गुरुवार, मई 26, 2011

रिजल्ट का दिन, काला दिन.


कल, बिहार में दो-दो परिक्षाओं के परिणाम निकले. पहला अई.अई.टी. जे.ई.ई  का और दूसरा मैट्रिक  का.  पहले वाले रिजल्ट से अपन का कोई भावनात्मक लगाव नहीं है. कभी सपने में भी आई. आई, टी. के बारे में न सोचने वालों की जमात में से रहा हूं. लेकिन शिक्षा की सड़क पे बनाए गए मैट्रिक रुपी बैरियर से तो गुजरना ही पड़ा. इससे बच निकलने का कोई दूसरा रास्ता था ही नहीं. अगर होता तो मैं उसे जरुर अपनाता और फिर बड़ी खुशी-खुशी पापा द्वारा किए गए लत्तम-जुत्तम को सह लेता.  ये सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ. मार-पिटाई हुई लेकिन रिजल्ट आने के बाद. लात, थपड़ और घुसों की जमकर बरसात हुई. 

मुझे अच्छे से याद है. सुबह के साथ बजे होंगे. मैं कोठरी( घर का बाहर वाला कमरा) में लगे चौकी पर मछरदानी लगा के चैन से सो रहा था. बिल्कुल निफिक्री में.  तभी कान में आवाज आई. “अरे….रिजल्ट आ गया तिरहुत प्रमंडल का.” लगा कि सपना देख रहा हूं.  मैं बिल्कुल निश्चिंत था कि अगले एक- दो दिन तक तो रिजल्ट नहीं ही आएगा.  आज तक नहीं पता चा्ला कि उस बेफिक्री का आधार क्या था. 

खैर, मेरे मानने और न मानने से क्या होता है. रिजल्ट का भूत गांव की सड़क पे घुम रहा था.  सभी बच्चे अपने-अपने रौल नंबर का मिलान करने के लिए हरी भाई के दरवाजे की तरफ जा रहे थे क्योंकि दो रुपय में आने वाला आज अखबार केवल उन्हीं के यहां आता था. ये सब मैंने देखा नहीं. आधी नींद में रहते हुए महसुस किया था. मैं अपना रिजल्ट जानता था और उसके बाद क्या होने वाला था वो भी जानता था. तभी तो हर रोज यह मनाता था कि रिजल्ट आए ही नहीं.  अखबार में देखने का बिल्कुल मन नहीं था. लेकिन अंगना में चुल्हे पर रोटी बनाती मम्मी को और जन-मजूरा की तलाश में पछियारी टोला गए पपा को अपने मन की बात बताने की हिम्मत नहीं थी.  

पपा, परीक्षा के फौरन बाद नंबर का हिसाब लेते थे. मैथ में कितना आएगा? फिजिक्स और केमेस्ट्री में क्या मिलेगा? और मैं उन्हें हर विषय में सत्तर से अस्सी नंबर के बीच का आंकड़ा पकड़ा देता था. जबकी मुझे पता होता था कि हर विषय में मेरे अंक चालिस से पच्चास के बीच झुलेंगे. झूठ कहता था उनसे. उस वक्त मुझे इसका कोई अफसोस भी नहीं होता. बल्कि खुशी होती. सोंचता, ’चलो…..बढिया है. इस तरह लात खाने से तो बच गया” 

जैसी की मुझे उम्मीद थी. हरी भाई के अखबार ने भी मुझे वही परिणाम दिए. मैं मैट्रिक की इस बैरियर को सेकेंड गेयर से पार कर गया था. मुझे, मेरा रिजल्ट मिल गया था. मैं सतुष्ट था लेकिन घर पे किसी को विश्वास ही नहीं हो रहा था. सबको लग राहा था कि मुझे फर्स्ट क्लास से पास होना चाहिए. 

 मेरे मैट्रिक का रिजल्ट जब पपा को पता चला तो उनके गुस्से का बम घर में फट पड़ा. इसके बाद जो हुआ वो मैं शुरु में ही बता चुका हूं. बार-बार बताना अच्छा नहीं लगता. 

खैर, इस सब  में मेरे पापा की ज्यादा गलती नहीं थी. उनकी गलती ये थी कि मारते वक्त वो यह भूल जाते थे कि मैं उन्हीं का बच्चा हूं. मैं पढ़ने में बिल्कुल भुसकौल था. जब मेरे दोस्त –यार परीक्षा की तैयारी कर रहे थे तब मैं आगामी विधानसभा चुनाव के चुनावी माहौल का मजा ले रहा था.क्या करता, सब्जेक्ट की किताबों से ज्यादा मुझे चुनाव प्रचार की गाड़ियां. चुनाव से पहले का हो हल्ला और चुनावी संबंधी बातें अपनी तरफ खिंचती थीं.
कल का दिन, मेरे रिजल्ट वाले काले दिन की याद दिला गया.

सोमवार, मई 23, 2011

सरकारी गरीब की खोज( पार्ट -1)


पटना के अपने आफिस में अभी पहूंच कर फेसबुक खोला ही था कि हमारे दिल्ली आफिस से फोन आया. जब फोन आया तो मुझे उठाना ही था सो मैंने उठाया और जैसे सभी फोन उठाते ही “हैलो” से शुरुआत करते हैं वैसे मैंने भी हौले से हैलिया दिया.

दिल्ली आफिस: सुनिए……अंग्रेजी में बीपीएल के उपर एक स्टोरी जा रहे है तो उसके लिए पटना से एक केस स्टडी चाहिए. हो जाएगा न?

मैं (पटना आफिस से): किस तरह का?

दि०आ०: कुछ दिन पहले  ये तय हुआ है कि शहरी क्षेत्र में रहने वाला जो व्यक्ति रोजाना 20 रुपय से ज्यादा खर्च करेगा वो गरीबी रेखा से उपर माना जाएगा. ग्रामीण क्षेत्र के लिए 15 रुपय रोजाना खर्च करने की सीमा तय की गई है. आपको एक गरीब खोजना है और उससे पूछना है कि अगर उसे एक दिन में बीस रुपय खर्च करने हो तो वो क्या करेगा? मामला समझ में आ गया न?  एक बात और….जिससे भी बात करेंगे उसकी एक हाई रेजुलेशन फोटो भी चाहिए.

मैं: हां…..हो जाएगा. ( मन में चल रहा था कितना आसान काम है. बिल्डिंग से नीचे उतरते हीं बहुत से गरीब मिल जाएंगे.)

दि० आ०: ठीक है फिर भेजिए…….आज शाम तक ही चाहिए.

 मैं: हो जाएगा…….भेजता हूं, शाम तक.

फोन कट गया. मैं गरीब खोजने की जुगत में लग गया. इस दौरान और बहुत कुछ हुआ लेकिन उसे बताने बैठूंगा तो बहुत लिखना पड़ेगा और ज्यादा लिखना अपन को पंसंद नही. मुंह से चाहे जितना बकवा लो. लिखने में नानी याद आने लगती है मेरी.

इसलिए थोड़ा जम्प मारते हुए आपको सीधे बिल्डिंग से सड़क पे ले चलता हूं.

सड़क पे बहुत से रिक्शे, ठेले वाले सर्र-सर्र भागती गाडियों के बीच रेंग रहे थे. कुछ लोग पेड़ की छांव में रिक्शे की पीछे वाली सीट पर दुबके अउंघा रहे थे.

मैं इस सोंच से दुबला हुआ जा रहा था कि किसे रोकूं. जो सवारी लेकर जा रहा है वो रुकेगा नहीं. जो सोने की कोशिश कर रहा है उसे अपने पत्रकारिय काम के लिए उठा देना ठीक नहीं. फिर धेयान आया कि जो खाली हो और जगा हो उसे पकड़ा जाए. सो एक ऐसा रिक्शा वाला मिल ही गया. मैं उसके पास गया. बोला, “मेरा नाम विकास है. आपका क्या नाम है?”

रिक्शा वाले भाई ने मुझे उपर से नीचे तक एक्सरे किया. उसके आंख का कैमरा मेरे पेट के पास लटके बैग तक आकर रुक गया. वहीं देखते हुए बोला, “ नाम से का मतलब. कहां चलना है ये बताइए.”

“जाना नहीं है. आपसे बात करनी है. पत्रकार हूं.” मैंने कहा.

कान पे हांथ रखते हुए उसने ऐसे पूछा जैसे उसे सुनाई न दिया हो. लेकिन माजरा कुछ और था सो मैंने उसे सफाई दी, “ अखबार में लिखता हूं. आपसे कुछ बतियाना है”

 अबकी वो समझ गया. “बताइए का कहना-सुनना है?”

“आपका लाल कार्ड बना है” मैंने पूछा.

बगैर एक पल बिताए उसने कहा, “ नहीं बना है.”

“काहे नहीं बना है’ मैं बोला.

“का करना है आपको….. ये न बताइए. हमरा लाल कार्ड बना चाहे न बना आपको का मतलब है उससे?” थोड़ा तमतमा कर बोला.

मैंने मुस्कुराते हुए फिर कहा, “बताइए न….. लिखना है कि काहे नहीं बना?”

“का हो जाएगा आपके लिखने से. बही न होगा जो मुखिया जी चाहेगा( राज्य का नहीं, उसके पंचायत का). ऊ चाहता है कि हम कार्ड बनवाने के लिए उसके आगे-पीछे करें . हमसे ई न होगा. हम अपना बाप का नज़ायज सुनवे नहीं करते हैं. ऊ मुखिया है तो का हुआ. कौनो लाट है का.”

वो थोड़ा ज्यादा ही गुस्से में आ गया. वैसे भी यह गरीब मेरे काम का नहीं था. मुझे तो सरकारी मायता वाला गरीब चाहिए था. ऐसा गरीब जिसे सरकार ने गरीबी रेखा के नीचे माना हो. सो मैंने इस बातचीत को यहीं पे लपेट लिया.( पत्रकारिय गुण भी तो यही है न. जहां स्टोरी नहीं बन रही वहां समय गंवाना बुरबकई है.)

नोट: पाठक( दो-चार जो भी हों.)  हिज्जे की गलतियों पर धेयान न दें. यह गलती यहां थोक में मिलेगी.

गुरुवार, मार्च 03, 2011

एक पत्रकार हूं!

हर गरीब,
भूखा-नंगा,
बिमार-लाचार,
मेरे लिए मात्र समाचार है.
क्योंकि मैं इन्सान से आगे की चीज- एक पत्रकार हूं!

सोमवार, फ़रवरी 28, 2011

दुख....

तुमने अपना कह लिया,
मेरा सुना ही नहीं.
आए और चले भी गए.......
सबकुछ देखा,
मेरी तरफ मुड़े भी नहीं.

मंगलवार, फ़रवरी 08, 2011

किसान हूं, सरकार नहीं.

मेरे खेत को उजाड़ दो,
घर को भी उखाड़ दो,
फिर अपने विकास का झंडा वहां गाड़ लो,

मैं कुछ नहीं कहूंगा,
कुछ नहीं करूंगा,
क्योंकि मुझे ज़मीन चीरना आता है,
सीना फाड़ना नहीं आता.

शनिवार, नवंबर 27, 2010

सपनों का बिहार.....!!

एक बिहारी होने के नाते इस बात की खुशी है कि आज हमारा राज्य कई मामलों और मसलों में देश को एक नई राह दिखा रहा है. आज बिहार मर्गदर्शक की भुमिका में है. राज्य की जनता को बिहारी होने का गर्व महसूस हो रहा है. 

लेकिन अभी भी राज्य में कई मसलों और मुद्दों पर बात होनी चाहिए. कुछ बदला है. बहुत कुछ बदलना बाकी है.पिछली सरकार ने अपना काम किया है. सड़कें बनी हैं. स्कूलों में बच्चों की संख्या बढ़ी है. गरीब-गुरबों के लिए सरकारी खजाने से पैसे आए. 

लेकिन क्या इतना भर ही काफी है. क्या केवल सरकार के जिम्मेवार होने और काम करने से एक बिहारी के “सपनों का बिहार” बन सकता है? नहीं…..ऐसा बिल्कुल नहीं है. 

अगर वाकई बिहार को एक बेहतर और कामयाब राज्य बनना है तो सरकार और जनता दोनों को कदमताल करते हुए चलना होगा. राज्य की आम जनता को भी सुन्दर बिहार के लिए खड़ा होना होगा. लड़ना होगा. 

अबतक हम यह कह रहे थे कि राज्य का शसन ही सो रहा है तो जनता क्या करे? लेकिन अब ऐसा नहीं है. हमसब ने दूबारा से उस सरकार और नेता में विश्वास जताया है जिसने राज्य की जनता में विकास की ललक पैदा की है. हमने, उस नेता को आगे किया है जिसमें राज्य की जनता को आगे बढ़ाने का हौसला है. हमने उस सरकार को दूबारा बनाने का फैसला किया है जिसके पास राज्य के विकास के लिए एक तय कार्यक्रम है. और इससे यही साबित होता है कि हमलोग विकास चाहते हैं.  सुख-शांति और रोजगार चाहते हैं. लेकिन हमारी ये चाहत केवल वोट देकर सरकार बनवा देने भर से पूरी नहीं होगी. 

हमे भी राज्य की जनता होने के नाते अपनी-अपनी ज़िम्मेदारी समझनी होगी.  हमारा जहां, जो काम है उसे ईमानदारी और लगन से करना होगा. तभी राज्य की तस्वीर असल में बदलनी शुरु होगी. और यह असली बदलाव होगा. इसी तरह से हमारे सपनों का बिहार खड़ा हो सकता है. इसका कोई शर्ट-कर्ट नहीं है. जब तक हम यानी एक आम बिहारी आलसी, भ्रष्टाचारी और घुसखोर बना रहेगा तब तक राज्य का सही मायने में विकास संभव ही नहीं है. 

हमे सरकार को  विश्वास दिलाना होगा कि आप पैसे भेजिए, योजनाएं बनाइए. जमीन पर उसे लागू जनता करवा लेगी. हम करवाएंगे. 

हमे आने वाली सरकार का बोझ हल्का करना होगा. सरकार को यह विश्वास दिलाना होगा कि जिसका जो हक है उसे वो मिलेगा. दूसरा कोई भी उसका हक नहीं खाएगा और अगर किसी ने भी गरीब या जरुरतमंद का हिस्सा लेने की कोशिश की तो जनता उसे बेनकाब कर देगी.  

हमें यह समझना होगा कि अगर हम अपने अंदर यह बदलाव लाते हैं. राज्य की मदद करते हैं तो इससे किसी दूसरे का कोई भला नहीं होगा. बल्की इससे हमारे बच्चों के लिए ही एक सुन्दर और ईमानदार “बिहार” तैयार होगा. 

“ सपनों का बिहार” बनाना केवल एक सरकार और कुछेक नेताओं के बस में नहीं है. इसके लिए जरुरी है कि हर बिहारी उठ खड़ा हो और कहे- “मुझे बनाना है अपने सपनों का बिहार”

शनिवार, अक्टूबर 02, 2010

जानना जरुरी है.

बार-बार अपने आपको समझाता हूं,
तुम्हे भी बतलाता हूं,
कि मैं परेशान नहीं हूं,
हैरान नहीं हूं.

लेकिन ये सच नहीं है.

अब, तुम जानना चाहोगे,
फिर क्या है सच?
अभी मुझे खुद नहीं पता.

खोज रहा हूं,
फोन में,
कमरे में,
पुरानी यादों में,
गंदी डायरी में,
कमरे के बाहर,
हर जगह,
हर तरफ.

मिल गया तो जरुर बताउंगा,
क्योंकि सच जानना जरुरी है.

बुधवार, सितंबर 29, 2010

लालू के लाल का असमंजस!!

बिहार के पूर्व मुखिया लालू यादव अपने पटना वाले सरकारी आवास के अहाते में पेट तक लुंगी लपेटे और उपर एक गंजी डाले लट्टू की तरह चक्कर काट रहे हैं. सामने रखे टीवी सेट पर लगातार नीतीश के कविता पाठ की खबर चल रही हैं और इसी खबर को सुनकर लालू के टहलने की स्पीड बढ़ गई है. उन्होंने टहलते हुए ही आवाज लगाई, “अरे, कौउनों बंद करो इ टीवी को. का बकवास दिखा और सुना रहे हैं ससुरे….”

अंदर से किसी ने आकर टीवी सेट का कान घुमा दिया. टीवी तो बंद हो गया लेकिन साहब के कानों में नीतीश की कविता लाउड स्पीकर की तरह बज रही थी. लालू ये सब सोच ही रहे थे कि पीछे से आवाज आई. “ पापा...मैं गाड़ी ले जा रहा हूं.”

आवाज की तरफ लालू पलटे तो देखा कि बेटा (तेजस्वी) कंधे पर क्रिकेट का किट लिए बाहर की तरफ जा रहा है. बेटे को आवाज लगता हुए बोले, “खाली खेल-वेल के चक्कर में रहते हो, अभी इधर आओ..”

 “मुझे प्रैक्टिस के लिए देरी हो रही है.” बेटे ने जवाब दिया. लालू थोडा तमक कर बोले, “बुला रहे हैं न. अभी यहां आओ. प्रैक्टिस के लिए बाद में जाना”

पापा के गर्म मूड को भांप कर तेजस्वी ने अपने कंधे से क्रिकेट का किट निचे पटक दिया और पास आकर बोला, “क्या है?”

बेटे के कंधे पर हाथ रखते हुए लालू ने थकी आवाज में पूछा, “आज का समाचार देखे कि नहीं.”

 तेजस्वी, “नहीं क्या हुआ?”

“ई नितीशवा सरेआम हमारा मजाक उड़ा रहा है, हमरे और तुम्हरे माई के उपर कविता लिखवा कर पढ़ रहा है.”

तेजस्वी, “अच्छा! तो फिर हम अपने वकील से बात करके उनके उपर मानहानी का दावा करवा देते हैं”

लालू, “नहीं रे बुरबक! इहे त उ चाहता है. ये सही नहीं है. हमभी कल प्रेस वालों के सामने एक कविता पढ़ना चाहते हैं. नीतीश पर. और हम ई भी चाहते हैं कि तुम्हे भी पालिटिक्स में कल ही लांच कर दें. ई गुल्ली-डंडा बहुत हुआ अब ऊ करो जिससे आगे तुम्हारी रोजी-रोटी चलने वाली है, समझे.”

तेजस्वी का मन तो हुआ इस प्रपोजल के विरोध में कुछ कहे  लेकिन अपने पापा के चेहरे पर चिंता की लकीर देखकर चुप रहा और हामी भर दी.

लालू को थोड़ा साहस मिला बोले, “तो बेटवा ले आओ कागज कलम और लिख त दो एक चिकोटी काटने वाली कविता.”

“कविता, नहीं-नहीं पापा ये मुझसे नहीं होगा….मैंने तो दसवीं में भी कविता नहीं पढी थी.”

कविता लिखने के नाम पर बेटे को इस तरह से हलकान होते हुए देख लालू ने कहा, “अरे ई का कह रहे हो…. नहीं कैसे होगा. अभी तक नहीं पढ़े तो क्या…अब लिख दो.”

“लेकिन कैसे पापा?” तेजस्वी ने विस्मित भाव में पूछा.

“वैसे ही जैसे हमने पहली बार सत्ता मिलते ही पंद्रह साल इहां राज किया. हमने भी तो इ सब पहले बार में ही किया था. कोई ट्रेनिग थोड़े न लिए थे.” लालू ने जवाब दिया.

पापा का यह जवाब सुनकर बेटे में थोड़ा विश्वास आया लेकिन अभी भी कुछ कसर थी सो उसने कहा, “आप कॉलेज से ही राजनीति कर रहे थे और आपको इन सब का अनुभव था.”

“अरे बाकल, अनुभव गया तेल लेने. ठीक है हमें छोड़ो…अपनी घरेलू माई से सीखो. उसको कउन सा अनुभव था. संकट पड़ी तो ऊ जम गई ना गद्दी पर. और आठ साल तक राज भी किया. अब तुमही को ई गद्दी संभालनी है. एक कविता लिखने से इतना घबराओगे तो लंबा-लंबा भाषण कइसे दोगे?”

अपने पापा और मम्मी की दिलेरी की कहानी सुनकर तेजस्वी के अंदर आत्मविश्वास कुलांचे मारने लगा और वो कलम-कागज लाने के लिए तेजी से अपने कमरे की तरफ भागा.

बेटे की इस फुर्ती को देखते हुए लालू जी की तोंद में हल्की कंपन हुई.

तभी उनकी नजर सामने से चाय की प्याली लिए आती राबड़ी पर पड़ी. उन्होंने दूर से ही आवाज लगा दिया, “सुनती हो….हमारा परिवार बिहार का पहला ऐसा परिवार होगा जिसमें बाप, महतारी और बेटा तीनों सीएम होगा. कल हम अपने बेटे को राजनीति के मैदान में लांच कर देंगे, क्रिकेट के मैदान पर बहुत खेला.”

यह सब सुनकर राबडी देवी को कोई एक्साइटमेंट नहीं हुई. वो चुपचाप चाय का कप लालू जी के हाथ में पकड़ाकर दोबारा किचेन की तरफ कूच कर गईं.

शुक्रवार, सितंबर 10, 2010

आइए, बोली लगाइए और ले जाइए.

क्या आपने कभी लड़कों को बिकते देखा है अपनी शादी के लिए. अगर आपको यह मौका अब तक नहीं मिला तो देर मत करिये. बिहार आ जाइए. आपको यह नज़ारा बखूबी दिख जाएगा और सच मानिए, जब आप लड़कों को कई-एक लाख में बिकते देखेंगे तो आगे से यह कहने से पहले सौ बार सोचेंगे कि बिहार एक गरीब राज्य है. भाई साहब, शादियों के मौसम में इस पूरे राज्य की हर जाति और बिरादरी (खासकर कुछ अगड़ी जातियों भुमिहार, राजपुत और ब्राहमण) में दहेज के नाम पर लेने-देने का जो क्रम चलता है वो सब्जी मंडी में होने वाले मोल-भाव को भी मात दे देता है.

यहां एक बेटी का बाप अपने लिए दामाद और अपनी बेटी के लिए दुल्हा लाता नहीं है बल्कि खरीदता है. अपनी बेटी की शादी करने के लिए किसी दरवाजे पर जाने से पहले अपनी जमां-पूजी और जमीन-जायदाद को जोड़ कर देखता है कि जिस लडके से वह अपनी बेटी ब्याहना चाहता है वो लड़का उसकी बजट में है या नहीं. यहां बजट से मतलब शादी में होने वाला खर्च कतई नहीं है. इस बारे में यहां  एक आम सोच है कि शादी में होने वाला खर्च तो वैसे भी लड़की वालों को उठाना ही चाहिए क्योंकि उनकी बेटी जो ब्याही जा रही है. यह धारणा इतनी आम बन चुकी है कि इसमें किसी को कोई दिक्कत या परेशानी नहीं होती है.

अगर होती भी होगी तो दिखती नहीं है. वैसे तो अब सालों भर शादियां होती हैं लेकिन छठ पर्व के बाद लड़की की बाप अपनी सवारी पर निकलता है, लड़के की तालाश में.  इस खोज में कुछ रिश्तेदार और आस-पड़ोस वाले अहम  रोल अदा करते हैं. ऐसे खोजी लोगों की जमात को अगुवा की उपाधी से नवाजा जाता है. अगुवा की उपाधी जिन लोगों को मिलती है उसमे ज्यादातर ऐसे मर्द होते हैं जो अपनी नौकरी से रिटायर हो चुके होते हैं या फिर वैसी महिलाएं होती हैं जिनके पास घर के काम के बाद ज्यादा से ज्यादा समय वैसे ही बचा रह जाता है. अगुवा बिरादरी शादी करवाने में अहम किरदार निभाता है. वैसे आदमी या औरत सफल अगुवा होते हैं जिसके पास ज्यादा से ज्यादा जानकारी हो और जो मोलभाव करने में भी माहिर हो.

अब अगर किसी बाप को अपनी बेटी ब्याहनी होती है तो सबसे पहले किसी चलती-फिरती डायरेक्टरी (अगुवा) से संपर्क साधता है और अपने मन की बात बताता है. अब यहां से अगुवा का काम शुरु होता है. अगुवा बेटी की बाप का बजट जानने के बाद उसे उसके बजट के मुताबिक लड़का बतला देता है. साथ-साथ यह भी बतला देता है कि कितनी रकम नगद देनी होगी और कितने का सामान देना होगा. कुछ सामान तो आज की डेट में फिक्स हैं जैसे अगर आप 2 लाख से 4 लाख नगद दे रहे हैं तो साथ में एक बाईक ताकि शादी के बाद लड़का-लड़की उस बाईक से आ जा सकें. एक कलर टीवी चाहे इलाके में लाइट हो या न हो. एक पलंग ताकि लड़का-लड़की सो सकें.

पलंग के लिए गद्दा, दरवाजे पर रखने के लिए सोफा,  स्टील के बरतन ताकि कल ल़ड़की को कोई दिक्कत न हो आदि. अगर नगद 4 से 10 के बीच में देनी हो तो टीवी प्लाजमा हो जाएगा, पंलग और सोफा किसी ब्रांडेड कंपनी का होगा और बाईक की जगह चार पहिया ले लेगा. गाड़ी हमेशा लड़्के की पंसंद की होती है. अगर नगद 10 लाख से 20 या 30 लाख हो तो इन सभी चीजों के साथ मुज्जफरपुर या पटना में ज़मीन या बना बनाया फ्लौट अपने आप जुड़ जाता है.

लड़की वालों से कितना पैसा नगद लेना है यह वर पक्ष के बड़े-बुजुर्ग तय करते हैं.  रकम तय करते वक्त हर छोटी से छोटी बात और खर्च का ध्यान रखा जाता है. जैसे- दुलहन के लिए जेवर-जेवरात, कपड़े और सामान लेने में कितना खर्च आएगा? बारात ले जाने में कितना खर्च आएगा? शादी के लिए बैंड कितने में आएगा? कहने का मतलब कि हर छोटे-बड़े खर्च का अनुमान लगाने के बाद यह तय किया जाता है कि कितनी रकम लेनी है.
अगर तय रकम, तय तारीख तक लड़के के पापा के पास पहुंच गया तब तो सब ठीक, सब कुछ मजे में. लेकिन अगर तय नगदी से कुछेक हज़ार या एकाध सामान भी तय समय तक लड़्के वालों के दरवाजे पर नहीं पहुंचा तो फिर कौन समधी, कैसा रिश्ता और किसकी शादी? भाई साहब, इतने के बाद तो सब कुछ बदल जाता है.

मामला यहां तक जा सकता है कि लड़की के बाप को जी भर गालियां भी सुननी पड़ सकती हैं और यह धमकी भी कि अब तो रिश्ता होने का सवाल ही नहीं है. उस वक्त अगर बचा हुआ पैसा या सामान आ गया तो फिर देखिए कैसे वही लड़के का बाप (जो थॊडे समय पहले अपने पजामा से बाहर हुआ जा रहा था और अपने होने वाले समधी को गरिया रहा था) कितने शान और सलजता से अपने समधी के साथ बैठा है.

लड़के के घर वालों की कोशिश होती है कि शादी का पूरा खर्च लडकी के बाप से नक़द वसूल किया जाए या फिर जितनी रकम मिली है खर्च उसी के अंदर ही किया जाए. इस बात का बखूबी ध्यान रखा जाता है कि खुद का एक पैसा न लग पाए.
इन सब के बाद लड़का अपनी शादी में पहनने के लिए शूट सिलवाएगा, मंहगे से मंहगा जूता, बेल्ट, मोजा, रुमाल, और चड्डी – बनियान तक खरीदवाएगा अपने होने वाले ससूर से. अगर इसमे कोई कमी रह गई तो फिर रंग देखिए लड़के का. जो लड़का आज तक रूपा मैक्रोमेन से आगे नहीं गया उसे भी जॉकी की चड्डी चाहिये होगी और रिबलाइन बनियान.

एक लड़की का बाप अपनी बेटी को ब्याहने के लिए हर किसी के नखरे उठाता है बिल्कुल सर झुका कर रखता हैं और मन ही मन इस बात की तैयारी भी करता रहता है कि जब वह अपने इकलौते बेटे की शादी करेगा तो कैसे लड़की वाले से आज का बदला लेगा. इतना सब कुछ होने के बाद भी अगर आपने किसी लड़के को यह कह दिया कि तुम शादी नहीं कर रहे हो बल्कि बिक रहे तो वो आपसे लड़ने को तैयार हो जाएगा.

किसी लड़के के बाप को यह बात सबसे ज्यादा मिर्च लगाती है कि वह अपने बेटे का ब्याह नहीं कर रहा है बल्कि एक सौदा कर रहा है. तो यहां की शादी में सब कुछ होता है – प्रोडक्ट (लड़का), सेल्समैन (लड़का-पार्टी), दलाल (अगुवा) और ख़रीददार (लड़की का बाप). इस पूरे सीन में बस एक चीज़ की इनवॉल्वमेंट नहीं होती और वो है लड़की.

मंगलवार, सितंबर 07, 2010

आपको हुई असुविधा के लिए खेद है.....!


करीब दो घंटे से किसी भी ए.सी. बस के न आने से परेशान एक दिल्लीवासी ने डीटीसी मुख्यालय में फोन घुमा दिया.

करीब दो रिंग के बाद दुसरी तरफ से एक भले मानस की आवाज आई, “डीटीसी हेल्पलाईन में आपका स्वागत है…बताइए आपकी क्या समस्या है?”

फोन करने वाले व्यक्ति को इस नंबर से इतनी सुसज्जित हिन्दी की उम्मीद नहीं थी. सो थोड़ा घबरा गया. फोन को कान से हटा कर देखा फिर थोड़ा मुस्काते हुए बोला, “भाई साहब, क्या कर रहे हैं आपलोग? सुबह का टाईम है. आफिस जाना है. एक भी बस नहीं आई पिछले दो घंटे से. आखिर, चक्कर क्या है?”

व्यक्ति ने अपनी सारी भड़ास निकालते हुए एक हीं सांस में पूरी बात कह डाली. 

“सर, आपको हुई असुविधा के लिए हमे खेद है!” दूसरी तरफ बैठे डीटीसी के अधिकारी ने कहा.
बस स्टॉप पर घंटे से खेड़े व्यक्ति को अब यह सुसज्जित शब्दवाण की तरह लग रहे थे.

अधिकारी की बात बीच में काटते हुए बोला, “खेद-वेद की छोडिये….ये बताइए कि ए.सी. बस कब तक आ रही है?”
 दूसरी तरफ से आवाज आई, “ए.सी. बस अगले कुछ दिनों तक नहीं आएगी. असुविधा के लिए खेद है!” 
अबकी, फोन करने वाले ने कड़ती आवाज में पूछा, “क्यों? क्यों नहीं आएगी भला?”

डिटीसी हेल्पलाईन वाले ने बिल्कुल नम्रता से जवाब दिया, “सर, अगामी गेम के लिए गाड़ियों को अभी से बुक कर लिया गया है. आपको कुछ दिन तक ब्लू लाईन में सवारी करनी होगी. गेम के बाद हम आपको पूरी सेवा दे पाएंगे. तब तक हुई असुविधा के लिए हमे खेद है…...! आपका दिन शुभ हो..!

इससे पहले की फोन करने वाला कुछ बोलता. दुसरी तरफ से टीं…टीं…टीं की आवाज आने लगी.

बुधवार, अगस्त 25, 2010

हे कलमाड़ी, आप न घबराना.

सुरेश कलमाड़ी जी,
नमस्ते,
वैसे तो पत्र के शुरु में हालचाल पूछा जाता है लेकिन मैं ऐसा करके जले पर नमक छिड़कने का काम नहीं करूंगा. हर रोज जानकारी मिलती रहती है कि कैसे आप जैसा एक खांटी खेल प्रेमी और देश की इज़्ज़त का सच्चा रखवाला परेशान किया जा रहा है.

रोज, सुबह की अखबार खोलते हीं सबसे पहले आपकी खैरियत जानने के लिए गेम से जुड़ी खबरों की तरफ आंखे दौड़ाता हूं. लेकिन हर दिन निराशा ही हाथ लगती है. रोज कोई कोई आपको बुरा-भला बोल कर निकल जाता है. एक दो दिन पहले तो हद ही हो गई. शांत चित्त और प्रसन्न मुख वाले प्रधानमंत्री जी ने भी आपको हड़का दिया. ज्यादातर मौके पर केवल मुस्कान बिखेरकर निकल जाने वाले अपने सरदार जी से भी चुप नहीं रहा गया

मुझे समझ नहीं रहा कि आपने ऐसा क्या कर दिया है जो हर कोई आपकी तरफ हुडकी मार रहा है. मुझे क्या, ज्यादातर लोगों को नहीं पता होगा कि हुआ क्या है. बस बोलना है सो बोले जा रहे हैं.
कोई सामने कर बताए तो कि आपने किया क्या है? आखिर दोष क्या है?

अगर आपकी कोई गलती है तो वो बस इतनी कि आपने इस भुक्खड़ और हमेशा ही गरीबी में रहने वाले देश के लिए इतने बड़े गेम की मेजबानी हासिल की

आपने तो अच्छा ही सोचा था. आपको क्या पता था कि यहां के लोग इंदिरा जी के काल में भी गरीब थे और आज मनमोहन की सरकार में भी हैं. वैसे ज्यादातर नेता आपको इस बात के लिए नहीं कोस रहे कि आपने इस गेम की मेजबानी क्यों ली और इतना पैसा एक गेम के लिए क्यों खर्चा जा रहा है. इन्हें भी पता है कि इस देश से गरीबी अब तक गई है और आगे कभी जाएगी. यहां गरीब के अमीर बनने का एक ही आसान रास्ता है. सबको नेता बनना पड़ेगा. केवल नेता से काम नहीं चलेगा. मंत्री बनना पड़ेगा. जो गरीब लोग वक्त रहते नेतागिरी में गए उनका आज देखिए. दस-पांच लखपति को तो अपने अगल-बगल रखते हैं

खैर, मैं मुद्दे से भटक गया था. माफ करिएगा! इस देश में सबको ज्यादा बोलने की आदत है. क्या नेता, क्या जनता और क्या पत्रकार. सबके-सब अति बोलक्कड़ होते हैं. बड़े बुजुर्ग कह गए हैं कि ज्यादा बोलने से काम खराब होता है. हर कोई आपको बोल रहा है, झाड़ रहा है और इससब में खेल की तैयारी खाक होगी बस भसड़ हो रहा है. आप ऐसा मत होने दीजिए. जिस मन और हिम्मत से आपने गेम का आयोजन दुनियां से छीना था उसी लगन से लगे रहिए

अगर ध्यान लगाने में दिक्कत हो रही हो तो एक-दिन के लिए बाबा रामदेव जी के यहां से हो आइए. बड़ा अच्छा ध्यान लगवाते हैं. वैसे उन्हें भी आपकी तरह देश की इज़्ज़त बहुत प्यारी है. तभी तो बाबागिरी छोड़कर राजनीति के अखाड़े में लंगोट बांधने के लिये तैयार हैं. रामदेव जी आपको निराश नहीं करेंगे वो हर संभव आपकी मदद करेंगे

हंसी तो तब आती है जब घुसखोड़ी, घपलों और घोटालों के दम पर खड़े हमारे माननीय जनसेवक आपको गेम में हो रही भ्रष्टाचार के लिए गरियाते हैं. क्या जमाना गया है? जिन पर घोटालों के अनगिनत मामले लदे हैं, जो गरीबों के पैसे से पार्क और पार्कों में अपनी आदमक़द मुर्तियां लगवा रहे हैं वही लोग आप पर निशाना साध रहे हैं. जो राहत का सामान और कचरा तक कोंच कर ठाठ से बैठे हैं वही नेता आप पर गरीबों के पैसे लुटाने का आरोप लगा रहे हैं

मैं कहता हूं कि अगर आप एकाध करोड़ लुटा भी रहे हैं या कुछ लाख-वाख इधर-उधर हो भी जाता है तो इसमे गलत क्या है. इतना बड़ा आयोज़न है तो हल्का-फुल्का इधर-उधर तो होगा ही. इसमे कौन सी नई बात है!

सो कलमाड़ी जी, मैं आपको कहना चाहता हूं कि आप इन गीदड़ भवकियों से हड़किएगा मत. ये सब तो चलता रहेगा. एक कहावत है हमारे इलाके मेंहाथी चले बाज़ार, कुत्ता भौंके हज़ार”. बस समझिए ऐसा ही कुछ हो रहा है. एक बार खेल खत्म हुआ कि सबकुछ हज़म हो जाएगा

जहां तक बात हो रही है जांच की तो उसके बारे में आपसे क्या कहना. हमारे यहां के जांच तो बस चलते हैं, और चलते हैंबस चलते ही जाते हैं. इनका कोई नतीज़ा नहीं निकलता. वैसे ये-सब तो आप मुझसे बेहतर ही जानते हैं. आपकी दाढ़ी के बाल तो पक चुके हैं ये सब देखते-समझते. सो आप डरिएगा नहीं. घबराइएगा नहीं. टूटिएगा नहीं. बस अपने मिशन में लगे रहिए. मिशन कॉमनवेल्थ गेम

हां चलते-चलते एक जरुरी बात. इनसब झमेलों से थोड़ा समय निकालकर अपने परिवार को भी दीजिए क्योंकि बुरे वक्त में आपका परिवार ही आपके साथ रहेगा. वैसे खुदा करे कि आप जैसे सच्चे सिपाही को कभी कोई बुरा टाईम देखना पड़े

आपकी सलामती और लम्बी उमर की दुआ के साथ इस पत्र को खत्म करता हूं. विशेष बातें किसी प्रेस बैठक में मिलने पर.
आपके जज़्बे को सलाम!!
राष्ट्रमंडल खेल की जय हो!!