याद रहा-हरिवंश. गाहेबगाहे इस नाम को सुनता रहा. कभी पेड न्यूज के मामले में सबसे आगे पढ़ के काम परतो कभी किसी सेमिनार-सभा में सबसे अलहदा बोलने पर. फिर एक लंबा समय गुजरा. इस दौरान मैंने प्रभात खबर में भी नौकरी के लिए कोशिश की. दिल्ली आफिस में गया. और पटा-रांची आफिस में फोन घुमाया. रेज्यूमे भेजा.
नौकरी नहीं होने…किस्त पे लिया लैपटॉप चोरी चले जाने और ज़िन्दगी की दुसरी किचकिचबाजियों कि वजहों से  “हरिवंश जी” का नाम दिलोदिमाग से धुंधलाता गया….

इसी बीच, तहलका ने मुझे नौकरी पे रख लिया और पटना भेज दिया. एक साल का मेरा पटना प्रवास भी गजब का रहा. इन एक सालों में मुझे अपने लिए एक कमरा नहीं मिला लेकिन दर्जनभर अच्छे लोग. बड़े भाई की तरह हिम्मत और हौसला बढ़ाने वाले लोग जरुर मिल गए. सबसे बहुत प्यार दिया. दुलार किया और हर समय कुछ अच्छा करने के लिए प्रेरित किया.

लेकिन बिहार और झारखंड में समान पकड़ रखने वाले. बहुत अच्छे लिखाड़. लोकसंस्कृति से जुड़ाव महसुस करने वाले और भोजपुरी के रसिया, सुनवइया और अच्छे गबइया निराला जी उस सपंर्क-सुत्र के तौर पर मुझे पटना में मिले जिहोंने मुझे हरिवंश जी से मिलवाया. निराला जी के बारे में यह बतलाना भी जरुरी है कि वो पटना से तहलका के साथ जुड़े हैं और बिहार-झारखंड में ही रमे रहना चाहते हैं. उनकी लेखनी में मुझे हरिवंश जी का छाप दिखता है. गवईं शब्द. भाषा में प्रवाह और छोटी-छोटी बातों का बेजोड़ विशलेषण. हो भी क्यों न? निराला जी को सौभाग्य मिला है कि वो लंबे समय तक हरिवंश जी के साथ रहे हैं और आज भी हरिवंश जी के सबसे प्रिय में से हैं.

हरिवंश जी से उनके पैत्रिक गांव में मुलाकात.
महीना और तारीख याद नहीं. हां इतना याद है कि आडवाणी की यात्रा शुरू हो रही थी. सिताबदियरा से. सिताबदियरा, जेपी का भी पैत्रिक गांव है. और इसी वजह से आडवाणी अपनी यात्रा को सिताबदियरा से शुरू कर रहे थे. मैं और निराला जी उस यात्रा को कवर करने गए थे. जाते हुए रास्ते में निराला जी को फोन पर हरिवंश जी ने बताया कि वो अपने गांव आ रहे हैं. निराला जी ने भी उन्हें बताया कि वो भी उनके गांव ही पहूंच रहे हैं. आडवाणी की यात्रा को कवर करने के लिए. तय हुआ कि हम मिलेंगे. मुझे यह सुन के इतनी खुशी हुई कि पुछिए मत. मैं उस व्यकति से मिलने वाला था जिसे अबतक पढ़ता आ रहा था या उसके बारे में दुसरों से सुनता आ रहा था. खुशी तो होनी ही थी.

दोपहर बाद हम सिताबदियरा पहूंचे. हरिवंश जी, सिताबदियरा के बिहार वाले हिस्से में कुच लोगों से घीरे हुए थे. नाटे कद के. नीली जिंस और फूल शर्ट पहने हुए. आखों पे गोल फ्रेम वाला चश्मा….
मुस्कुराते और जोड़-जोड़ से हंसते हुए बतिया रहे थे. उनके आसपास के लोगों की सहजता को देखकर लग नहीं रहा था कि वो देश के एक बड़े पत्रकार के सामने खड़े हैं. सब एकदम सहज. करीब-करीब बीच पच्चीस लोगों से घीरे हुए, हरिवंश जी. एकदम मस्त. कोई लाओ-लश्कर नहीं. कोई तामझाम नहीं. कोई पीए-वीए नहीं.(कुछ संपादक तो आला दर्जे के अधिकारियों से भी ज्यादा तामझाम लेकर घुमते हैं)
निराला जी से अपनी मुलाकात का अदाज भी निराला ही था. सामने से हमे देखने के बाद. वहीं खड़े-खड़े बोल पड़े, “अरे निराला….आओ,आओ. कहां थे तुम. मैंने तुम्हे जितनी दफा फोन किया अगर उतनी दफा भगवान को याद कर लेता तो वो भी मिल जाते”

फिर उन्होंने वहां खड़े लोगों से निराला जी का परिचय करवाया, “ये मेरे युवा मित्र हैं.” मौका पाते ही निराला जी ने मेरा परिचय उनसे दिया. शायद वो मेरी बेकरारी समझ रहे थे. इतनी गर्मजोशी से हरिवंश जी मुझसे मिले कि मेरे शब्द मुहं में ही जम गए. और पूरा शरीर ठंडा पड़ने लगा. आज भी उनके द्वारा कंधे पे रखा गया हाथ और उनकी बातें याद है, “वाह…मुझे एक और युवा साथि मिल गया. बहुत सुन्दर. (हो सकता है कि मैं अतिशयोक्ति में बह रहा हूं. लेकिन इससे पहले किसी संपादक द्वारा इतना सम्मान नहीं मिला था. और जब गर्म ताबे पे पानी की एक बुंद पड़ती है तो तब्बा सब भुलभाल के धुंआ-धुंआ तो हो ही जाता है)

वहां से निकलते हुए और अपनी गाड़ी तक आते हुए उन्होंने निराला जी को इस बात के लिए मनाया कि हम आज रात उनके घर पे ही रुकेंगे. उनके शब्दों को देखने की जरुरत है, “देखो…आज विकास से मिला हूं. रात में रुकेंगे, साथ में. कुछ बातें करूंगा अपने नए साथी से. हां तुम्हे वहां बिजली-विजली की थोड़ी दिक्कत हो सकती है . सह लोगे न एक रात?”

वो निराला जी से बतिया रहे थे और बगल में खड़ा उन्हें देख रहा था. और यह सोंच रहा था कि पता नहीं क्यों निराला जी छपरा जा कर रुकने की जिद्द कर रहे हैं. क्या हुआ जो एक रात उनका फोन चार्ज नहीं होगा और लैपटॉप पे नेट नहीं चलेगा. आखिरकार, निराला जी मान गए.

रात में हमने साथ में घी में डुबोया हुआ लिट्टी और बैगन का चोखा खाया. हरिवंश जी के गांव वाले घर के आंगन में. बहुत सारी बातें हुईं. फिर रात में सोए और सुबह उठ के दुआ-सलाम करते हुए निकल लिए.

ये तो रही पहली मुलाकात. निशब्द करती मुलाकात. देखते-सुनते बीतने वाली मुलाकात. लेकिन असल कहानी तो इसके बाद शुरू होती है.

इस मुलाकात के बाद जरुरी नहीं था कि हरिवंश जी मुझे फोन करते और रांची में अपने किताब के लोकार्पण पर आमंत्रित करते वो भी यह कहते हुए, “विकास…कैसे हो? फलां तारीख को रांची में मेरी दो किताबों का लोकर्पण है. तुम आओगे तो मुझे बहुत अच्छा लगेगा. व्यक्तिगततौर पे मुझे बहुत खुशी होगी तुमसे मिल के.”
अब कोई बताए कि इस संवाद के बाद मेरे जैसे व्यक्ति के पास कुछ कहने को बचता है. नहीं न? मैंने सिर्फ और सिर्फ इतना कहा कि सर…मैं आना चाहता हूं. इसके अलावा मैं एक भी शब्द नहीं बोल सका.
घर के दरवाजे पे खड़े-खड़े निराला जी से बतियाते हरिवंश जी
 मैं तय तारीख को रांची पहूंचा. जिस जगह पे किताब का लोकार्पण होना था वहां पहूंचने पर हरिवंश जी को मैंने देखा कि वो गेट के बाहर खड़े हैं और हर आने वाले का स्वागत कर रहे हैं. ज्यादातर लोगों के साथ हॉल में जा रहे हैं और उन्हें उनकी सीट पे बिठा के फिर वापस आ जा रहे हैं. (हरिवंश जी एक अखबार के प्रधान संपादक हैं. उनके अंदर कई स्टेट एडेटर और बाकि लोग हैं. प्रभात खबर के ज्यादातर लोग वहां मजूद भी थे. यह का कोई भी सहर्ष कर सकता था. ) हरिवंश जी के बार में एक बात मैंने सुनी थी. वो याद आ गई. कहते हैं कि अगर स्टेट का मुखिया हरिवंश जी से मिलने उनके दफतर आए तो वो उसे अपनी कुर्सी से उठकर विदा कर देते हैं लेकिनगर कोई सामान्य आदमी आए तो वो उसे दफतर के बाहर आकर छोड़ते हैं.

मेरे और निराला जी पर नज़र पड़ने के बाद वो ऐसे चहके कि एक पल को मुझे लगा कि शायद सामने वाले(हरिवंश जी) को मैं “विकास कुमार” नहीं अमेरिका का प्रैसिडेंट जान मालुम हुआ हूं. तेज कदमों से आए…मुझे लगे लगाया. और वहां खड़े करीब-करीब दर्जन भर पत्रकार और दूसरे सम्मानित लोगों से परिचय करवाते हुए कहा, “ये विकास हैं. पटना से आए हैं. तहलका से जुड़े हैं. बहुत अच्छा लिखते हैं और फोटो भी कमाल की लेते हैं.”  (मुझे अपने औकाद की तब भी बहुत अच्छे से जानकारी थी और आज भी है कि मैं ढ़ेले भर भी सही नहीं लिख पाता और तस्वीरें तो कैमरा खिंच देता है. बतौर फोटोग्राफर मैं कुछ भी नहीं जानता और करता.) लेकिन प्रेम से मिल रहे प्रशंसा के शब्द अच्छे लगे थे. बहुत अच्छे.

दोपहर के वक्त किताब का लोकार्पण समाप्त हुआ. सब को विदा कर के वो आखिर में निकले. मैं निराला जी के साथ वापिस उनके राची स्थित घर पे लौट आया. रास्ते में तय हुआ कि थोड़ी देर आराम कर के राची के कुछ लोगों से मिलेंगे और फिर मैं रात की गाड़ी से पटना निकल जाउंगा.
कमरे पे पहूंचते ही. निराला जी के पास हरिवंश जी का फोन आया. फोन हरिवंश जी का था. उन्होंने शाम में हमे अपने घर पे आमंत्रित किया. कमरे में बिठा के मिठाई खिलाई. लाख जिद्द करने के बाद भी वो चाय बनाने के लिए खुद ही किचेन में चले गए. और इतने के बाद कहा, “विकास…तुम आए. मुझे बड़ा अच्छा लग.!”

अब कोई बताए,मुझे किस इस इनसान के लिए मेरे मन में सम्मान और श्रधा के वटरुक्ष क्यों न खड़े हों?
कौन इतना प्यार, दुलार और इज़्ज़त देता है किसी आज के लौंडे को? और सबसे बड़ी बात…ऐसा नहीं है कि मैं अकेला हूं जिसे हरिवंश जी ने इतना सम्मान और इतनी इज़्ज़त दी. इतना प्यार और दुलार दिया. वो हर मिलने वाले पे ऐसे ही खुद को न्योछावर कर देते हैं. हर किसी को इतना ही प्यार करते हैं. आखिर कोई बताए कि हिन्दी में कौन ऐसा सपांदक है जिसके पास एक चाय दुकान और पान दुकान वाला भी सीधे फोन मिला के बतिया लेता है?

 हरिवंश जी एक बेहतर संपादक हैं क्योंकि जब उन्होंने प्रभात खबर ज्वाईन किया था तो उसकी केवल बाईस सौ कॉंपिया छपती थी. आज प्रभात खबर बिहार-झारखंड और पश्चिम बंगाल से छपता है. वो एक अच्छे पत्रकार हैं. सम्झदार हैं. संवेदनशील पत्रकार हैं. यह बात सभी जानते हैं. इस सब के अलावा वो एक अच्छे इनसान हैं. सवेदनशील इनसान हैं तो उनके प्रति सम्मान, आदर और श्रधा का भाव क्यों न पैदा हो?

सोमवार, मई 21, 2012

आमिर…डू नॉट ब्रेक मार्केट रूल!


जैसे ही “सत्यमेव जयते” के कंटेट की भनक लगी. उसी समय से हम चिल्लाने लगे. इधर-उधर  लिखने लगे. हर मंच से बोलने लगे-देखो, देखो…अब ये बेचेगा. गरीबी बेचेगा. लाचारी बेचेगा. हमारी परेशानी बेचेगा. एक सुसंस्कृत और सभ्यता वाले देश की कमियां बेचेगा…आदि-आदि.

जब शो का पहला ऐपिसोड आया तो हम थोड़े गमगीन हो गए. लेकिन हमने बेचने वाली बात को कहना-दुहराना नहीं छोड़ा. हम  पहले के मुकाबले ज्यादा ताकत और मजबूती से कहने लगे-देखा, हमने कहा था न? ये बेचेगा. देखो…बेच रहा है. “बाल मजदूरी” जैसे गंभीर विषय को भंजा लिया. बाल यौन-शोषण के नाम पर सेक्स दिखा और बेच रहा है. उसी समय जिस समय कभी “रामायण” की राम लीला दिखती थी. दहेज प्रथा पर भी चोट. जो हमारी संस्कृति का हिस्सा है. आगे-आगे देखिए क्या-क्या बेचते हैं, आमिर. हे राम…घोर कलयुग आ गया है. कोई कुछ बोलता ही नहीं!

हाय..आमिर तूने ये क्या किया? क्यों देश की कमियों को बेच रहे हो? देश की ब्रांडिंग कर के भी तो पैसा बनाया ही जा सकता है.  ऐसे ही बनाओ न पैसा. इसमे तुम्हे दोहरा लाभा है. कमाई की कमाई और हम तुम्हें स्टार भी कहेंगे. सर-माथे रखेंगे.

हम देशभक्त हैं. सभ्यता और संस्कृति के रक्षक हैं. अपनी बुराइयों  को दुनियां से छुपा कर रखते हैं.  जैसे घर में पखाना-घर बिल्कुल आखिर में, कोने में बनवाते हैं. छुपा कर. वैसे ही ऐसी बुराइयों को रखते हैं, संभाल कर. दुनियां से बचा कर.

लेकिन तूने तो पखाना-घर को छोड़. पखाने की टंकी में ही कैमरा घुसेड़ दिया है.

हाय…तू क्यों बेच रहा है. अभी से भी रूक जा.

वैसे भी ये हमारा(लेखक, कवि, पत्रकार और फोटोग्राफर्स) माल था. वर्षों संजोया है इसे. बेचने का कभी ख्याल नहीं आया. लगा था, कौन खरीदेगा इस गंदगी को.? सब नाक दबा के भाग जाएंगे. जुते-चप्पल भी पड़ेगे, दो –चार.

हां… न बेच पाने के पीछे एक और कारण भी है. हमने समझा ही नहीं कि इन मुद्दों को बेचा भी जा सकता है. वो भी इतनी उंची कीमत पर. अगर समझ गए होते तो अबतक  बेच चुके होते. तुम्हारे लिए थोड़े न छोड़ते! इतने नादान नहीं हैं हम. बेचने लायक जो भी दिखा या दिख रहा है उसे बेच ही रहे हैं. हर पल. हर दिन.

लेकिन फिर भी तुम्हें ये सब नहीं बेचना चाहिए था. वो भी टीवी पे. प्राईवेट और सरकारी चैनल पे साथ-साथ. गांव से शहर तक.

हाय…कैसे दिमाग लगाया तूने, इतना?  हमने तो गांवों को छोड़ ही दिया था. क्योंकि वहां जो रहते हैं वो खरीद नहीं सकते. कंगले लोग बसते हैं वहां तो. उनके लिए “कृषि दर्शन” ही सही था. लेकिन तूने तो हद कर दी, आमिर?

हमने जिस माल(बाल मजदूरी, बाल योण-शोषण, दहेज और आगे के ऐपिसोड में आने वाले सभी मुद्दे) को कचरा समझ  के, बेकार समझ के फेंक दिया था. डस्टबिन में. (देश की इज़्ज़त-विज़्ज़त को बचाने का तो एक बहाना था. इसी की वजह से हम फालतू के दबावों से बचते रहे. कई लोग हैं जो डाइरेक्ट नहीं बेच सकते. हमसे बिकवाना चाहते हैं. दबाव डालते हैं. लेकिन हमें फायदा तो दिखना चाहिए . तभी तो बेचते)  उन्हें ही तूने उठा लिया. लेकिन बेटा…हम नहीं बेच सके. इसका तो अफसोस है ही.

ये जान लो हम तुम्हें भी शांति से नहीं बेचने देंगे. दिखा देंगे अपना कमाल. अपना हुनर. तुमने, बड़ी-बड़ी कंपनियों को हायर किया है, बेचने के लिए. लेकिन तुम्हे नहीं पता. हमने कई साल और इन्फैक्ट अभी भी कोलकता के “मछ्छी बाज़ार” में दुकानदारी की है. इसके अनुभव का फायदा लेंगे. खूब चीखेंगे, चिल्लाएंगे. तुम्हारी ऐसी-तैसी कर देंगे. देखते जाओ…

अभी तो हमे केवल फेसबूक और ब्लॉग पे लिखना शुरू किया है. हमें रौद्र रूप लेने में भी देरी नहीं लगती.

समझ रहे हो न तुम…हर-हर महादेव. वैसे भी तुम्हारे नाम में “ख़ान” लगा है. फिलहाल तो इशारा ही काफी है. उम्मीद है कि तुम समझ  लोगे और निकल लोगे. हमारे “माल’ पे हाथ साफ करना बंद करोगे.

हम तुम्हे इस धर्मप्रायण, सुसंस्कृत और सभ्य देश की ज़नता के कोमल और मुलायम गाल पर हर  सप्ताह, झांपट नहीं मारने देंगे. हम उन्हें बताएंगे कि देखिए हम तो आपका मनोरंजन करते आएं हैं, कोमल तरीके से. लेकिन यह आदमी आपको, आप ही के टीवी सेट के सामने गंदा कहता है और अपनी जेब भाड़ी करता है. हम सब समझा देंगे. देख लेना तुम.

आखिर में, आमिर बाबू तुम्हारे लिए एक प्राईवेट मैसेज-तुम में दिमाग तो है. नेक दिल भी लगते हो, लेकिन गुरू, दिमाग और नेक दिल होने से काम नहीं चलता. वही सेल करो जिसका मार्केट में ट्रेंड है. ज्यादा हिरोगिरी मत दिखाओ. मार्केट खराब मत करो. इसी में सबका भला होगा. एक बात और पूरी ईमानदारी से बता देते हैं-जितनी झल्लाहट हममें देख रहे हो उसकी सबसे बड़ी वजह यही है कि तुम वो बेचने चले हो जिसे हमने समझा ही नहीं, बेचने लायक. अब यह तो हो नहीं सकता कि वर्षों पुराना “माल” हमारा. हमारे बाप-दादाओं के द्वारा अर्जित किया हुआ और उसकी बिक्री तुम करो. हमने अबतक नहीं बेचा सो ठीक. लेकिन तुम मत बेचो. हम बेचेंगे. 

शुक्रवार, मई 18, 2012

उन्होंने बात बढ़ाई…आप भी तो कुछ हिम्मत करिए!



(इस विषय पे लेख दो महीने बाद क्यों?
जवाब:-आज एक बैठकी के दौरान हरिवंश जीके इसी लेख की बात निकल चली. सामने से कहा गया-आखिर उन्होंने ने ही क्यों लिखा? इस सवाल के बाद करीब-करीब दो घंटे तक बात होती रही. वहीं से लौट के मैंने अपने मन की बात लिखने की कोशिश की.)

मार्च महीने के किसी तारीख को प्रेस काउंसिल के चेयरमैन मार्कंडेय काटजू पटना आए थे. उन्होंने एक सभा को संबोधित करते हुए कहा था-बिहार में मीडिया आज़ाद नहीं है, ऐसा उन्होंने सुना है. काटजू के इस बयान से बहुतेरों की सहमति है. मेरी भी. वाकई बिहारी मीडिया में कुछ तो गड़बड़ है. इस गड़बड़ी के कई कारक हैं. इनके बारे में चर्चा फिर कभी.

प्रेस काउंसिल चेयरमैन के इस बयान को अगले दिन सभी अखबारों ने दो-चार कॉलम की खबर में समेट दिया. लगा था कि यह मामला भी दूसरे मामलों की तरह खो जाएगा. लेकिन प्रभात खबर के प्रधान संपादकहरिवंश जीने इस बयान को आधार बना के अपने अखबार में दो पेज का एक लेख लिख दिया. लेख, प्रभात खबर के 27 मार्च के अंक में प्रकाशित हुआ. एक बार फिर से काटजू के बयान और बिहार में मीडिया की हालत पे चर्चा शुरू हुई.

काटजू के बयान के बाद बिहार के सभी अखबारों(प्रभात खबर को छोड़ के)के बड़े-बड़े संपादक चुप रहे. हरिवंश जी को छोड़कर किसी संपादक ने अपना पक्ष सार्वजनिक तौर पे नहीं रखा. किसी संपादक ने इस मसले को (प्रेस काउंसिल चेयरमैन के बयान) बहस का मुद्दा नहीं बनाया. सब ने इग्नोर किया. लेकिन हरिवंश जी ने, पूरी ईमानदारी से अपना पक्ष, अपने मंच(एक अखबार के संपादक के लिए अपनी बात कहने का सही मंच उसका अखबार ही हो सकता है.) से पाठकों के सामने रखा. चाहते तो वो भी चुप रहते. लेकिन उनहोंने चुप्पी ओढ़ने के बदले लिखा और खुल के लिखा. अपनी बात लेख(वो किसी मंच से भाषण दे कर भी अपनी बात कह सकते थे) के रूप में रखा. क्योंकि छपे हुए शब्द हमेशा जिन्दा रहते हैं. दो पन्ने के आलेख में हरिवंश जी ने अपना पक्ष रखा. अपने अखबार का पक्ष रखा. पक्ष में तर्क दिए.

कायदे से होना यह चाहिए था कि खुल के अपनी बात सामने रखने के लिए हरिवंश जी की तारीफ होनी चाहिए थी और एक बहस आरंभ होनी चाहिए थी. लेख में लिखी गईं बातों और दिए गए तर्कों से असमति हो सकती है और होनी भी चाहिए. लेकिन असहमति रखने वालों को अपनी बात और अपने तर्कों को संपादक तक पहूंचाना चाहिए था. किसी भी माध्यम से. पत्र, ईमेल या फोन के माध्यम से(हरिवंश जी हर माध्यम से जुड़े हैं और सहज उपलब्ध होते हैं. उनके पास जो भी जाता है उसे देखते-पढ़ते है. कायदे का होने पर अखबार में जगह भी देते हैं.)

लेकिन तो हरिवंश जी की तारीफ हुई और हीं किसी ने उनके लेख के जवाब में कुछ तर्कसंगत लिखा. बल्कि इस साहसी लेख के बाद हुआ वो जो नहीं होना चाहिए था.

भाई लोगों ने इस गंभीर मसले को बेकार की बतकुच्चन तक समेट दिया. चाय की दुकान पे चाय की चुसकी लेते हुए. पान कल्ले में दबाते हुए या सिगरेट सुलगाते हुए बातें होती रहीं. इन बातों का स्तर काफी घटीया रहा. कुछ लोग संपादक को चौक-चौराहों पर काफि बुरा-भला भी कह जाते हैं. लेकिन वो यह भुल जाते हैं कि ऐसा कहने और बोलने का स्पेस भी(लेख लिखकर) हरिवंश जी ने ही दिया है.

चौक-चौराहों पे बतकही में उलझे रहने वाले सुधी जनों को चाहिए था कि वो उस लेख को पूरा पढ़ते(मेरा विश्वास है कि पटना के ज्यादातर सुधी पत्रकारों ने या बुद्धिजिवियों ने लेख नहीं पढ़ा होगा) और फिर अपनी बात, कायदे से संपादक तक पहूंचाते. एक मर्यादिय भाषा में.
लेकिन आज मार्च को बीते हुए दो महीने हो चुका है. किसी ने. किसी भी मंच से कुछ नहीं लिखा हरिवंश जी की बातों से असहमति जताते हुए. और एक सार्थक बहस होते-होते रह गई. इसके लिए दोषी कौन? प्रभात खबर के संपादक, जिन्होंने पाठकों के सामने अपना पक्ष रखा और बहस की जमीन तैयार की या फिर राज्य की बौद्धिक जमात?

अपनी असहमति को जाहिर करने का. अपनी बात कहने की हिम्मत होनी चाहिए. इससे बचते हुए. पीठ पीछे कुछ से कुछ कहने और अंदाजा लगाने का कोई फायदा नहीं है. इससे कुछ हासिल नहीं होता. हमे बहस के मैदान में आना चाहिए. किसी भी मुद्दे पे. हरिवंश जी के लिखे पर जिन्हें भी आपत्ति है वो खुल के आएं. बोलें. एक बहस की शुरूआत करें. बेकार में आरोप लगाते रहने का कोई फायदा नहीं. बल्कि जो भी बौद्धिक जन ऐसा कर रहे हैं वो बौने साबित हो रहे हैं. क्योंकि किसी के पीठ पीछे उसके बारे में कुछ से कुछ कहते रहना हमारे बौनेपन को ही दिखाता है. तो बौना होने से बचिए. हिम्मत दिखाइए. दो महीने बाद ही सही एक हेल्थी डीवेट को शुरू करिए. अभी भी देरी नहीं हुई है.