गुरुवार, अप्रैल 08, 2010

तेरा बसेरा यहां नहीं....!!


तू कहीं और जा,
तेरा बसेरा यहां नहीं,


खुद की हरकतों से, 

आज बर्बाद है,
कपटी है बना, 

एक वहशी भी तूझ में तैयार है, 

चल जा, तू कहीं और जा…….!!



शनिवार, अप्रैल 03, 2010

मेरे प्यारे प्रधानमंत्री जी.......

प्यारे प्रधानमंत्री जी,

मेरा नाम रौनक है और हम आपकी दिल्ली से बहुत दूर  एक गांव में रहते हैं.  मेरे साथ मेरी मां है जो पिछले कुछ दिनों से बीमार है. बाबा खेती करते हैं. बड़ा भाई जिसकी उम्र 20 साल है,  बाबा के साथ खेत पर काम करता हैं लेकिन दिल्ली जाना चाहता है. उसका कहना है कि खेती करने से हम कभी भी अमीर नहीं हो सकते. अगर वो दिल्ली जाएगा तो ज्यादा पैसे कमा पाएगा. लेकिन मेरे स्कूल के मास्टर जी तो कहते हैं कि सरकार मतलब आप लोग किसानों के लिए बहुत सी योजनाएं बना रहें तो फिर मेरा भाई ऐसा क्यों कह्ता है कि खेती करने से गरीबी नहीं जाएगी. मुझे तो कुछ समझ नहीं आ रहा है कि मेरा भाई कमाने के लिए दिल्ली ही क्यों जाना चाहता है.

खैर, मैं तो आपको यह चिठ्ठी इसलिए लिख रहा हूं कि कल स्कूल में मास्टर साहब आपस में बात कर रहे थे. जब मैं उनके लिए बगल की चौक से चाय लेकर पहूंचा तो सुना कि आपने कोई शिक्षा का अधिकार कानून लागू किया है. वही लोग कह रहे थे कि इसके बाद 6 साल से 14 साल तक के हर बच्चे को पढ़ाई-लिखाई करने का अधिकार मिल जाएगा.
यह सुन कर मुझे बहुत अच्छा लगा और मैं इसके लिए आपको बधाई देना चाहता हूं. मैं तो आपको यह खत अंग्रेजी में लिखना चाहता था क्योंकि मैंने आपको टीवी पर फटाफट अंग्रेज़ी बोलते हुए सुना है.  आप बहुत अच्छी अंग्रेज़ी बोलते हैं.

मैं आपकी तरह अंग्रेजी बोलना चाहता हूं लेकिन क्या करूं? हमारे स्कूल में अंग्रेज़ी की पढ़ाई ही नहीं होती क्योंकि कोई टीचर ही नहीं है. मुझे लगता है कि आपको इस कानून को लाने से पहले हमारे स्कूल में अंग्रेज़ी के मास्टर साहब को भेजना चाहिए था. वो ज्यादा जरुरी था.  

मैं बहुत पढना चाहता हूं. बहुत, मतलब बहुत….. लेकिन बाबा कहते हैं कि वो मुझे ज्यादा नहीं पढ़ा सकते क्योंकि उनके पास पैसे नहीं है और न हीं कोई काम  है. अभी मैं आठवी क्लास में हूं और मास्टर साहब कहते हैं कि दसवी के बाद स्कूल की पढ़ाई खत्म हो जाएगी और आगे की पढ़ाई के लिए कालेज जाना होगा. लेकिन मेरे बाबा मुझे कालेज में नहीं पढ़ा पाएंगे. अब अगर स्कूल के बाद वो मुझे पढ़ाई छोड़ने के लिए कहते हैं तो मैं क्या करूंगा?

क्योंकि आपने अभी जो कानून लागू किया है उसमें भी तो चौदह साल के उम्र तक के बच्चों को ही शिक्षा का अधिकार मिला है. उसके बाद के उम्र वालों के लिए तो आपने अपने कानून में कुछ कहा ही नहीं. अब ऐसे में तो मेरे लिए आपका यह कानून किसी काम का नहीं हुआ न. बताइए?

मैंने अपने जिस भाई के बारे में आपको बताया था कि वो दिल्ली जा कर काम करना चाहता है वो भी पढ़ना चाहता था. उसने दसवीं पास भी की और अंक भी अच्छे आए थे लेकिन क्या हुआ… वो आगे नहीं पढ़ पाया. क्योंकि हम गरीब हैं और बाबा केवल खेती करते हैं. पता है आपको, बाबा भी भईया को पढ़ाना चाहते थे लेकिन उनके पास पैसे ही नहीं थे सो खूब  रोये और भाई की पढ़ाई छुड़वा दी!

मुझे लगता है कि मेरे साथ भी यही होगा. मुझे भी अपनी पढ़ाई छोडनी होगी और उस वक़्त भी बाबा, मैं और बीमार मां सब खूब रोएंगे.

प्रधानमंत्री जी, अगर आपने शिक्षा देने के लिए कानून बनाया ही तो उसे 14 की बजाय 20 साल तक के बच्चों के लिए कर देते. आपका तो ज्यादा कुछ नहीं जाता पर आपके इस कानून की बजह से मैं और मेरे जैसे कुछ बच्चे तो कालेज का मुंह देख लेते.

वैसे एक बात और कहना चाहता हूं आपसे, हमारे पास अपना घर नहीं है. बाबा बता रहे थे कि आपने घर बनवाने के लिए भी एक योजना “इंदरा आवास योजना” चला रखी है. इस योजना से घर बनबाने के लिए मेरे बाबा हर रोज ब्लॉक जाते हैं और खाली हाथ लौट आते हैं. अभी तक कोई पैसा नहीं मिला. क्या फायदा ऐसी योजनाओं का?

बाबा ने काम के लिए, रोजगार गांरटी योजना से भी कार्ड बनबाया हुआ है लेकिन जब से कार्ड बनबाया है कोई काम नहीं मिला. कहते हैं पैसे नहीं सरकार के पास? आप के पास तो बहुत पैसा है. ऐसा मेरा दोस्त कहता है.
अगर आपके पास भी पैसों की कमी है तब तो आप भी गरीब हुए. लेकिन आप गरीब कैसे हो सकते है? आप तो केवल खेती नहीं करते हैं. बाबा कहते हैं कि जो कवल खेती पर रहता है उसकी किस्मत ही फूट जाती है और किसानी करने वाला गरीब ही रहता है.

प्रधानमंत्री जी, मैं अभी तो एक बच्चा हूं लेकिन बड़ा हो कर आपके जैसा बनना चाहता हूं. न तो मैं अपने भाई की तरह पढ़ाई लिखाई छोड़ कर दिल्ली में काम करना चाहता हूं और न ही अपने बाबा की तरह केवल किसानी करना चाहता हूं.

मैं तो पढ़ लिख कर अपने कलाम चाचा की तरह बहुत बड़ा वैज्ञानिक बनना चाहता हूं लेकिन मुझे कोई रास्ता नहीं सूझ रहा.  अब आप ही बताइए कि मैं क्या करूं?

आपका प्यारा
रौनक.

मंगलवार, मार्च 30, 2010

चुप हो जाओ नहीं तो चलती ट्रेन से फेंक दूंगा

 धर्म हमारे यहां एक बेहद संवेदनशील विषय हैं.  धर्म या भगवान के बारे में कुछ भी बोलने से लाखों लोगों की भावनाएं ऐसे भड़कती हैं जैसे अपनी परछाईं को देखकर भेड़ या लाल कपड़े को देखकर सांड़ भड़कता है. मुझे तो लगता है कि इन्सान इस विषय पर ऐसा भड़कता है कि कुछ देर के लिए मरखंड से मरखंड़ साड़ भी शरमा जाए.

क्यों हम अपने धर्म के बारे में आलोचना का एक शब्द भी नहीं सुनना चाहते. क्यों हम राम को न मानने वालों को चलती ट्रेन से फेंक देने की धमकी दे देते हैं? क्यों हम इस बारे में कोई तर्क नहीं करना चाहते और तर्कपूर्ण बातों को भी अपनी थोंथी दलीलों से पोत देना चाहते हैं? 

मेरी समझ से ऐसा इसलिए होता होगा क्योंकि हम नहीं चाह्ते कि कोई हमारी सोच पर प्रहार करे बल्कि यह चाहते हैं कि हम चीजों को जैसे देख रहे हैं, समझ रहे हैं दूसरे भी वैसा ही समझें और देखें. उसी राह पर चलें जिस राह पर हम चल रहे हैं. वैसे तो भगत सिंह को इस देश में बहुत इज्जत दी जाती है लेकिन धर्म और भगवान के बारे में कही गई उनकी बातों को लोग सिरे से नकार देते हैं. 

मेरा ऐसे कुछ कट्टर हिन्दूओं से पाला पर चुका है. आगे कुछ भी कहने से पहले मैं यहां एक बात साफ कर देना चाहता हूं कि जिन लोगों से मैं उस ट्रेन में मिला वो विश्व हिन्दू परिषद या बजरंग दल के कार्यकर्ता नहीं थे बल्कि हमारे आपके जैसे आम लोग थे. जो एक आम ज़िन्दगी जीते हैं. 

बात ज्यादा पुरानी नहीं है. मैं अपने भाई को बंग्लौर पहूंचा कर ट्रेन से पटना लौट रहा था. संघमित्रा एक्सप्रेस में मेरे साथ जो और सहयात्री थे उनमे से ज्यादातर बिहार या उत्तर प्रदेश के थे. वो लोग भी अपने-अपने बेटे-बेटियों को पहुंचा कर लौट रहे थे. ट्रेन में बैठने के थोड़ी देर बाद ही हम सब की जान पहचान हो गई. 

शम  6:30 की  गाड़ी थी सो पहली रात में हल्की-फुल्की बातचीत हुई और फिर हम सब अपने अपने बर्थ पर सो गए.  दूसरे दिन जैसे-जैसे गाड़ी आगे बढ़ रही थी हमारी बातचीत भी परवान चढ़ रही थी.  दिनभर वही सब बातें होती रहीं जो अक्सर ट्रेन और बसों में यात्रा के दौरान होती हैं. जिन्हें आप रास्ता कटाउ बातें भी कह सकते हैं लेकिन जैसे-जैसे दिन ढलने लगा वैसे-वैसे ही बातचीत का माहौल भी बदलने लगा. 
 
हम लोगों के साथ एक मुस्लिम लड़का भी सफर कर रहा था. वह ज्यादा पढ़ा लिखा नहीं जान पड़ता था. बात कहीं से घूमते फिरते धर्म और खासकर इस्लाम धर्म के बारे में होने लगी थी. करीब करीब चार लोग आरोप लगा रहे थे और अकेले वह लड़का अपनी पूरी क्षमता से अपने धर्म का बचाव कर रहा था. इस सब में एक मोटे ताजे पंडित जी भी थे जो उत्तर प्रदेश से ताल्लुक रखते थे. 

वो कुछ ज्यादा ही आरोप लगा रहे थे. जैसे इस धर्म में तो बच्चे को पैदा होते ही मारकाट सिखाया जाता है. वो अपनी बात को साबित करने के लिए हर फालतू से फालतू तर्क का सहारा ले रहे थे.

जैसे अपनी उपर कही बात को साबित करने के लिए उन्होंन तर्क दिया कि मुस्लमानों में लड़कों का खतना होता है और खतना इसलिए होता है कि  वो खून देख सके और आगे के लिए तैयार हो सके. 

इन सब के बीच मैं चुप था और सोच रहा था कि जल्दी से जल्दी यह विषय बंद हो लेकिन वो तो बोलते ही जा रहे थे. उन्हें पता था कि  मैं पेशे से पत्रकार हूं सो उन्होने इस बारे में राय मागीं. लेकिन मैंने कुछ भी कहने से मना कर दिया. अब उनके साथ-साथ पटना के भी कुछ लोगों ने मुझसे बोलने के लिए कहा. 

मैं बोलना तो चाहता ही था लेकिन माहौल को देखकर चुप था. मैंने उन सभी से कहा कि मैं इस विषय में इसलिए कुछ नहीं बोलना चाहता क्योंकि मैं किसी भी धर्म और किसी भी भगवान नामक सत्ता पर विश्वास नहीं करता. पर बोलना पड़ा. उत्तर प्रदेश वाले पंडित जी ने मुझ पर सवालों की झरी लगा दी. जैसे मेरे पापा का क्या धर्म है? अगर भगवान नहीं है तो यह दुनिया कैसे चलती है? अगर कोई शक्ति नहीं है तो मैं कहां से पैदा हुआ?

ये वही कुछ सवाल थे जो हर एक आस्तिक, एक नास्तिक के सामने रखता है. मैंने भी पूरी कोशिश की जबाव देने की और उन्हें संतुष्ट करने की लेकिन वो नहीं माने. मैंने अपनी बात को भगत सिंह और राहुल संस्कृतायन के सहारे भी कहने की कोशिश की लेकिन कोई फयदा होता नहीं दिखा. हालात इस तरह के हो गए थे कि उस पूरे ड्ब्बे में केवल दो लोग बोल रहे थे. एक पंडित जी और एक मैं.

कुछ लोग बीच-बीच में पंडित जी के साथ हो जाते थे. मैं बिलकुल अकेला पड़ रहा था. सो सोचा कि बात ही बंद कर दूं. लेकिन वो मुझे ऐसा भी नहीं करने दे रहे थे. उनकी बे तर्क की बातें सुन-सुन कर मुझे गुस्सा आ रहा था लेकिन मैं संयम से उनकी हर बात का जवाब देने की कोशिश कर रहा था. उनका चेहरा लाल हो गया था. वो बोलते-बोलते मेरे बिलकुल पास वाली सीट पर आ गए थे. 

उन्होंने कहा कि इतने सारे लोग जो धर्म और भगवान को मानते हैं क्या वो सारे बेवकूफ हैं? मैंने कहा, ऐसा नहीं है लेकिन वो सारे लोग मुझे अंधे लगते हैं जिन्हें केवल अपना धर्म और अपना भगवान दिखता है. क्या है भगवान का अस्तिव? किसने देखा है भगवान को
 
ये अंधापन नहीं है तो और क्या है कि एक पथर की मुर्त्ती जो बिना आपकी मदद से हिल भी नहीं सकता उसमे आपको अपना भगवान दिखता है. आप उस राम को जपते हैं और मर्यादा पुरुष कहते हैं जो अपनी गर्भवती पत्नी को अकेले जंगल में छोड़ देता है. मैंने कहा, अगर आपके राम आज होते तो उनकी पत्नी ने तलाक ले लिया होता और वो जेल में सजा काट रहे होते. 

मेरे इतना कहते ही उनका गुस्सा सातवें आसमान पर पहूंच गया और उन्होंने मुझे चेतावनी देते हुए कहा, “अगर तुमने आगे एक शब्द और बोला तो यहीं ट्रेन से फेंक दूंगा.” 

उनके इस बोल के साथ ही वो बातचीत खत्म हो गई. वो अपने बर्थ पर चले गए और सारे लोग मुझे सांत्वना देने लगे और मैं उस वक्त बिल्कुल शांत था. आसपास खड़े किसी ने भी उनको यह नहीं कहा कि आपने गलत बोला. इसके उलट कुछ लोग मुझे ही समझा रहे थे कि ऐसे नहीं बोलना चाहिए था. 

शायद सही कह रहे थे वो लोग कि मुझे अपने विचार नहीं रखने चाहिए थे. चुप रहना चाहिए था क्योंकि यहां वैसे लोग नहीं चाहिए जो धर्म के पाखंड में नहीं पड़ना चाहते हैं और इस बारे में खुल कर बोलना चाहते हैं.

बुधवार, फ़रवरी 24, 2010

आम आदमी, आम आदमी और केवल आम आदमी!!

आम जनता के द्वारा निर्वाचित और देश की आम सी दिखने वाली रेल मंत्री ने साल 2010 का रेल बजट पेश कर दिया.


जैसे हर नेता या कहें तो जनसेवक चुनाव के वक्त आम जनता के नाम की माला जपता है. वैसे ही रेल मंत्री और वित्त मंत्री बजट पेश करते वक्त आम जनता के नाम का माला फेरते दिखते हैं. जब भी कोई रेल या वित्त मंत्री अपना बजट भाषण पढ़ता है तो सबसे ज्यादा इसी शब्द “आम जनता” को दुहराता है.

चाहे बजट में इस वर्ग के लिए कुछ हो या न हो लेकिन बात आम जनता की ही होती है. पीछे जब लालू महाराज ने एक फुल एसी ट्रेन चलवाई तो उसे भी आम जनाता के लिए बताया. बाद में वह ट्रेन मझोले अमीरों के लिए चलती दिखने लगी.

लेकिन इसके लिए उस टाइम के रेल मंत्री या उनके अफसरों को तो दोष नहीं ही दिया जा सकता. उन्होंने तो सोचा होगा कि ट्रेन का नाम गरीब रथ है तो गरीब ही चढे़गे.

इस फैसले की ही तर्ज पर लालू ने कई और अहम फैसले लिए थे और उसे आम आदामी के लिए गया बताया था. लेकिन उसके बाद समय बदला और लालू जी की कुर्सी पर ममता जी बैठ गईं. अब ममता जी आम आदमी के लिए फैसलें कर रही हैं. मैं इसकी गारंटी दे सकता हूं कि इनके द्वारा लिया गया हर फैसला भी आम आदमी के लिए ही होगा. ये दीगर है कि उस फैसले से आम आदमी का कुछ भला होता भी है या नहीं.

सोमवार, फ़रवरी 01, 2010

हनुमान हो लिए राम विरोधी

राजनीति खेल का एक ऐसा मैदान है जहां हर कोई हमेशा अपना-अपना दाव चलता रहता है. यहां कुछ भी पहले से तय नहीं होता. इस मैदान का कोई  भी  रेफरी या अंपायर दावे से कुछ भी नहीं कह सकता. 

इधर हमेशा कोई न कोई खेल चलता रहता है. मजे की बात तो यह है कि इस मैदान के खिलाड़ी  हमेशा डटे रहते है और वह भी पूरे मनोयोग से. यहां हर कोई किसी न किसी पर अपना दाव चलाने के  लिए तैयार बठा होता है. 

अब देखिए, अभी कुछ दिन पहले तक मुलायम सिंह और अमर सिंह एक दूजे के लिए बने दिखते थे. अमर के लिए मुलायम राम थे और मुलायम के लिए अमर सिंह छोटे भाई थे. जब भी मैंने अमर सिंह का कोई इंटर्व्यू टीवी पे देखा तो उसमे अमर सिंह को मुलायम के बारे में कसीदे पढ़ते हुए पाया. अपने को कभी मुलायम का भक्त तो कभी राम भक्त हनुमान कहते हुए पाया. 

लेकिन पिछले दिनों एक ही झटके में आज के हनुमान अपने राम से अलग हो गए. सारी यारी-दोस्ती और भक्ति चुल्हे में डाल दिया और तो और हनुमान अपने राम के सबसे बड़े दुश्मन के बारे में कसीदे पढ़ने लगे.

कहीं ये कसीदे इसलिए तो नही पढ़े जा रहे कि राजनीति का यह हनुमान अपने राम के कट्टर विरोधी की गोद में बैठने की तैयारी कर रहा हो. लेकिन अभी कुछ भी कहना अपने आप को झूठा बनाने की तैयारी करना है. सो मैं यह नही कहना चाहूंगा कि अमर मुलायम से अलग होकर माया की जाल में फंसने की तैयारी कर रहे है. फिर वही बात सामने आती है कि यह राजनीति है यहां कभी भी कुछ भी संभव है. 

यह भी हो सकता है कि अमर सिंह  ने बहन जी की तारीफ में जो कुछ भी कहा है वो केवल मुलायम एंड पार्टी को चौंकाने के लिए था, या फिर वो करना कुछ और चाह रहे हों लेकिन मीडिया और मुलायम के नीतिकारों का ध्यान बांटने के लिए ऐसा कहा हो.

खैर, एक बात तो जरुर है कि वगैर आग के लपटें नहीं उठती मतलब अमर सिंह के घर कुछ न कुछ तो पक रहा है.

एक बात तो तय है कि अमर सिंह के इस ब्यान के बाद मुलायम सिंह अपनी साइकिल- सवारी की कला को और बेहतर करने के बारे में सोच रहे होंगे. सोचना भी चाहिए क्योंकि एक बहुत पुरानी कहावत है "घर का भेधी लंका ढ़ाय".

सोमवार, जनवरी 25, 2010

कल एक और गणतंत्र दिवस




हर बार की तरह कल एक और गणतंत्र दिवस का समारोह होगा और आज शाम गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर देश की आम जनता के नाम राष्ट्रपति का संदेश राष्ट्रीय चैनल पर प्रसारित किया जाएगा. इस अवसर पर सब कुछ राष्ट्रिय होगा, सरकारी होगा.


क्या मकसद है इस दिन को मनाने का? मेरे समझ नहीं आता. क्यों जरुरी है राजपथ पर परेड और ये दिखावा? क्या इस दिन को मनाएं बिना हमे इस बात का एहसास नहीं होगा कि हम आज़ाद हैं?

शनिवार, जनवरी 16, 2010

कुछ ऐसा हो जो दिखे

आजकल टीवी की दुनिया में एक भूचाल आया हुआ है. कुछ समाचार चैनल के बड़े पत्रकार त्राहिमाम, त्राहिमाम कर रहे हैं. कोई अपनी खीज फेसबुक पर छोटे-छोटे टॉपिक डाल कर मिटा रहा है तो कुछ बड़े पत्रकार ब्लॉग पर पोस्ट लिखकर अपना दुख जाहिर कर रहे हैं.


लेकिन ये भूचाल, ये छटपटाहट इन पत्रकारों के एक बहुत छोटे से कुनबे में आया है. ऐसा नहीं है कि हर कोई त्रस्त है. कुछ लोग चिल्ला रहे हैं. चीख रहे हैं लेकिन बाकी़ मज़े में हैं.


जो भूचाल आया हुआ है उसका नाम है टीआरपी. जी हां, यह वही साप्ताहिक रिपोर्ट हैं जिसके भरोसे हमारे टीवी वाले ज़िंदा हैं. लेकिन पिछले कुछ दिनों से कुछेक पत्रकार को समाचार पर टीआरपी की मार अखरने लगी है.
आज उन्हें इस बात का अफसोस हो रहा है कि वो समाचार के नाम पर नाटक दिखा रहे हैं और यह पत्रकारिता नहीं है. बिल्कुल सही कह रहे हैं लेकिन एकाएक इस बात का अंदाजा कैसे हुआ इन लोगों को. टीवी से तो समाचार बहुत पहले गायब हो गया था. लेकिन उस वक्त इनलोगों को न तो कोई ऐतराज था और न ही कोई अफसोस.


उस वक्त इन लोगों को टीआरपी से भी कोई एतराज नहीं था. सभी मस्ती में थे. जब एक चैनल ने भूत-पिचास की खबरे दिखानी शुरु की, खबरों में से खबर निकालकर नाटक दिखाना शुरु किया तो उसकी टीआरपी बढ़ गई.
इसके बाद तो सभी चैनल इसी ओर दौड़ने लगे. हर कोई दौड़ा. किसी ने भी रुकने की और सोचने की जरुरत महसूस नहीं की. उस वक्त किसी को भी पत्रकारिता की सुध नहीं थी या कहें तो किसी ने भी इस ओर देखने की जरुरत नहीं समझी.


जब, सब दौडते-दौड़ते थकने लगे, सांस फुलने लगी, चेहरा गंदा होने लगा. आखों से गर्म हवाएं निकलने लगी तो पत्रकारिता और खबर की याद आने लगी.


पिछले दिनों जिन पत्रकारों ने भी ’टीआरपी” को कोसा है, टैम को लेकर पोस्ट या लेख लिखा है वो ऐसे टीवी चैनल के साथ जुड़े हैं जिसकी टीआरपी अच्छी नहीं है. इन बड़े पत्रकारों के चैनल्स ने वो सब कुछ किया जो टीआरपी बटोरने के लिए किया जाना चाहिए लेकिन फिर भी इनकी नैया हिचकोले खा रही है. डगमगा रही है.
इस हालत में इन संपादकों को ऐसा लग रहा होगा कि “न इस पार के रहे न उस पार के’.


तो ख्याल आया कि क्यों न टीआरपी को ही कोसा जाए. ताकि लोगों की नजर में बेहतर पत्रकार की छवी बनी रहे.
जैसा कि ये संपादक अपने लेख में लिख रहे हैं कि टीआरपी से नुकसान हो रहा है और इसे बंद किया जाना चाहिए तो ऐसी ही आवाज उन चैनलों के मालिकों की तरफ से भी आनी चाहिए जो अभी टीआरपी की मलाई खा रहे हैं.


इस बारे में काम करने की जरुरत है. इन लिखाड़ समाचार संपादकों को चाहिए कि वो इस मसले पर अपनी बिरादरी में एक राय बनाएं और कुछ ठोस कदम उठाएं जो फेसबुक, ब्लॉग और अखबार के अलावा उनके चैनलों पर भी दिखे.

रविवार, जनवरी 10, 2010

मीडिया का क्या करें?

पश्चिम बंगाल के एक वयोबृद्ध नेता और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री बिमार हैं. बंगाल के एक अस्पताल में उनका इलाज चल रहा है.

इस तरह के खबरों के बीच एक खबर आती है कि बिमार नेता नहीं रहे. वो स्वर्ग के लिए निकल गए हैं. लेकिन अगले दिन खबर मिलती है कि नेता के मरने की खबर झूठी थी. नेता अभी भी अस्पताल में हैं और मौत से लड़ रहे हैं.

अब कोई बताए कि मीडिया के माध्यम से दी गई उस झूठी खबर के लिए कौन जिम्मेवार है?

क्या कारण है कि किसी के मरने से पहले ही उसके मौत की खबर दे दी जाती है. जब इस तरह की खबर आई तो मुझे अपनी एक दोस्त की बातें याद आने लगी.

कुछ दिन पहले वो एक न्यूज एंजेसी के साथ बतौर पत्रकार काम करती थी. उसने वहां देखा कि जैसे ही कोई नेता या प्रतिष्ठित व्यक्ति बिमार पड़ता है या अस्पताल जाता है तो उन  व्यक्तियों के उपर ऐसे पैकेज तैयार होने लगते हैं जिसे मरने के बाद फौरन चला्या जा सके.

उसने कहा कि ऐसा करते वक्त पत्रकार उस आदमी को मरने से पहले ही अपनी स्क्रिप्ट में मार देते हैं.

लेकिन अब तो ऐसा लगता है कि पत्रकार किसी को केवल अपनी स्क्रिप्ट में ही नहीं मारता बल्कि उस बिमार आदमी को पब्लिकली भी मार देता है.

ये सब देख कर लगता है कि नामी आदमी न बनने में ही भलाई है. कम से कम जिन्दा रहते हुए कोई मारेगा तो नहीं.

आप क्या सोचता हैं?

शुक्रवार, जनवरी 08, 2010

दिल्ली का ये कैसा गांव है?


“मुनिरका गांव” साउथ दिल्ली के बीचों-बीच का एक ऐसा इलाका जो अब केवल नाम के लिए ही गांव है. यहां कुछ भी गांव जैसा नहीं है.  न लोग और न जगह.



फिर भी इसे गांव ही कहा और लिखा जाता है. सवाला उठता है कि अगर इस इलाके में गांव जैसा कुछ भी नहीं है तो इसे गांव क्यो कह्ते हैं?

इसका एक जवाब जो हर कोई बड़ी आसानी से दे देता है कि इस इलाके से सबसे ज्यादा वोट पड़ते हैं सो कोई भी पार्टी इन कथित गांवो पर हाथ नहीं डालना चाहती और इसे जस का तस बने रहने देती है.

लेकिन क्या यही एक कारण है कि मुनिरका जैसे गांव आज भी दिल्ली के बीच में बने हुए हैं. इस इलाके का अगर कोई सर्व कराया जाए या कोई एक बार इस इलाके में आए तो आसानी से यह बात समझ सकता है कि यहां एक खास जाति वर्ग के दबदबा के कुछ भी गांव जैसा नहीं है.

बल्कि मै तो कहूंगा कि यहां गांव के नाम पर एक अराजकता बनी हुई है. अगर आप इस इलाके में रेंट पर रहते हैं तो आपके कोई औकात नहीं है, कोई इज्जत नहीं है.

आप कभी भी, कहीं भी, हल्की सी बात के लिए सामुहिक तौर पर पीटे जा सकते हैं. यहां यह मतलब नहीं रखता की गलती किसकी है? अगर आपकी गलती हुए तब तो कोई कहना ही नहीं है लेकिन अगर आपकी कोई गलती नहीं भी हुई तो भी आप मार खा सकते हैं और कोई कुछ नहीं बोलेगा, कोई नहीं बचाएगा.

अगर आप में से कुछ लोगों को लगे कि मैं किसी पूर्वाग्रह से ग्रसित हो कर ऐसा लिख और बोल रहा हूं तो मेरा मुनिरका आने का निमंत्रण स्वीकार करें.

आएं और खुद अपनी आखों से देखें दिल्ली के इस गांव के रहन-सहन को और फिर फैसला करें. कोई जल्दे नहीं है.

वैसे भी हम लोग कोई फैसला नहीं कर सकते. फैसला करने वाले तो कहीं और बैठते हैं. उन्हें तो मालुम भी नहीं होगा कि कहां क्या हो रहा है.

आज लिख रहा हूं लेकिन यह सब पिछले तीन साल से देख रहा हूं. मुझे समझ नहीं आता कि क्यों यह आज भी गांव कहा जाता है. मुझे इसका ठीक-ठीक कारण नहीं पता सो मैं कोई जवाब देने की हालत में नहीं हूं.

अगर आपके पास कोई जवाब हो तो जरुर दीजिए.






मंगलवार, दिसंबर 29, 2009

नए साल में एक नई शुरुआत करें!

माननीय,
टीवी के समाचार संपादकों


कुछ ही दिनों में नया साल शुरू होने वाला है. मैं इस मौके पर आपसब के कुशल और खुशहाल जीवन की कामना करता हूं. मैं और मेरे जैसे आपके हजारों दर्शक यही कामना करते हैं. आपके  दर्शक आपसब से बेहद प्यार करते हैं और एक लगाव भी महसूस करते हैं. देखिए, जहां प्यार और लगाव होता है वहीं शिकायतें होती हैं, नाराजगी होती है. यही कारण है कि जब आप अपनी चैनल पर कोई ऐसी-वैसी खबर दिखाते हैं तो हम आप पर बरस पड़ते हैं. आपसे शिकायत करते हैं और अपनी नाराजगी जाहिर करते हैं. ये नारजगी, ये शिकायत केवल इसलिए होती  है कि आप कुछ अच्छा दिखाएं. कुछ अच्छी बात बताएं.


आप ही सोचिए, अगर हमे आपसे मतलब नहीं होता, आपसे कुछ अच्छे की उम्मीद नहीं होती तो हम आपको क्यों देखते? अगर हम नहीं देखते तो आप क्यों कुछ दिखाने के लिए बैठे होते?


पिछ्ले दिनों मैंने कई संपादकों को पढ़ा और सुना है. आप में से कुछ को फेसबुक  पर पढने और जानने का मौका मिला तो कईयों को सभा-संगत में सुनने का मौका मिला. आपको पढ़ कर और सुन कर ऐसा लगा कि आपलोग आलोचना करने वालों को अपना दुश्मन मान कर बैठें हैं. शायद आपको यह लगता है कि कुछ ऐसे लोग हैं जो आपको हमेशा ही गाली देने के लिए तैयार रहते हैं.


लेकिन ऐसा नहीं हैं. हमे अच्छा नहीं लगता जब आप अपने चैनल पर यह दिखाते हैं कि 2012 में दुनिया तबाह हो जाएगी. हमें तब निराशा होती है जब आप खबर दिखाने की जगह "हंसी का फूल डोज" देने लगते हैं.


दुख होता है जब आप शाम के समय यह दिखाते हैं कि किस रियलिटी शो में क्या हो रहा है. हमे झल्लाहट होती है जब आप जल्दी-जल्दी में आरुषी के पिता को उसका खूनी बता देते हैं. हमे घृणा होती है जब कई बार आप पुलिस और प्रशासन के द्वारा कही बात को ही सच मान लेते हैं और उसे हमारे सामने जस का तस पेश करते हैं.


हम चाहते हैं कि आप हमें खबर दिखाएं, कुछ और नहीं.


आपको यह तय करना होगा कि आप क्या करना चाहते हैं और क्या दिखाना चाहते हैं? आपको यह तय करना ही पड़ेगा कि आपके करीब कौन है? आपका दर्शक या टैम की साप्ताहिक रिपोर्ट. जनहित या मार्केट.


अगर आपके करीब आपका दर्शक है तो चलिए इस नए साल के मौके पर आपसब एक प्रण लीजिये कि आप 2010 में खबरें दिखाएंगे और कुछ नही.


अपने दर्शकों से यह वादा कीजिए कि आप टैम के आगे नहीं झुकेंगे बल्कि उस टैम को जिसे आप भी पंसद नहीं करते हैं अपने सामने, अपने दर्शकों के सामने घुटनों के बल बैठने के लिए मजबूर कर देंगे. आपका दर्शक आपके साथ रहेगा.


एक दर्शक.


शनिवार, दिसंबर 26, 2009

मजदूरों की मजदूरी और पुलिस की लाठी

(मुझे यह जानकारी संदीप जी के मेल से मिली. इस खबर को कोई अखबार या टीवी वाला तो दिखाएगा नहीं क्योंकि यहां उनके मालिकों का हित खतरे में है. लेकिन ब्लौग पर तो हम इसे पढ ही सकते है. यहां किसी का कुछ नहीं चलता है.)

करावल नगर के बादाम मज़दूर पिछ्ले कुछ दिनों से मज़दूरी बढ़ाने की मांग को लेकर हड़तालत पर हैं। आज सुबह क़रीब 1500 महिला-पुरुष मज़दूर अपनी मांग के समर्थन में यूनियन के संयोजक आशीष तथा अन्‍य लोगों की अगुवाई में इलाकाई पैमाने का जुलूस निकाल रहे थे। ये मज़दूर प्रति बोरा 40 रुपये की बेहद मामूली दरों पर ठेकेदारों के लिए काम करते हैं। आन्‍दोलन के बढ़ते जनसमर्थन से बौखलाए बादाम ठेकेदारों ने सुबह क़रीब 11:30 बजे अपने गुण्‍डो से जुलूस पर हमला करा दिया। हमले में आशीष, कुणाल और प्रेमप्रकाश बुरी तरह घायल हो गये। ठेकेदारों की बर्बरता से बौखलाए मज़दूरों ने इस पर ज़बर्दस्‍त प्रतिरोध किया।

इस पूरे मामले में करावल नगर पुलिस की भूमिका साफ़तौर पर मज़दूर विरोधी दिखी। पुलिस दिनभर जहां एक ओर मज़दूरों की लिखित नामजद तहरीर पर एफआईआर दर्ज करने का आश्‍वासन देती रही, वहीं शाम 7 बजहे तक ठेकेदार और उनके गुण्‍डो के खिलाफ न तो एफआईआर ही दर्ज हुई और न ही घायल मज़दूरों का मेडिकल मुआयना कराया गया। उल्‍टे पुलिस ने बादाम मज़दूर यूनियन के संयोजक आशीष तथा कुणाल और प्रेमप्रकाश को धारा 107/151 के तहत गिरफ्तार कर लिया।

पुलिस की इस अंधेरगर्दी से पूरे क्षेत्र के मज़दूरों में गुस्‍से की लहर दौड़ गयी। इस पूरे इलाके में क़रीब 25,000 मज़दूर बादाम तोड़ने का काम करते हैं। इन मज़दूरों के ठेकेदार बेहद निरंकुश हैं और क़रीब-क़रीब मुफ्त में मज़दूरों से काम करवाने के आदि हैं। बादाम मज़दूर यूनियन ने गुण्‍डों द्वारा मारपीट और पुलिस की मालिक परस्‍त भूमिका की तीखे शब्‍दों में निंदा की है। यूनियन ने बताया कि कल एक प्रतिनिधिमण्‍डल पुलिस के उच्‍चाधिकारियों से मिलेगा और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग करेगा। युनियन का कहना हैकि यदि उन्‍हें न्‍याय नहीं मिला तो वे आन्‍दोलनात्‍मक रुख अपनाने के लिए तैयार रहेंगे।

अधिक जानकारी के लिए इस नंबर पर संपर्क करें:
अभिनव : 9999379381

गुरुवार, दिसंबर 24, 2009

हम तो आम हैं!!!

(सुबह-सुबह छत पर आराम से बैठकर अखबार पड़ने का मौका नहीं मिलता, सो चलते वक्त बैग में रख लेता हूं और बस में अपनी सीट पर जमने के बाद पढ़ना शुरु करता हूं. आज भी ऐसा ही हुआ. खबरें और लेख देखते वक्त मेरी आखों के सामने दो ऐसी खबरें आईं, जिसे पढने के बाद लगा कि इन खबरों को तो फ्रन्ट पेज पर होना चाहिए था, ये अन्दर की पेज पर क्या कर रही हैं? आइए, आपको उन दोनों खबरों के बारे में बतलाते हैं. )

पहली खबर के मुताबिक, यूपीए की सरकार ने संसद में एक विधेयक पेश किया है. यह विधेयक  मंत्रीयों के रिश्तेदारों और परिजनों को चाहे जितनी संख्या में मुफ्त विमान यात्रा की सुविधा देता है. विधेयक में साफ तौर पर कहा गया है कि मंत्रियों के परिवार के सदस्य और उनके संबंधी उनकी सरकारी विमान यात्रा में उनके साथ चाहे जितनी संख्या में जा सकते हैं. सबसे मजे की बात तो यह हुई कि यह विधेयक संसद के दोनों सदनों में बगैर बहस के पास हो गया.

दूसरी खबर देश की राजधानी दिल्ली से है. शीला सरकार ने अपने सभी छ मंत्रियों के लिए आलीशान बंगले बनवाने की परियोजना बनाई है. इस परियोजना पर करीब सवा दस करोड़ रुपए खर्च आने का अनुमान है. दिल्ली सरकार चाहती है कि बंगले अगामी पंद्रह महीनों में बन कर तैयार हो जांए.



 मैं इन ख़बरों को पढ़ने के बाद कुछ कहने की हालत में नहीं हूँ........आपका मुझे नहीं मालुम!! 

रविवार, दिसंबर 13, 2009

सुनो तो मेरी भी


हे मर्द, तुमने क्या कहा?

ज़रा दुहराना तो

तुमने कहा- हम औरतें, कोमल हैं,

कमज़ोर हैं!

लाचार हैं साथ तुम्हारे चलने को,

हमारा कोई अस्तित्व नहीं है

बगैर तुम्हारे!


तुम्हारी इन बातों पर,

बचकानी सोच पर,

जी करता है खूब हँसू…….!


सोचती हूँ, कैसे बोलते हो तुम ये सब?

कहीं तुम्हे घमण्ड तो नही

अपनी इस लम्बी कद-काठी का,

चौड़ी छाती का जहाँ कुछ बाल उग आए हैं….!


सच में, अगर घमण्ड है तुम्हें

इन बातो का तो ज़रा सुनो मेरी भी-

तुम मर्दो का आज अस्तित्व है

क्योंकि

किसी औरत ने पाला है

तुम्हे नौ महीने अपने पेट मे !


लम्बी कद-काठी है

क्योंकि

तुम्हारी कुशलता के लिए

प्रयासरत रही है

कोई औरत हमेशा !


छाती चौडी है

क्योंकि

पिलाई है किसी औरत तुम्हे छाती अपनी !


अब सोचो,

फिर बोलो,

कौन लाचार है ?

किसका अस्तित्व नहीं, किसके बगैर?


शुक्रवार, दिसंबर 11, 2009

ठण्ड की काली रात में......

ठण्ड की काली रात में......
कांपती हुई,
सिकुड़ी हुई है.
तंग कपड़ों में लिपटी,
सड़क किनारे लुढ़्की हुई है.
 
गोद में समेटे बच्चे को,
शीतलहर से लड़ रही है.
लड़ते-लड़्ते हांफ रही है,
और सांसों की खुलती गठरी को बांध रही है.
ठण्ड की काली रात में......

अपनी जिन्दगी जी चुकी है,
ऐसी अनगिनत काली और ठण्डी रातें,
सड़क किनारे, स्ट्रीट लाईट में काट चुकी है.

अब, और जीने की चाह नहीं है लेकिन जिन्दा है,
अपने बच्चे की खातिर, जो उससे गर्मी ले रहा है,
और चैन से सो रहा है.
इस ठण्ड की काली रात में....

बुधवार, नवंबर 25, 2009

गंभीर विषय और NDTV

23 दिसंबर की रात के करीब 10 बज रहे होंगे जब मैं अपने एक दोस्त के रूम पर टीवी देख रहा था. उस वक्त हर न्युज चैनल अपने-अपने अंदाज में एक साल पहले की उस घटना को याद कर रहा था जिसने समूचे देश को स्तब्ध कर दिया था, मुम्बई की तेज रफ्तार जिन्दगी को रेंगने पर मजबूर कर दिया था. 


हर चैनल पर मुम्बई हमले के बारे में स्टोरी चल रही थी, ये साफ दिख रहा था कि चैनलों ने इस कार्यक्रम को बनाने में खूब मेहनत की थी, खूब काम किया था. एक चैनल ने तो इस गंभीर विषय पर बने अपने कार्यक्रम को पूरा-पूरा नाटकीय रुप दे दिया था.


अपने को और चैनलों से अलग बताने वाले इस खबरिया चैनल पर एक फिल्मी स्टार कार्यक्रम का संचालन अपने फिल्मी स्टाइल में कर रहा था.


मुझे इस बात से आपत्ति है कि इस कार्यक्रम को एक नाटक वाले स्टाईल में क्यों पेश किया गया? क्या मुम्बई पर हुए हमले को दिखाने का इससे बेहतर तरीका नहीं हो सकता था? आखिर क्या वजह थी कि NDTV जैसे चैनल को इस गंभीर विषय पर बने कार्यक्रम को दिखाने के लिए एक एक्टर की मदद लेनी पड़ी? कार्यक्रम को नाटकिय अंदाज में दिखाना पड़ा?

आज हिन्दी के ज्यादातर खबरिया चैनल हर कार्यक्रम को इसी अंदाज में लोगों के सामने रखते हैं और खूब कमाई कर रहे हैं लेकिन इस चैनल की एक अपनी छवि है लोगों के बीच. चैनल यह क्यों नहीं समझ पा रहा है कि उसके दर्शक खबर को खबर के रुप में ही देखना चाहते हैं. अगर NDTV भी दूसरे चैनलों की राह पर चलने लगेगा तो इससे किसी का भी भला नहीं होगा. न तो चैनल का भला होगा और न ही उसके दर्शकों का.


शनिवार, नवंबर 21, 2009

ऐसा होगा शिव सैनिकों का राज.....!!!!

कल, बाल ठाकरे के गुंडों ने मुम्बई के एक टीवी चैनल के दफ्तर में मार-पीट और तोड़-फोड़ की. इस घटना के बाद सेना के एक प्रवक्ता ने गर्व के साथ स्वीकार किया कि हमला “शिव सैनिको” ने किया है.
मुझे लगता है कि, इस घटना के बाद मुम्बई वासियों को चेत जाना चाहिए और इन जैसे अतिवादियों का सामुहिक बहिष्कार करना चाहिए, इन्हें वोट नहीं देना चाहिए

इस दुष्कर्म ने दिखा दिया है कि ये लोग मुम्बई में किस तरह का शासन चाहते हैं. ये लोग मुम्बई समेत सारे महाराष्ट्र में तालिबानी शासन चाहते हैं, जहां हर कोई इनकी हां में हां मिलाए, इनका गुणगान करे और पूजा करे. ये ऐसा शासन चाहते हैं जिसमे इनके विरोधियों के लिए कोई जगह न हो. अत: अब मुम्बई के लोगों, मतदाताओं को तय करना होगा कि वो अपने लिए, अपने बच्चों के लिए कैसी व्यवस्था चाहते हैं?

शुक्रवार, नवंबर 20, 2009

चैनल के साथ जनता का समर्थन है.



(इन दिनों हर कोई इन्डिया टीवी के पीछे पड़ा है, कोई खराब कंटेंट का नाम लेकर इस चैनल को गाली दे रहा है तो कोई खबर की प्रस्तुति को लेकर सवाल उठा रहा है. किसी को परेशानी है कि चैनल प्राइम टाइम पर भूतों की कहानी दिखा रहा है तो कुछ लोग कहते फिर रहें हैं कि यह चैनल तो देखने लायक ही नहीं है, बेकार है.
तो ऐसे में, इंडिया टीवी के एक दर्शक ने सभी संपादकों और टीवी आलोचकों के नाम एक शिकायती पत्र लिखा है जिसे जैसा का तैसा नीचे प्रकाशित किया जा रहा है.)
प्रिय संपादकों,
तमाम पोर्टल और अखबार
मैं इंडिया टीवी का एक जागरुक दर्शक हूं, और ऐसा कम ही होता है जब मेरी आंखे टीवी से मतलब इडिया टीवी से हटती हैं, और इधर-उधर मतलब दूसरे ख़बरिया चैनल या किसी पोर्टल की तरफ देखती हैं. मैं इंडिया टीवी के अलावा न तो किसी को देखना पंसद करता हूं और न ही सुनना.
 अब आप सोच रहे होंगे कि मैं यह पत्र आपसब को क्यों और कैसे लिख रहा हूं? साहब, आपको यह मालूम होना चाहिए कि आजतक मैंने रजत जी के अलावा दूसरे किसी भी संपादक को कोई खत नहीं लिखा. लेकिन इस बार लिखना पड़ रहा है.

गुरुवार, नवंबर 12, 2009

अपना गांव अच्छा नहीं लगा.


अभी एक-दो दिन पहले ही अपने गांव से लौटा हूं, इस बार मेरा गांव प्रवास करीब-करीब बीस दिनों का था सो मेरे पास कुछ ज्यादा टाइम था, अपने उस गांव को देखने-समझने का जहां मैं पैदा हुआ, जवान हुआ. पहले अपना गांव अच्छा लगता था, वहां के लोग और उनकी बातें सुहाती थी. वो जैसे भी थे, अच्छे थे.

वो सारे लोग मुझे अबकी बार अच्छे नहीं लगे, वो इसलिए कि आज भी मेरे गांव का भूमिहार चाहता है कि चमार, डोम, मुसहर उसे नीचे तक झुक कर सलाम ठोके, गाली सुनकर भी उन्हें (भूमिहारों को) मालिक कहे, भूखा रहकर भी उनकी बेगारी करे.

मंगलवार, नवंबर 10, 2009

कुछ भी अचानक नहीं हुआ…….!!



कल जो कुछ महाराष्ट्र में हुआ वो अचानक नहीं हुआ, इसकी रुपरेखा बहुत पहले तैयार हो चुकी थी.
बहुत पहले से मानसे के मुखिया राज ठाकरे ने इस बारे में चेतावनी देनी शुरू कर दी थी लेकिन हम सचेत नहीं हुए. मानसे वालों ने पहले हमे सड़क पर पीटा, मां-बहन की, नंगा किया और उसके बल पर विधानसभा में दाखिल हुए और कल वहां भी हमे पीट गए. हम तब भी चुप थे और आज भी चुप ही रहेंगे क्योंकि हमारी केन्द्र की सरकार उस वक्त भी शांत थी और आज भी खामोश है.


जब हमे सड़क से उठा-उठाकर पीटा जा रहा था, गाली दी जा रही थी, मुम्बई से भागने को बोला जा रहा था तब क्यों नहीं इन गुन्डा टाईप लोगों को रोका गया? क्यों हम पीटते रहे और सरकारें चुप बैठी रहीं? क्यों किसी को भी उस वक्त, आज का अन्देशा नहीं हुआ? क्यों किसी ने भी उस वक्त राज को रोकने की जरुरत महसूस नहीं की?

लोग पीट रहे थे, मीडिया तस्वीर दिखाने में लगा हुआ था. नेता अपनी-अपनी राजनीति कर रहे थे और राज ठाकरे दिनों-दिन मजबूत हो रहे थे. राज ने यह सब बहुत पहले ही सोच लिया था.

इस पूरे मसले पर कांग्रेस की चुपी ने दिखा दिया है कि राजनितिज्ञ अपने फायदे के लिए कुछ भी कर सकते हैं. किसी भी हद तक गिर सकते हैं. बड़ी से बड़ी घटना पर भी मौन रह सकते हैं, और किसी छोटी से छोटी बात पर भी बेवजह की उछल-कूद मचा सकते हैं.

हो सकता है कि कुछ लोगों को यह लगे कि कल की घटना के बाद कुछ बदलेगा लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं होने वाला. सब कुछ वैसा का वैसा ही रहेगा क्योंकि यहां हर कोई बिका हुआ है, हम और आप भी.


मंगलवार, अक्टूबर 20, 2009

छठ पूजा की हार्दिक शुभकामनाएं.......!!!


आज ही अखबार में पढ़ा रहा था कि पूरब की तरफ जाने वाली ट्रेनों में रेलमपेल की स्थिति है, क्योंकि छठ पूजा में सब बिहारी अपने घर जाना चाहते हैं.

तो साथियों, आपका ये बिहारी भी आज अपने गांव जा रहा है. छठ पूजा के बाद आपसब से मुलाक़ात होगी. चलते-चलते, आप सब ब्लौगर दोस्तों को छठ पूजा की हार्दिक शुभकामनाएं.......!!!

जब लौट कर आउंगा, तो आपको  बतालाउना कि जाने के लिए ट्रेन टिकट का जुगार कैसे हुआ ?
अभी तो बस निकलने की जल्दी है, सो चलता हूँ.