सोमवार, नवंबर 07, 2011

यात्रा के निहितार्थ...

आगामी चौबीस नवबंर को नीतिश कुमार के नेतृत्व वाली मौजूदा राज्य सरकार के कार्यकाल का एक साल पूरा हो जाएगा. लेकिन सरकार द्वारा एक साल पूरा किए जाने की चर्चा कहीं नहीं दिखेगी. क्योंकि इसी माह की नौ तारीख को नीतिश बाबू “सेवा यात्रा” पे निकल रहे हैं. जाहिर सी बात है कि जब मुख्यमंत्री राज्य के दौड़े पे है  तो मीडिया उस यात्रा को ही कवर करने में अपना ज्यादा समय और पन्ना खर्चेगा. यात्रा को छोड़ के कौन इस तरफ ध्यान देना चाहेगा कि बीते एक साल में मौजूदा सरकार ने राज्य की जनता के लिए क्या-क्या किया? कौन-कौन से निवेश इस एक साल में राज्य की जमीन पे उतड़े.?  आमजन को प्रभावित करने वाले कौन-कौन से फैसले सरकार ने लिए? नीतिश के सुशासन राज्य में जो बियाडा जमीन घोटाले की बात सामने आई उस केस में क्या प्रगति हुई? फारबिसगंज में जो गोली चली और जो पुलिसिया तांडव हुआ उसके लिए चार माह बाद  भी किसी को अभी तक सजा क्यों नहीं मिली?

इसमे कोई शक नहीं कि नीतिश ने राज्य के पिछले आरजेडी शासन से बेहतर शासन व्यवस्था स्थापित करने की कोशिश की है और कुछ मामलों में इनकी सरकार ने सफलता भी हासिल की है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं हुआ कि नीतिश सर्वेसर्वा हो गए. और इनकी सरकार में कोई खामी या कमी है ही नहीं. राज्य की मीडिया द्वारा अभी तो सरकार की कमियों को छुपाया जा रहा है लेकिन यह स्थिति ज्यादा दिनों तक नहीं रह सकती है. यह बात नीतिश कुमार और उनके सहयोगियों को समझ लेनी चाहिए. 

खैर, अभी नवबंर का महीना है और जैसा कि मैंने उपर ही कहा कि इस महीने मीडिया में ज्यादातर बातें नीतिश कुमार की “सेवा यात्रा” की ही होंगी तो क्यों न हम भी यहां “सेवा यात्रा” और इसी के साथ शुरु हो रहीं  कुछ दूसरी यात्राओं तक अपना फोकस रखें. जी हां…इस महीने नीतिश ही अकेले यात्रा पे नहीं होंगे. राज्य की राजनीति में अपने लिए जगह की तलाश में गांव-गांव घुमने लालू यादव भी निकलेंगे और सबसे मजेदार बात- नीतिश सरकार की सहयोगी पार्टी बीजेपी के राज्य अध्यक्ष डॉ. सी.पी.ठाकुर  भी भ्रष्टाचार के खिलाफ अलख जगाने की चाहत लिए पूरे राज्य की यात्रा पर संभवत: इसी महीने में निकलेंगे. सी.पी. ठाकुर अपने यात्रा की शुरूआत कहां से करेंगे और किस तारीख को करेंगे इसकी घोषणा तो अभी नहीं हुई है लेकिन इतना तय मानिए कि इनकी यात्रा नीतिश  की “सेवा यात्रा”  के कुछेक दिन आगे ही शुरू होगी.

जिस दिन नीतिश अपनी “सेवा यात्रा” पश्चिम चंपरण से शुरु करेंगे ठीक उसी दिन आरजेडी सुप्रिमो लालू यादव गया से अपनी यात्रा ’गांव-गांव” के लिए रवाना होगें. नीतिश अपनी यात्रा में गांव-गवई का औचक निरिक्षण करेंगे (निरिक्षण कितना औचक होगा इसका तो उपर वाला ही  मालिक है) और देहातों में चल रही योजनाओं के बारे में जानकारी लेंगे. ऐसा दावा है मुख्यमंत्री के दफतर का. लेकिन कौन बुद्दू नहीं जानता कि इन यात्राओं का मतलब होता है लोगों के साथ सरकारी खर्चे पे जनसंपर्क. जिसका फायदा यात्रा करने वाले को अगामी चुनाव में मिलना तय माना जाता  है.

नीतिश की यात्रा के लिए पूरा सरकारी अमला है तो दूसरी तरफ लालू के लिए केवल उनके कार्यकर्ता जिनकी संख्या भी अब काफी कम हो गई है. नीतिश के लिए अपनी यात्रा में बोलने के लिए काफी कुछ है. पता नहीं लालू अपनी यात्रा में राज्य की जनता से क्या कह रहे हैं. क्योंकि फिलहाल ज्यादातर मौकों पर वो खूद बोलते-बोलते भुल जाते हैं कि क्या कह रहे थे और आगे क्या कहना है. तब उनके अगल-बगल में बैठे लोग धीरे से उनके कान में फूंक मारते और फिर लालू बोलने लगते. लेकिन नीतिश के साथ ऐसा नहीं है. वो किसी भी मंच पे बोलने के मामले में रत्ति भर भी नहीं चुकते. खूब बोलते हैं और चबा-चबा के बोलते हैं. यह नीतिश की वाकपटुता ही है कि उनके द्वारा राज्य में विकास के नाम पे कुछ सड़के ही मोटे तौड़ पे देखती हैं लेकिन वो सारी वाहवाही अपने नाम किए जा रहे हैं.

जैसा की लेख के शुरू में ही बताया गया कि नीतिश और लालू की यात्राओं के साथ एक यात्रा सी.पी. ठाकुर की भी है. बीजेपी की इस यात्रा का मतलब साफ है कि वो अब नीतिश को अकेले सारी वाह-वाही लेने देने के मूड में नहीं है. भगवा पार्टी पहले ही इस बात से खफा है कि नीतिश की पार्टी राज्य में हो रहे ज्यादातर विकास का लाभ लपक ले रही है और बीजेपी सहयोगी और प्रमुख पार्टी होने के बाद भी मुह ताकती रह जा रही है. कुछ हलकों में तो बीजेपी की इस यात्रा को आगामी लोकसभा के चुनाव में जेडीयू और बीजेपी में होने वाले लगवा की तैयारी से भी जोड़ के देखा जा रहा है. तैयारी हो भी क्यों न. राजनीति में कोई भी रिश्ता पर्मानेंट थोड़े न होता है. लेकिन बीजेपी द्वारा घोषित यह यात्रा हड़बड़ी में घोषित यात्रा लगती है. किसी दूसरी यात्रा के बारे में सोंचना चाहिए था. अभी-अभी तो आडवाणी अपनी भ्रष्टाचार विरोधी यात्रा लेकर बिहार से गुजरे हैं तो फिर  से एक भ्रष्टाचार विरोधी यात्रा. फंडा कुछ जम नहीं रहा.

मतलब अगर दो टूक शब्दों में कहें तो नवंबर का महीना यात्रामय होगा लेकिन तीनों की तीनों यात्राएं करने वालों से राज्य की जनता को कुछ खास मिलेगा नहीं. क्योंकि तीनो यात्री इन यात्राओं से कुछ न कुछ पाने की आस लिए निकल रहे हैं. हां…नीतीश की यात्रा से राज्य की जनता का कुछ पैसा बरसात की पानी के तरह जरुर बह जाएगा.  नीतीश राज्य में बने रहने के लिए यात्रा पर हैं. लालू यात्रा के माध्यम से राज्य की सत्ता में लौटने का प्रवेश द्वार खोज रहे हैं और डॉ. ठाकुर अपनी यात्रा से नीतिश और जेडीयू को  एक प्राईवेट मैसेज  चाहते हैं कि अब बस.

शुक्रवार, अक्टूबर 21, 2011

खोज...


ये आखें, मेरी सांसे-

शहर की भीड़ में,
चौक की चाय दूकान में
गांव की आरमियत में,
खेत-खलिहान में,
मेले  और रेले में,
राजनितिक या सामजिक सेमिनार में,
हर सभा और संगत में,
तुम्हे खोजती हैं.

महसूस तो करता हूं, तुम्हे. लेकिन दिखती नहीं हो, कहीं.
क्यों भला?

शुक्रवार, अक्टूबर 14, 2011

सिविल सोसाईटी सदस्य: ये क्या हो रहा है?


टीम अन्ना के एक प्रमुख सदस्य हैं, प्रशांत भूषण. इन्हें देश के एक वरिष्ठ वकील के तौर पे भी जाना जाता है. कुछेक दिन पहले प्रशांत ने कश्मीर समस्या के उपर अपनी राय दी. प्रशांत ने जो कहा उसे यहां दुहराने की जरुरत नही है लेकिन उस प्रतिक्रिया के बाद प्रशांत भूषण के साथ जो व्यवहार किया गया उसकी निंदा होनी चाहिए. आरोपियों को पकड़ा जाना चाहिए और उन्हें समझाया जाना चाहिए कि इस देश में हर किसी को बोलने का अधिकार है, अपनी बात रखने का अधिकार है लेकिन किसी के साथ मार-पिटाई करने की छुट किसी को भी नही है.

खैर, इस धटना के बाद टीम अन्ना के दूसरे सदस्य जिस तरह से प्रशांत भूषण से किनारा कर रहे हैं. अन्ना हजारे जो बयान दे रहे हैं वो उस दुखद घटना से भी ज्यादा पीड़ादायक है. और इस तरह के बयान से यह भी साफ हो रहा  है कि टीम अन्ना के लिए इस देश में केवल एक समस्या है, भ्रष्टाचार. जबकि ऐसा कतई नहीं है. भ्रष्टाचार इस देश के लिए एक बड़ी समस्या है. इसमें कोई शक नही. कोई अपत्ति नही.

लेकिन इसके अलावा भी बहुत बड़ी-बड़ी सममस्याएं हैं इस देश में. जैसे- कश्मीर समस्या, नक्सल समस्या, गरीब-मजदूरों की समस्या और पूर्वोत्तर राज्यों की समस्या. क्या इन समस्याओं पे बात नही होनी चाहिए?

पिछले कुछ दिनों में अन्ना हजारे और उनके साथी सिविल सोसाईटी के नेता और प्रवक्ता के रूप में सामने आए हैं. अपने-आप को सिविल सोसाईटी के रूप में देश के सामने पेश किया है. देश के एक बड़े वर्ग का समर्थन भी मिला. फिर क्या दिक्कत है? क्या यह माना जाए कि अन्ना को जो समर्थन मिला था वो केवल जनलोकपाल के मुद्दे पे मिला था?

इसमे कोई शक नही कि प्रशांत जैसे  बयान के बाद टीम अन्ना को मिला कथित विशाल जन समर्थन एक पल में हवा हो जाएगा. प्रशांत क्यों, स्वयं अन्ना ही कश्मीर या पूर्वोत्तर के बारे में एसे बयान देते जो कि जायज है और व्यवहारिक भी है तो उनके साथ भी ऐसी घटनाएं घट सकती हैं. लेकिन इस डर से चुप रहना भी तो जायज नहीं है. भ्रष्टाचार के आलावे जो गंभीर समस्याएं हैं इस देश में और उन प्रॉबलेम्स से जुझ रहे लोग भी तो सिविल सोसाईटी का ही हिस्सा हैं.

 उनके लिए भी तो अन्ना को हुंकाराना चाहिए. किरण वेदी को तिरंगा लहराना चाहिए, अरविंद केजरिवाल को हर टीवी शो में जा कर अपनी बात रखनी चाहिए और प्रशांत भूषण और उनके पिता को कानूनी किताबों में आंख गड़ाना चाहिए. लेकिन ऐसा करने के बदले टीम अन्ना के दूसरे सद्स्य प्रशांत के बयान को उनका निजी बयान बता के खूद को इस घटाना से अलग करने की मुहिम में लगे हुए हैं. आज तो अन्ना ने भी टीवी पे बयान दिया कि  बयान प्रशांत के निजी विचार थे. कोई नहीं कह रहा कि प्रशांत द्वारा दिया गया बयान टीम अन्ना का सामुहिक ब्यान था.

लेकिन सवाल यह है कि प्रशांत ने कश्मीर मुद्दे पे जो बयान दिया वो सही था या गलत. अगर सही कहा तो अन्ना और उनके दूसरे साथियों को प्रशांत के साथ खड़े रहना चाहिए और अगर गलत कहा या ऐसा कुछ कहा जिससे टीम अन्ना या अन्ना हजारे सहमत नही हैं तो अन्ना को मीडिया के माध्यम से देश को बताना चाहिए कि वो कश्मीर मुद्दे पे क्या राय रखते हैं?  जैसे टीम के एक सद्स्य कुमार विश्वास ने देश को साफ-साफ बताया कि प्रशांत ने कश्मीर पे जो बयान दिया है उससे वो सहमत नही हैं. वो इस मसले पे अलग राय रखते हैं. वैसे, कुमार के इस बयान का कोई खास  महत्व नहीं है. क्योंकि जो लोग भी कुमार के कवि संमेलन में बैठे होंगे वो उनकी इस राय से पहले से ही परिचित होंगे और कुमार का कद अन्ना, किरण और अरविन्द की तुलना में बहुत बौना है.

कहने का मतलब कि टीम के नेता अन्ना हजारे. सदस्य, किरण वेदी और अरविंद केजरिवाल को भी कुमार विश्वास की तरह साफ-साफ लहजे में बात करनी चाहिए.

अगर सिविल सोसाईटी के लोग भी नेताओं की तरह घुमा-फिरा के या छुपा-छपा के बतियान करेंगे तो कैसे चलेगा. उन्हें तो हर मुद्दे पर साफ-साफ बोलना चाहिए जैसे वो रामलीला मैदान से बोल रहे थे और उसी तेवर के साथ जो तिहार के बाहर दिखा था.

बुधवार, सितंबर 14, 2011

विकास में बहते घर-परिवार.

(यह फोटो -फिचर तहलका के बिहार-झारखंड संस्करण में प्रकाशित हो चुका है.  यहां फिचर के साथ उन तस्वीरों को नही लगाया जा रहा है जो पत्रिका में छप चुकी हैं)
ऐसा विकास किस काम का जिससे कुछ के लिए तो रास्ते सरल और सुगम हो जाएं तो बदले में कई हजार लोगों के सामने जीवन का संकट खड़ा हो जाए. कोसी नदी पर बन रहे महासेतू की वजह से इलाके के 48 गांव में बसने वाली आबादी पर आज ऐसा ही एक संकट बना हुआ है. छोटे से लेख और कुछ तस्वीरों से उस परेशानी दिखाने की एक कोशिश:


 देहाती मोटर चालित नाव से करीब-करीब तीन घंटे तक कोसी की तेज और पगलाई धाराओं से लड़ने के बाद जिस पहले गांव तक पहूंचना संभव हो सका वह है-लगुनिया. नाव से उतरते ही गांव के सबसे पहले घर को देखने पे लगा कि यहां हाल में ही किसी की शादी हुई है. क्योंकि  टाट के छत वाले इस उजड़ रहे घर की मिट्टी पुती दिवार पे गहरे रंग से बड़े-बड़े शब्दों में “शुभ विवाह” लिखे दिख रहे हैं.

 पुछने पर मालुम हुआ कि इस घर के रहनियार भागवत मेहता के बड़े बेटे की शादी चार माह पहले ही हुई है. और दिवार पर यह कलाकारी गांव-घर की लड़कियों ने बनाई थी. आने वाली नई दुलहान  के स्वागत में.

 पहली नजर में ही मालुम चल जाता है कि भागवत मेहता ने जीवन जीने के सारे जरुरी सामान यहां से हटा लिए हैं  और फिलहाल जो थोड़ा-बहुत सामान यहां  पसरा है वो बहुत जरुरी का नहीं है. इसी गांव के एक बुजुर्ग रामेश्वर मेहता बताते हैं कि गांव के दूसरे लोगों की तरह ही भागवत ने  भी कोसी में हो रहे कटाव की वजह से अपने परिवार को तटबंध से बाहर बसाने का फैसला लिया है.

 लगुनिया, इलाके के दूसरे 48 गांव की तरह  ही वर्षो से कोसी तटबंध के बीच  से बसा हुआ था. लेकिन फिलहाल  तीन सौ से चार सौ घर वाले इस गांव में हर  तरफ खाली पड़े टाट-मरई के घर किसी कंकाल की तरह खड़े मालुम पड़ते हैं. पिछले कुछ माह तक आबाद और गुलजार रहने वाले इस  गांव में चारो तरफ शमशान घाट में पसरी रहने वाली चुप्पी ने अपना डेरा डाला हुआ है.   गांव में  कोई औरत नहीं दिख रही. बस एक-दो टुटे पड़े, उदास मिट्टी के चुल्हे और किसी-किसी घर के बाहर बेमन से खड़े हैन्ड पंप दिखाई पड़ते हैं.

 पलायन का यह चक्र केवल इसी गांव में नहीं चल रहा है बल्कि कोसी तटबंध के बीच बसे 48 गांव में ऐसी ही हलचल मची है. क्योंकि विकास के नाम पे निर्मली प्रखंड के सनपतहा के पास कोसी नदी के पूर्वी और पश्चिमी तटबंध के बीच 1.85 किमी लंबा सड़क पुल और इसके समानांतर 60 मीटर द्क्षिण में इतनी ही लंबाई का रेल पुल बनाया जा रहा है. बाकी बची दूरी को पाटने के लिए तटबंध के दोनों छोरों के बीच एक धनुषाकार एफलक्स व सुरक्षा बांध बनाया जा रहा है ताकि 12 -15 किलोमिटर में बहने वाली कोसी नदी को लगभग दो किलोमीटर के दायरे में बांध के बहाया जा सके. सीधा सा गणीत है कि जब 12-15 किमी के बड़े इलाके में बहने वाली नदी को  2 किलोमिटर के दायरे में समेट के बहाने की कोशिश होगी तो इस दायरे में आने वाले सारे खेत-खलिहान और गांव-जवार तो पानी में समा ही जाएंगे.

 इतनी छोटी सी बात जो कि कोसी इलाके के हर आदमी की समझ में रसबस रहा है वही बात इतने बड़े पुल के निर्माण में लगे बड़े-बड़े अभियंताओं और देश के रहनुमाओं की समझ से क्यों बाहर है, यह  समझ से बाहर है. लेकिन इनकी नासमझी की वजह से कई हज़ार लोगों की जान पर आफत के बदल मडरा रहे हैं . जिसकी चिन्ता पटना से दिल्ली तक किसी को नहीं है.
आसमान में बादलों की ऐसी चित्रकारी देखकर कोई कवि प्रेम की बेहतरीन कविता लिख सकता है. शायर, शायरी कह सकता है लेकिन कोसी के इलाके के लिए यह बादल और इनका यह काला रूप रोमांचित करने वाला नहीं है. हर एक बारिश के बाद नदी के बहाव में एकाएक तेजी आ जाती है और कटाव भी तेजी से होने लगता है. उजड़ चुके घर-दुआर पे जो थोड़े-बहुत  सामान पड़े होते हैं वो भी भीग जाते हैं. 
कोसी नदी में  पानी बढ़ने की वजह से यह  मछुआरा मछली नहीं पकड़ पा रहा है. क्योंकि इसके पास इतने बड़े जाले नहीं हैं जो ज्यादा पानी में से भी मछलियों को पकड़ सकें. बैठे-बैठे थकने के बाद अपनी नाव को ही बिस्तरा बना लिया इस इलाकाई मछुआरे ने.



जीतवन देवता की मुर्ती तो कोसी की तेज धार में बह गई लेकिन उनके पांव रह गए. तटबंध के अंदर बसे सिंहपुर गांव में हर साल आसिन (अंग्रेजी कैलेंडर से अक्टूबर) के महीने में, जीतीया वर्त के मौके पर इस मूर्ति के पास एक बड़ा मेला लगता था. (बिहार के ज्यादातर इलाकों की औरतें जीतीया का वर्त रखती हैं. इस अवसर पर माएं एक दिन का अखंड उपवास रखती है और जीतवन देवता की पूजा करती हैं. मान्यता है कि इस वर्त को करने वाली महिलाओं के बच्चों की अयू लंबी होती है.)



खाते-पीते परिवारों ने बहुत पहले ही यह इलाका छोड़ दिया और आसपास के शहरों में बस गए. यहां अभी वही रह गए हैं जिनके सामने न उपजाएं तो  खाएं क्या, का संकट है. भोला, ने भी अपने परिवार को तटबंध के बाहर कर दिया है लेकिन वो वहां केवल रात के वक्त सोने के लिए जाते हैं. माल-मवेशियों को तो उन्होंने औने-पौने दाम में बेच दिया लेकिन समझ नहीं पा रहे  कि खेत में लगी धान की फसल का क्या करें? 






कुछ महीने पहले ही हुए विवाह का निशान लिए खड़ा, सुनसान घर. इलाके के ज्यादातर गांव के  कई घर अब इसी अवस्था में खड़े हैं. क्योंकि इन घरों में रहने वालों को दुसरी जगह पर अपना ठीकाना बनाना पड़ रहा है. विकास के नाम पे नदी के साथ लगातार एक बेपरवाह छेड़छेड़ा किया जा रहा है और इस वजह से यहां के बासिंदो को विस्थापन का शिकार होना पड़ रहा है.



जहां भक्त वहीं भगवान का बेसेरा. तटबंध के बीच से निकले परिवारों ने सुपौल जिले के सरायगढ़-भपटियाही के पास राष्ट्रीय राजमार्ग (57) के किनारे-किनारे बस गए. एनचस के बीच में बने डाईवर्जन पर ही इनलोगों ने संकटमोचन कहे जाने वाले हनुमान जी को स्थापित कर दिया है. मतलब भगवान ने अपने भक्तों को उजड़ने से तो नहीं बचाया लेकिन भक्तों ने अपने भगवान जी के लिए इस संकट में भी जगह तलाश ली.

गुरुवार, अगस्त 25, 2011

भ्रष्टाचार से मेरे सरोकर हैं और मेरी अपनी लड़ाई भी!

 (यह कोई क्रांतिकारी कदम-वदम नहीं है. एक अदने आदमी द्वारा अपने उपर लगाए गए गंभीर आरोप का जवाब भर है. मुझे खेद है. हां, मुझे बेहद अफसोस है कि लगातार पांच साल तक एक दोस्त की तरह साथ रहने के बाद भी आपको यह लगा कि मेरा भ्रष्टाचार से कोई सरोकर नहीं है. जब मैंने आपसे कहा कि मैं "अन्ना" की इज्जत करता हूं लेकिन....तो आपने कहा कि मैं कॉग्रेस के नेताओं की तरह बोल रहा हूं. नीचे लिखा राइटअप  उन्हीं आरोपों से मुक्ति पाने के लिए लिखा गया है या फिर यह लेखन वह भड़ास है जिसकी वजह से पूरी रात सुबह होने का इन्तज़ार रहा.)


प्रिय मित्र
आपका दावा है कि आप मुझे जानते हैं लेकिन जिस तरह से आपने मेरे उपर आरोप लगाएं हैं उससे यह साफ होता है कि आप मुझे यानि विकास कुमार के बारे में बिल्कुल भी नहीं जानते. आपकी शिकायत है कि मैं उनलोगों में शामिल हूं जो भ्रष्टाचार के मुद्दे पे अपना स्टैंड साफ नहीं कर रहे हैं और बीच में खड़े रख कर देखना चाहते हैं. आपने इतना तक कहा कि मैं ऐसा इस वजह से कर रहा हूं कि मुझे भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे से कोई फर्क नहीं पड़ रहा है. आपके मुताबिक, मैं हर छोटी-बड़ी बात पे अपना स्टैंड रखता हूं. अपनी बात साफ करता हूं. और खुल के बोलता हूं. आपने सही कहा. मुझे बेलाग-लपेट बोलना पंसंद है. बोलते समय मैं इस बात की फिक्र नहीं करता कि सामने वाला मुझे, मेरी बात से कैसे आंक रहा है?

हिन्दू-मुस्लिम समस्या के बारे में, दबे-कुचलों के बारे में, आरक्षण के बारे में और किसी भी मुद्दे पर जिस तरह से अपने दोस्तों के बीच बात करता हूं उसी तरह अपने और वही बातें अपने पापा से भी करता हूं. कई बार ऐसा हुआ है कि इस तरह के मुद्दे पर पापा से बात करते हुए हमारे बीच लड़ाई जैसी स्थिति बन जाती है. वो बाप बन के चिल्लाने लगते हैं और मैं अपने बात पे डटा रहता हूं और आखिर तक अपनी बात के साथ ही रहता हूं. (यह बातें मैं इसलिए नहीं कह रहा हूं कि यह कोई बड़ी घटना है कि या आगे जो बातें कहूंगा वो इस मकसद से नहीं कि मुझे हिरो बनना है या मेरे अंदर कोई हिरो है. यह बातें कहना इसलिए  जरुरी हो गईं हैं क्योंकि मुझ पर, मेरे एक बहुत ही करीबी दोस्त ने भ्रष्टाचार पर इसलिए चुप रहने का अरोप लगाया है कि मुझे इससे कोई फर्क नहीं पढ़ता.) भ्रष्टाचार और घुसखोरी पर भी हमारे(मेरे और मेरे पापा ) बीच कई बार बात हुई है. लेकिन यहां मैं अपने-आप को उनके सामने ज्यादा देर तक नहीं टिका पाता. कारण आगे बताता हूं.

 लेकिन उससे पहले कुछ और बताना चाहता हूं आपको- मैंने दिल्ली में पांच साल बिताए. पत्रकारिता की पढ़ाई की, तीन सालों तक. इन तीन सालों में केवल संस्थान का फीस था 1.5 लाख. पढ़ाई तीन साल के बाद भी मैं दिल्ली में अगले दो साल तक रहा. इन पांच सालो में हर महीने मुझे चार से पांच हज़ार रुपय मिलते रहे अपने गार्जियन से. दिल्ली से पटना आने के समय. तहलका, में फोटो खिचने का काम मिला था. कैमरा खरीदने के लिए  मुझे बीस हज़ार रुपय मिले. और अभी मैंने 50 हज़ार रुपय मंगवाएं हैं ताकि एक बाईक ले सकूं. और पटना की सड़कों पर आसानी से घुम सकूं. इसके अलावा हर महीन जो हज़ार-दो हज़ार रुपय मिलते रहे वो अलग है. उसका कोई हिसाब मैं नहीं लगा सकता. 

अब आप पुछेंगे कि मेरे उपर लगे आरोपो का जवाब देने के लिए यह बताना क्यों जरुरी है कि मुझे, मेरे गार्जियन ने किस कम के लिए कितना पैसा दिया. मैं कहूंगा यह बताना बहुत जरुरी था. मेरे पापा, पुलिस में हैं. बिहार के गया जिले के एक थाने में दरोगा हैं. और मैं बहुत अच्छे से जानता हूं कि उन्होंने मुझे अबतक जो भी रकम दी है उसमें एक बड़ा हिस्सा घूस द्वारा मिले पैसे का है. वो घूस लेते हैं. और मेरे लिए यह उसी लेवल का भ्रष्टचार है जिस लेवल का कलमाड़ी या ए. राजा का. लेकिन मैं उनके खिलाफ शिकायत कर के उन्हें जेल भी भिजवा सकता. 

क्योंकि वो मेरे पापा हैं और वो क्राईम कर रहे हैं उसका एक बड़ा हिस्सा वो मुझी पे खर्च कर रहे हैं. मेरी कोशिश रहती है कि मैं उन्हें इस बात के लिए राजी कर सकूं कि वो घूस लेना बंद कर सकें लेकिन इस कोशिश में भी मैं सफल नहीं हो पा रहा हूं. जब भी मैं उनसे इस मामले में बात करता हूं तो वो एक सवाल मेरी तरफ उछाल देते हैं और फिर मैं उनके आगे नहीं टिक पाता. और वो जो कहते हैं वो सही भी है. वो कहते हैं, कि मैं घर का सबसे बड़ा बेटा हूं( मेरा एक छोटा भाई भी है जो बैंगलोर में पापा के पैसे से ही इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा है) मैं अपनी जिम्मेदारी उठा लूं तो वो घूस के एक पैसे को भी हांथ नहीं लगाएंगे. ठीक तो कह रहे हैं वो. मैं भी कोशिश कर रहा हूं. खुद को उस स्थिति में लाने की जब उनके सामने खड़ा होकर कह सकूं कि बस, अब और नहीं. मैं हूं!

आप, लोकपाल नामक कानून को लाकर सामुहिक रूप से घूसखोरी और भ्रष्टाचार के खिलाफ नारा बुलन्द करने में विश्वास रखते हैं. मैं आपके विश्वास और भरोसे की कद्र करता हूं. लेकिन मैं इस राक्षस से अपने स्तर पर लड़ाई लड़ने की कोशिश कर रहा हूं. मैं अपना काम बगैर घूस दिए सरकारी दफतर से करवा रहा हूं और बगैर पत्रकार होने की धमक दिए. मै  इसके लिए आरटीआई का इस्तेमाल कर रहा हूं. और इस लड़ाई को मैं तब से लड़ रहा हूं जब आप आंदोलित होकर सड़कों पे भी नहीं आए थे. पूर्व में कई जगहों पर मैंने पुलिस के सिपाही को अपना काम निकलने के लिए या निकल जाने के बाद रकम दी है. और अब मैं ऐसा कुछ भी नहीं करने वाला.

आप लोकपाल के रास्ते पूरे देश से भ्रष्टाचार खत्म करने के लिए आंदोलित हैं. बेशक, आपकी लड़ाई बड़ी है. आप समूचे देश से भ्रष्टाचार खत्म करना चाहते हैं. आपको, आपकी लड़ाई में कितनी सफलता मिलेगी इसे लेकर आपके दिमाग में संदेह होगा. लेकिन जो लड़ाई मैं लड़ रहा हूं उसमे मुझे सौ फिसदी जीत दिखती है. और जिस दिन मैं अपने इस लड़ाई को जीत लूंगा उसी दिन भ्रष्टाचार के खिलाफ नारे लगा पाउंगा. इसके बीच में मैं भ्रष्टाचार पर चुप रहते हुए ही सबकुछ देखना चाहूंगा.

आपको जन लोकपाल का इन्तज़ार है और मुझे अपनी उस जीत का इन्तज़ार है.

शुक्रिया.

गुरुवार, जून 02, 2011

रिश्ता होता बड़ा खुबसुरत.

फेसबूक की दुनियां में वैसे तो रोज न जाने कितने हलचल होते रहते हैं लेकिन आज एक एस्टेटस को पढ़कर लगा कि अरे, ये तो मेरी कहानी है. अपनी आपबिती है.     
भोपाल की रहने वाली  एक प्रखर पत्रकार ने लिखा, “प्रेम का आभाव कभी न कभी हमारे ही द्वारा, किसी के निश्छल प्रेम का अपमान करने की वजह से ही पैदा होता है. हम खुद ही, जाने-अनजाने, प्रेम स्त्रोतों की हत्या कर देते हैं.”  
इन वाक्यों को पढ़ते ही अपने वो दिन याद आने लगे जब मैं प्रेम के अथाह सागर में हर पल गोते लगाता था. वो दिन और रात एकाएक से सामने आने लगे जिन पे कभी प्रेम की कविताएं चमकती थीं.

वो पागलपन याद आने लगा जब हमदोनों एक दुसरों के लिए तरह-तरह के प्यारे संबोधनों का इस्तेमाल करते थे. ये संबोधन दूसरे लोगों के लिए बेमतलब होते थे लेकिन हमे तो उन्हीं में सबकुछ दिखता था.

धीरे-धीरे वक्त बदला, मैं बदला. वो कहती रहीं कि देखो, तुम बदल रहे हो. तुम वो नहीं जिसे मैंने चाहा था, जाना था. सतर्क भी किया. संभलने को भी कई बार कहा. लेकिन मुझपे किसी बात का ज्यादा देर तक असर नहीं रहता.  ये बातें सुनने के बाद लगता कि सही कहा जा रहा है. मुझे चेतना चाहिए. संभलना चाहिए.

 लेकिन कुछ दिन बाद ही मेरी ये सोंच हवा हो जाती और फिर से मेरा दानवी रुप बाहर आने लगता. लेकिन मैं ऐसा नहीं था. न हीं मैं ऐसा व्यवहार करना चाहता था. लेकिन संच ये है कि हर पल ऐसा ही कुछ हो रहा था जिससे प्रेम के सागर में सुनामी उठ रही थी. किसी का कलेजा हर बार छन्नी-छन्नी हो रहा था. उस घायल मन को मैं समझ नहीं पाया. अपने रिश्ते को बचाने के बजाए उसी सागर में डुबो आया. बर्बाद कर बैठा सबकुछ. अपने रिश्ते को फिसलते हुए बहुत करीब से देखा है मैंने. इतने करीब से की खुद पे ही विश्वास नहीं होता.

यह रिश्ता मेरे लिए सपने जैसा था. कुछ टाईम पहले मैं नींद में भी नहीं सोंच पाता था कि मैं जिसे चाहता हूं वो मुझे भी चाहने लगेगी. और वो भी बिल्कुल पागलों की तरह. लेकिन ये सपना हकीकत में बदल गया. हम साथ-साथ आए.

मेरी गलतियों ने इस सपने को बहुत ही जल्दी तोड़ भी दिया. सबकुछ खत्म कर दिया. बर्बाद कर दिया.
आज अपने प्यार को खोकर लूटा हुआ मह्सूस करता हूं.  ठगा हुआ समझता हूं.
उनके मन में आज किसी और के लिए जगह बन रही है. कभी जो प्यारे-दुलारे संबोधन मैं उन्हे दिया करता था आज उन संबोधनों पे किसी और का हक बन गया है.  

खैर, ये एक अलग मसला है. मैं यहां अपने रिश्ते का मर्शिया गान नहीं करना चाहता हूं.
मुझे पता है कि मेरा उनका रिश्ता वाकई बहुत मजबूत है. मुझे आज भी लगता है कि आगे हम जरुर मिलेंगे. फिर से वहीं राते होंगी. फिर से बातों की कविताएं बहेंगी. सपनों के बरसात होंगे.  वो कहती हैं कि ये ओवर कॉन्फिडेंस है. ऐसा कुछ नहीं होगा लेकिन सच तो ये है कि मेरा उनके करीब आना ही या उनके बारे में सोंचना ही ओवर कॉन्फिंडेंस था.

फिर से वहीं आता हूं. फेसबूक स्टेट्स में जो बात कही गई है वो शत-प्रतिशत सही है. अगर आप किसी के प्यार की इज्जत नहीं कर रहे हैं तो आप समझ लीजिए कि जल्द ही आप उस प्यार के लिए बुरी तरह से तरसने वाले हैं. पागल होने वाले हैं. रोने वाले हैं. 

और अगर आप अपने रिश्ते में इन चीजों को आने से रोक पाते हैं तो सही मायने में आप दुनियां के सबसे सुखी और खुशी इन्सान होगें क्योंकि आपको कोई प्यार करने वाला होगा. आपका रिश्ता आपकी ज़िन्दगी को हमेशा महकाता रहेगा. आपको चेहरे पर एक चमक और मन में के दमक रहेगी.
इस महक को खोने के बाद आपके अंदर कुछ भी नहीं बच पाएगा. कुछ भी नहीं. आप खोखले बन के रह जाएंगे. जैसे मैं रह रहा हूं…….

गुरुवार, मई 26, 2011

रिजल्ट का दिन, काला दिन.


कल, बिहार में दो-दो परिक्षाओं के परिणाम निकले. पहला अई.अई.टी. जे.ई.ई  का और दूसरा मैट्रिक  का.  पहले वाले रिजल्ट से अपन का कोई भावनात्मक लगाव नहीं है. कभी सपने में भी आई. आई, टी. के बारे में न सोचने वालों की जमात में से रहा हूं. लेकिन शिक्षा की सड़क पे बनाए गए मैट्रिक रुपी बैरियर से तो गुजरना ही पड़ा. इससे बच निकलने का कोई दूसरा रास्ता था ही नहीं. अगर होता तो मैं उसे जरुर अपनाता और फिर बड़ी खुशी-खुशी पापा द्वारा किए गए लत्तम-जुत्तम को सह लेता.  ये सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ. मार-पिटाई हुई लेकिन रिजल्ट आने के बाद. लात, थपड़ और घुसों की जमकर बरसात हुई. 

मुझे अच्छे से याद है. सुबह के साथ बजे होंगे. मैं कोठरी( घर का बाहर वाला कमरा) में लगे चौकी पर मछरदानी लगा के चैन से सो रहा था. बिल्कुल निफिक्री में.  तभी कान में आवाज आई. “अरे….रिजल्ट आ गया तिरहुत प्रमंडल का.” लगा कि सपना देख रहा हूं.  मैं बिल्कुल निश्चिंत था कि अगले एक- दो दिन तक तो रिजल्ट नहीं ही आएगा.  आज तक नहीं पता चा्ला कि उस बेफिक्री का आधार क्या था. 

खैर, मेरे मानने और न मानने से क्या होता है. रिजल्ट का भूत गांव की सड़क पे घुम रहा था.  सभी बच्चे अपने-अपने रौल नंबर का मिलान करने के लिए हरी भाई के दरवाजे की तरफ जा रहे थे क्योंकि दो रुपय में आने वाला आज अखबार केवल उन्हीं के यहां आता था. ये सब मैंने देखा नहीं. आधी नींद में रहते हुए महसुस किया था. मैं अपना रिजल्ट जानता था और उसके बाद क्या होने वाला था वो भी जानता था. तभी तो हर रोज यह मनाता था कि रिजल्ट आए ही नहीं.  अखबार में देखने का बिल्कुल मन नहीं था. लेकिन अंगना में चुल्हे पर रोटी बनाती मम्मी को और जन-मजूरा की तलाश में पछियारी टोला गए पपा को अपने मन की बात बताने की हिम्मत नहीं थी.  

पपा, परीक्षा के फौरन बाद नंबर का हिसाब लेते थे. मैथ में कितना आएगा? फिजिक्स और केमेस्ट्री में क्या मिलेगा? और मैं उन्हें हर विषय में सत्तर से अस्सी नंबर के बीच का आंकड़ा पकड़ा देता था. जबकी मुझे पता होता था कि हर विषय में मेरे अंक चालिस से पच्चास के बीच झुलेंगे. झूठ कहता था उनसे. उस वक्त मुझे इसका कोई अफसोस भी नहीं होता. बल्कि खुशी होती. सोंचता, ’चलो…..बढिया है. इस तरह लात खाने से तो बच गया” 

जैसी की मुझे उम्मीद थी. हरी भाई के अखबार ने भी मुझे वही परिणाम दिए. मैं मैट्रिक की इस बैरियर को सेकेंड गेयर से पार कर गया था. मुझे, मेरा रिजल्ट मिल गया था. मैं सतुष्ट था लेकिन घर पे किसी को विश्वास ही नहीं हो रहा था. सबको लग राहा था कि मुझे फर्स्ट क्लास से पास होना चाहिए. 

 मेरे मैट्रिक का रिजल्ट जब पपा को पता चला तो उनके गुस्से का बम घर में फट पड़ा. इसके बाद जो हुआ वो मैं शुरु में ही बता चुका हूं. बार-बार बताना अच्छा नहीं लगता. 

खैर, इस सब  में मेरे पापा की ज्यादा गलती नहीं थी. उनकी गलती ये थी कि मारते वक्त वो यह भूल जाते थे कि मैं उन्हीं का बच्चा हूं. मैं पढ़ने में बिल्कुल भुसकौल था. जब मेरे दोस्त –यार परीक्षा की तैयारी कर रहे थे तब मैं आगामी विधानसभा चुनाव के चुनावी माहौल का मजा ले रहा था.क्या करता, सब्जेक्ट की किताबों से ज्यादा मुझे चुनाव प्रचार की गाड़ियां. चुनाव से पहले का हो हल्ला और चुनावी संबंधी बातें अपनी तरफ खिंचती थीं.
कल का दिन, मेरे रिजल्ट वाले काले दिन की याद दिला गया.

सोमवार, मई 23, 2011

सरकारी गरीब की खोज( पार्ट -1)


पटना के अपने आफिस में अभी पहूंच कर फेसबुक खोला ही था कि हमारे दिल्ली आफिस से फोन आया. जब फोन आया तो मुझे उठाना ही था सो मैंने उठाया और जैसे सभी फोन उठाते ही “हैलो” से शुरुआत करते हैं वैसे मैंने भी हौले से हैलिया दिया.

दिल्ली आफिस: सुनिए……अंग्रेजी में बीपीएल के उपर एक स्टोरी जा रहे है तो उसके लिए पटना से एक केस स्टडी चाहिए. हो जाएगा न?

मैं (पटना आफिस से): किस तरह का?

दि०आ०: कुछ दिन पहले  ये तय हुआ है कि शहरी क्षेत्र में रहने वाला जो व्यक्ति रोजाना 20 रुपय से ज्यादा खर्च करेगा वो गरीबी रेखा से उपर माना जाएगा. ग्रामीण क्षेत्र के लिए 15 रुपय रोजाना खर्च करने की सीमा तय की गई है. आपको एक गरीब खोजना है और उससे पूछना है कि अगर उसे एक दिन में बीस रुपय खर्च करने हो तो वो क्या करेगा? मामला समझ में आ गया न?  एक बात और….जिससे भी बात करेंगे उसकी एक हाई रेजुलेशन फोटो भी चाहिए.

मैं: हां…..हो जाएगा. ( मन में चल रहा था कितना आसान काम है. बिल्डिंग से नीचे उतरते हीं बहुत से गरीब मिल जाएंगे.)

दि० आ०: ठीक है फिर भेजिए…….आज शाम तक ही चाहिए.

 मैं: हो जाएगा…….भेजता हूं, शाम तक.

फोन कट गया. मैं गरीब खोजने की जुगत में लग गया. इस दौरान और बहुत कुछ हुआ लेकिन उसे बताने बैठूंगा तो बहुत लिखना पड़ेगा और ज्यादा लिखना अपन को पंसंद नही. मुंह से चाहे जितना बकवा लो. लिखने में नानी याद आने लगती है मेरी.

इसलिए थोड़ा जम्प मारते हुए आपको सीधे बिल्डिंग से सड़क पे ले चलता हूं.

सड़क पे बहुत से रिक्शे, ठेले वाले सर्र-सर्र भागती गाडियों के बीच रेंग रहे थे. कुछ लोग पेड़ की छांव में रिक्शे की पीछे वाली सीट पर दुबके अउंघा रहे थे.

मैं इस सोंच से दुबला हुआ जा रहा था कि किसे रोकूं. जो सवारी लेकर जा रहा है वो रुकेगा नहीं. जो सोने की कोशिश कर रहा है उसे अपने पत्रकारिय काम के लिए उठा देना ठीक नहीं. फिर धेयान आया कि जो खाली हो और जगा हो उसे पकड़ा जाए. सो एक ऐसा रिक्शा वाला मिल ही गया. मैं उसके पास गया. बोला, “मेरा नाम विकास है. आपका क्या नाम है?”

रिक्शा वाले भाई ने मुझे उपर से नीचे तक एक्सरे किया. उसके आंख का कैमरा मेरे पेट के पास लटके बैग तक आकर रुक गया. वहीं देखते हुए बोला, “ नाम से का मतलब. कहां चलना है ये बताइए.”

“जाना नहीं है. आपसे बात करनी है. पत्रकार हूं.” मैंने कहा.

कान पे हांथ रखते हुए उसने ऐसे पूछा जैसे उसे सुनाई न दिया हो. लेकिन माजरा कुछ और था सो मैंने उसे सफाई दी, “ अखबार में लिखता हूं. आपसे कुछ बतियाना है”

 अबकी वो समझ गया. “बताइए का कहना-सुनना है?”

“आपका लाल कार्ड बना है” मैंने पूछा.

बगैर एक पल बिताए उसने कहा, “ नहीं बना है.”

“काहे नहीं बना है’ मैं बोला.

“का करना है आपको….. ये न बताइए. हमरा लाल कार्ड बना चाहे न बना आपको का मतलब है उससे?” थोड़ा तमतमा कर बोला.

मैंने मुस्कुराते हुए फिर कहा, “बताइए न….. लिखना है कि काहे नहीं बना?”

“का हो जाएगा आपके लिखने से. बही न होगा जो मुखिया जी चाहेगा( राज्य का नहीं, उसके पंचायत का). ऊ चाहता है कि हम कार्ड बनवाने के लिए उसके आगे-पीछे करें . हमसे ई न होगा. हम अपना बाप का नज़ायज सुनवे नहीं करते हैं. ऊ मुखिया है तो का हुआ. कौनो लाट है का.”

वो थोड़ा ज्यादा ही गुस्से में आ गया. वैसे भी यह गरीब मेरे काम का नहीं था. मुझे तो सरकारी मायता वाला गरीब चाहिए था. ऐसा गरीब जिसे सरकार ने गरीबी रेखा के नीचे माना हो. सो मैंने इस बातचीत को यहीं पे लपेट लिया.( पत्रकारिय गुण भी तो यही है न. जहां स्टोरी नहीं बन रही वहां समय गंवाना बुरबकई है.)

नोट: पाठक( दो-चार जो भी हों.)  हिज्जे की गलतियों पर धेयान न दें. यह गलती यहां थोक में मिलेगी.

गुरुवार, मार्च 03, 2011

एक पत्रकार हूं!

हर गरीब,
भूखा-नंगा,
बिमार-लाचार,
मेरे लिए मात्र समाचार है.
क्योंकि मैं इन्सान से आगे की चीज- एक पत्रकार हूं!

सोमवार, फ़रवरी 28, 2011

दुख....

तुमने अपना कह लिया,
मेरा सुना ही नहीं.
आए और चले भी गए.......
सबकुछ देखा,
मेरी तरफ मुड़े भी नहीं.

मंगलवार, फ़रवरी 08, 2011

किसान हूं, सरकार नहीं.

मेरे खेत को उजाड़ दो,
घर को भी उखाड़ दो,
फिर अपने विकास का झंडा वहां गाड़ लो,

मैं कुछ नहीं कहूंगा,
कुछ नहीं करूंगा,
क्योंकि मुझे ज़मीन चीरना आता है,
सीना फाड़ना नहीं आता.

शनिवार, नवंबर 27, 2010

सपनों का बिहार.....!!

एक बिहारी होने के नाते इस बात की खुशी है कि आज हमारा राज्य कई मामलों और मसलों में देश को एक नई राह दिखा रहा है. आज बिहार मर्गदर्शक की भुमिका में है. राज्य की जनता को बिहारी होने का गर्व महसूस हो रहा है. 

लेकिन अभी भी राज्य में कई मसलों और मुद्दों पर बात होनी चाहिए. कुछ बदला है. बहुत कुछ बदलना बाकी है.पिछली सरकार ने अपना काम किया है. सड़कें बनी हैं. स्कूलों में बच्चों की संख्या बढ़ी है. गरीब-गुरबों के लिए सरकारी खजाने से पैसे आए. 

लेकिन क्या इतना भर ही काफी है. क्या केवल सरकार के जिम्मेवार होने और काम करने से एक बिहारी के “सपनों का बिहार” बन सकता है? नहीं…..ऐसा बिल्कुल नहीं है. 

अगर वाकई बिहार को एक बेहतर और कामयाब राज्य बनना है तो सरकार और जनता दोनों को कदमताल करते हुए चलना होगा. राज्य की आम जनता को भी सुन्दर बिहार के लिए खड़ा होना होगा. लड़ना होगा. 

अबतक हम यह कह रहे थे कि राज्य का शसन ही सो रहा है तो जनता क्या करे? लेकिन अब ऐसा नहीं है. हमसब ने दूबारा से उस सरकार और नेता में विश्वास जताया है जिसने राज्य की जनता में विकास की ललक पैदा की है. हमने, उस नेता को आगे किया है जिसमें राज्य की जनता को आगे बढ़ाने का हौसला है. हमने उस सरकार को दूबारा बनाने का फैसला किया है जिसके पास राज्य के विकास के लिए एक तय कार्यक्रम है. और इससे यही साबित होता है कि हमलोग विकास चाहते हैं.  सुख-शांति और रोजगार चाहते हैं. लेकिन हमारी ये चाहत केवल वोट देकर सरकार बनवा देने भर से पूरी नहीं होगी. 

हमे भी राज्य की जनता होने के नाते अपनी-अपनी ज़िम्मेदारी समझनी होगी.  हमारा जहां, जो काम है उसे ईमानदारी और लगन से करना होगा. तभी राज्य की तस्वीर असल में बदलनी शुरु होगी. और यह असली बदलाव होगा. इसी तरह से हमारे सपनों का बिहार खड़ा हो सकता है. इसका कोई शर्ट-कर्ट नहीं है. जब तक हम यानी एक आम बिहारी आलसी, भ्रष्टाचारी और घुसखोर बना रहेगा तब तक राज्य का सही मायने में विकास संभव ही नहीं है. 

हमे सरकार को  विश्वास दिलाना होगा कि आप पैसे भेजिए, योजनाएं बनाइए. जमीन पर उसे लागू जनता करवा लेगी. हम करवाएंगे. 

हमे आने वाली सरकार का बोझ हल्का करना होगा. सरकार को यह विश्वास दिलाना होगा कि जिसका जो हक है उसे वो मिलेगा. दूसरा कोई भी उसका हक नहीं खाएगा और अगर किसी ने भी गरीब या जरुरतमंद का हिस्सा लेने की कोशिश की तो जनता उसे बेनकाब कर देगी.  

हमें यह समझना होगा कि अगर हम अपने अंदर यह बदलाव लाते हैं. राज्य की मदद करते हैं तो इससे किसी दूसरे का कोई भला नहीं होगा. बल्की इससे हमारे बच्चों के लिए ही एक सुन्दर और ईमानदार “बिहार” तैयार होगा. 

“ सपनों का बिहार” बनाना केवल एक सरकार और कुछेक नेताओं के बस में नहीं है. इसके लिए जरुरी है कि हर बिहारी उठ खड़ा हो और कहे- “मुझे बनाना है अपने सपनों का बिहार”

शनिवार, अक्टूबर 02, 2010

जानना जरुरी है.

बार-बार अपने आपको समझाता हूं,
तुम्हे भी बतलाता हूं,
कि मैं परेशान नहीं हूं,
हैरान नहीं हूं.

लेकिन ये सच नहीं है.

अब, तुम जानना चाहोगे,
फिर क्या है सच?
अभी मुझे खुद नहीं पता.

खोज रहा हूं,
फोन में,
कमरे में,
पुरानी यादों में,
गंदी डायरी में,
कमरे के बाहर,
हर जगह,
हर तरफ.

मिल गया तो जरुर बताउंगा,
क्योंकि सच जानना जरुरी है.

बुधवार, सितंबर 29, 2010

लालू के लाल का असमंजस!!

बिहार के पूर्व मुखिया लालू यादव अपने पटना वाले सरकारी आवास के अहाते में पेट तक लुंगी लपेटे और उपर एक गंजी डाले लट्टू की तरह चक्कर काट रहे हैं. सामने रखे टीवी सेट पर लगातार नीतीश के कविता पाठ की खबर चल रही हैं और इसी खबर को सुनकर लालू के टहलने की स्पीड बढ़ गई है. उन्होंने टहलते हुए ही आवाज लगाई, “अरे, कौउनों बंद करो इ टीवी को. का बकवास दिखा और सुना रहे हैं ससुरे….”

अंदर से किसी ने आकर टीवी सेट का कान घुमा दिया. टीवी तो बंद हो गया लेकिन साहब के कानों में नीतीश की कविता लाउड स्पीकर की तरह बज रही थी. लालू ये सब सोच ही रहे थे कि पीछे से आवाज आई. “ पापा...मैं गाड़ी ले जा रहा हूं.”

आवाज की तरफ लालू पलटे तो देखा कि बेटा (तेजस्वी) कंधे पर क्रिकेट का किट लिए बाहर की तरफ जा रहा है. बेटे को आवाज लगता हुए बोले, “खाली खेल-वेल के चक्कर में रहते हो, अभी इधर आओ..”

 “मुझे प्रैक्टिस के लिए देरी हो रही है.” बेटे ने जवाब दिया. लालू थोडा तमक कर बोले, “बुला रहे हैं न. अभी यहां आओ. प्रैक्टिस के लिए बाद में जाना”

पापा के गर्म मूड को भांप कर तेजस्वी ने अपने कंधे से क्रिकेट का किट निचे पटक दिया और पास आकर बोला, “क्या है?”

बेटे के कंधे पर हाथ रखते हुए लालू ने थकी आवाज में पूछा, “आज का समाचार देखे कि नहीं.”

 तेजस्वी, “नहीं क्या हुआ?”

“ई नितीशवा सरेआम हमारा मजाक उड़ा रहा है, हमरे और तुम्हरे माई के उपर कविता लिखवा कर पढ़ रहा है.”

तेजस्वी, “अच्छा! तो फिर हम अपने वकील से बात करके उनके उपर मानहानी का दावा करवा देते हैं”

लालू, “नहीं रे बुरबक! इहे त उ चाहता है. ये सही नहीं है. हमभी कल प्रेस वालों के सामने एक कविता पढ़ना चाहते हैं. नीतीश पर. और हम ई भी चाहते हैं कि तुम्हे भी पालिटिक्स में कल ही लांच कर दें. ई गुल्ली-डंडा बहुत हुआ अब ऊ करो जिससे आगे तुम्हारी रोजी-रोटी चलने वाली है, समझे.”

तेजस्वी का मन तो हुआ इस प्रपोजल के विरोध में कुछ कहे  लेकिन अपने पापा के चेहरे पर चिंता की लकीर देखकर चुप रहा और हामी भर दी.

लालू को थोड़ा साहस मिला बोले, “तो बेटवा ले आओ कागज कलम और लिख त दो एक चिकोटी काटने वाली कविता.”

“कविता, नहीं-नहीं पापा ये मुझसे नहीं होगा….मैंने तो दसवीं में भी कविता नहीं पढी थी.”

कविता लिखने के नाम पर बेटे को इस तरह से हलकान होते हुए देख लालू ने कहा, “अरे ई का कह रहे हो…. नहीं कैसे होगा. अभी तक नहीं पढ़े तो क्या…अब लिख दो.”

“लेकिन कैसे पापा?” तेजस्वी ने विस्मित भाव में पूछा.

“वैसे ही जैसे हमने पहली बार सत्ता मिलते ही पंद्रह साल इहां राज किया. हमने भी तो इ सब पहले बार में ही किया था. कोई ट्रेनिग थोड़े न लिए थे.” लालू ने जवाब दिया.

पापा का यह जवाब सुनकर बेटे में थोड़ा विश्वास आया लेकिन अभी भी कुछ कसर थी सो उसने कहा, “आप कॉलेज से ही राजनीति कर रहे थे और आपको इन सब का अनुभव था.”

“अरे बाकल, अनुभव गया तेल लेने. ठीक है हमें छोड़ो…अपनी घरेलू माई से सीखो. उसको कउन सा अनुभव था. संकट पड़ी तो ऊ जम गई ना गद्दी पर. और आठ साल तक राज भी किया. अब तुमही को ई गद्दी संभालनी है. एक कविता लिखने से इतना घबराओगे तो लंबा-लंबा भाषण कइसे दोगे?”

अपने पापा और मम्मी की दिलेरी की कहानी सुनकर तेजस्वी के अंदर आत्मविश्वास कुलांचे मारने लगा और वो कलम-कागज लाने के लिए तेजी से अपने कमरे की तरफ भागा.

बेटे की इस फुर्ती को देखते हुए लालू जी की तोंद में हल्की कंपन हुई.

तभी उनकी नजर सामने से चाय की प्याली लिए आती राबड़ी पर पड़ी. उन्होंने दूर से ही आवाज लगा दिया, “सुनती हो….हमारा परिवार बिहार का पहला ऐसा परिवार होगा जिसमें बाप, महतारी और बेटा तीनों सीएम होगा. कल हम अपने बेटे को राजनीति के मैदान में लांच कर देंगे, क्रिकेट के मैदान पर बहुत खेला.”

यह सब सुनकर राबडी देवी को कोई एक्साइटमेंट नहीं हुई. वो चुपचाप चाय का कप लालू जी के हाथ में पकड़ाकर दोबारा किचेन की तरफ कूच कर गईं.

शुक्रवार, सितंबर 10, 2010

आइए, बोली लगाइए और ले जाइए.

क्या आपने कभी लड़कों को बिकते देखा है अपनी शादी के लिए. अगर आपको यह मौका अब तक नहीं मिला तो देर मत करिये. बिहार आ जाइए. आपको यह नज़ारा बखूबी दिख जाएगा और सच मानिए, जब आप लड़कों को कई-एक लाख में बिकते देखेंगे तो आगे से यह कहने से पहले सौ बार सोचेंगे कि बिहार एक गरीब राज्य है. भाई साहब, शादियों के मौसम में इस पूरे राज्य की हर जाति और बिरादरी (खासकर कुछ अगड़ी जातियों भुमिहार, राजपुत और ब्राहमण) में दहेज के नाम पर लेने-देने का जो क्रम चलता है वो सब्जी मंडी में होने वाले मोल-भाव को भी मात दे देता है.

यहां एक बेटी का बाप अपने लिए दामाद और अपनी बेटी के लिए दुल्हा लाता नहीं है बल्कि खरीदता है. अपनी बेटी की शादी करने के लिए किसी दरवाजे पर जाने से पहले अपनी जमां-पूजी और जमीन-जायदाद को जोड़ कर देखता है कि जिस लडके से वह अपनी बेटी ब्याहना चाहता है वो लड़का उसकी बजट में है या नहीं. यहां बजट से मतलब शादी में होने वाला खर्च कतई नहीं है. इस बारे में यहां  एक आम सोच है कि शादी में होने वाला खर्च तो वैसे भी लड़की वालों को उठाना ही चाहिए क्योंकि उनकी बेटी जो ब्याही जा रही है. यह धारणा इतनी आम बन चुकी है कि इसमें किसी को कोई दिक्कत या परेशानी नहीं होती है.

अगर होती भी होगी तो दिखती नहीं है. वैसे तो अब सालों भर शादियां होती हैं लेकिन छठ पर्व के बाद लड़की की बाप अपनी सवारी पर निकलता है, लड़के की तालाश में.  इस खोज में कुछ रिश्तेदार और आस-पड़ोस वाले अहम  रोल अदा करते हैं. ऐसे खोजी लोगों की जमात को अगुवा की उपाधी से नवाजा जाता है. अगुवा की उपाधी जिन लोगों को मिलती है उसमे ज्यादातर ऐसे मर्द होते हैं जो अपनी नौकरी से रिटायर हो चुके होते हैं या फिर वैसी महिलाएं होती हैं जिनके पास घर के काम के बाद ज्यादा से ज्यादा समय वैसे ही बचा रह जाता है. अगुवा बिरादरी शादी करवाने में अहम किरदार निभाता है. वैसे आदमी या औरत सफल अगुवा होते हैं जिसके पास ज्यादा से ज्यादा जानकारी हो और जो मोलभाव करने में भी माहिर हो.

अब अगर किसी बाप को अपनी बेटी ब्याहनी होती है तो सबसे पहले किसी चलती-फिरती डायरेक्टरी (अगुवा) से संपर्क साधता है और अपने मन की बात बताता है. अब यहां से अगुवा का काम शुरु होता है. अगुवा बेटी की बाप का बजट जानने के बाद उसे उसके बजट के मुताबिक लड़का बतला देता है. साथ-साथ यह भी बतला देता है कि कितनी रकम नगद देनी होगी और कितने का सामान देना होगा. कुछ सामान तो आज की डेट में फिक्स हैं जैसे अगर आप 2 लाख से 4 लाख नगद दे रहे हैं तो साथ में एक बाईक ताकि शादी के बाद लड़का-लड़की उस बाईक से आ जा सकें. एक कलर टीवी चाहे इलाके में लाइट हो या न हो. एक पलंग ताकि लड़का-लड़की सो सकें.

पलंग के लिए गद्दा, दरवाजे पर रखने के लिए सोफा,  स्टील के बरतन ताकि कल ल़ड़की को कोई दिक्कत न हो आदि. अगर नगद 4 से 10 के बीच में देनी हो तो टीवी प्लाजमा हो जाएगा, पंलग और सोफा किसी ब्रांडेड कंपनी का होगा और बाईक की जगह चार पहिया ले लेगा. गाड़ी हमेशा लड़्के की पंसंद की होती है. अगर नगद 10 लाख से 20 या 30 लाख हो तो इन सभी चीजों के साथ मुज्जफरपुर या पटना में ज़मीन या बना बनाया फ्लौट अपने आप जुड़ जाता है.

लड़की वालों से कितना पैसा नगद लेना है यह वर पक्ष के बड़े-बुजुर्ग तय करते हैं.  रकम तय करते वक्त हर छोटी से छोटी बात और खर्च का ध्यान रखा जाता है. जैसे- दुलहन के लिए जेवर-जेवरात, कपड़े और सामान लेने में कितना खर्च आएगा? बारात ले जाने में कितना खर्च आएगा? शादी के लिए बैंड कितने में आएगा? कहने का मतलब कि हर छोटे-बड़े खर्च का अनुमान लगाने के बाद यह तय किया जाता है कि कितनी रकम लेनी है.
अगर तय रकम, तय तारीख तक लड़के के पापा के पास पहुंच गया तब तो सब ठीक, सब कुछ मजे में. लेकिन अगर तय नगदी से कुछेक हज़ार या एकाध सामान भी तय समय तक लड़्के वालों के दरवाजे पर नहीं पहुंचा तो फिर कौन समधी, कैसा रिश्ता और किसकी शादी? भाई साहब, इतने के बाद तो सब कुछ बदल जाता है.

मामला यहां तक जा सकता है कि लड़की के बाप को जी भर गालियां भी सुननी पड़ सकती हैं और यह धमकी भी कि अब तो रिश्ता होने का सवाल ही नहीं है. उस वक्त अगर बचा हुआ पैसा या सामान आ गया तो फिर देखिए कैसे वही लड़के का बाप (जो थॊडे समय पहले अपने पजामा से बाहर हुआ जा रहा था और अपने होने वाले समधी को गरिया रहा था) कितने शान और सलजता से अपने समधी के साथ बैठा है.

लड़के के घर वालों की कोशिश होती है कि शादी का पूरा खर्च लडकी के बाप से नक़द वसूल किया जाए या फिर जितनी रकम मिली है खर्च उसी के अंदर ही किया जाए. इस बात का बखूबी ध्यान रखा जाता है कि खुद का एक पैसा न लग पाए.
इन सब के बाद लड़का अपनी शादी में पहनने के लिए शूट सिलवाएगा, मंहगे से मंहगा जूता, बेल्ट, मोजा, रुमाल, और चड्डी – बनियान तक खरीदवाएगा अपने होने वाले ससूर से. अगर इसमे कोई कमी रह गई तो फिर रंग देखिए लड़के का. जो लड़का आज तक रूपा मैक्रोमेन से आगे नहीं गया उसे भी जॉकी की चड्डी चाहिये होगी और रिबलाइन बनियान.

एक लड़की का बाप अपनी बेटी को ब्याहने के लिए हर किसी के नखरे उठाता है बिल्कुल सर झुका कर रखता हैं और मन ही मन इस बात की तैयारी भी करता रहता है कि जब वह अपने इकलौते बेटे की शादी करेगा तो कैसे लड़की वाले से आज का बदला लेगा. इतना सब कुछ होने के बाद भी अगर आपने किसी लड़के को यह कह दिया कि तुम शादी नहीं कर रहे हो बल्कि बिक रहे तो वो आपसे लड़ने को तैयार हो जाएगा.

किसी लड़के के बाप को यह बात सबसे ज्यादा मिर्च लगाती है कि वह अपने बेटे का ब्याह नहीं कर रहा है बल्कि एक सौदा कर रहा है. तो यहां की शादी में सब कुछ होता है – प्रोडक्ट (लड़का), सेल्समैन (लड़का-पार्टी), दलाल (अगुवा) और ख़रीददार (लड़की का बाप). इस पूरे सीन में बस एक चीज़ की इनवॉल्वमेंट नहीं होती और वो है लड़की.

मंगलवार, सितंबर 07, 2010

आपको हुई असुविधा के लिए खेद है.....!


करीब दो घंटे से किसी भी ए.सी. बस के न आने से परेशान एक दिल्लीवासी ने डीटीसी मुख्यालय में फोन घुमा दिया.

करीब दो रिंग के बाद दुसरी तरफ से एक भले मानस की आवाज आई, “डीटीसी हेल्पलाईन में आपका स्वागत है…बताइए आपकी क्या समस्या है?”

फोन करने वाले व्यक्ति को इस नंबर से इतनी सुसज्जित हिन्दी की उम्मीद नहीं थी. सो थोड़ा घबरा गया. फोन को कान से हटा कर देखा फिर थोड़ा मुस्काते हुए बोला, “भाई साहब, क्या कर रहे हैं आपलोग? सुबह का टाईम है. आफिस जाना है. एक भी बस नहीं आई पिछले दो घंटे से. आखिर, चक्कर क्या है?”

व्यक्ति ने अपनी सारी भड़ास निकालते हुए एक हीं सांस में पूरी बात कह डाली. 

“सर, आपको हुई असुविधा के लिए हमे खेद है!” दूसरी तरफ बैठे डीटीसी के अधिकारी ने कहा.
बस स्टॉप पर घंटे से खेड़े व्यक्ति को अब यह सुसज्जित शब्दवाण की तरह लग रहे थे.

अधिकारी की बात बीच में काटते हुए बोला, “खेद-वेद की छोडिये….ये बताइए कि ए.सी. बस कब तक आ रही है?”
 दूसरी तरफ से आवाज आई, “ए.सी. बस अगले कुछ दिनों तक नहीं आएगी. असुविधा के लिए खेद है!” 
अबकी, फोन करने वाले ने कड़ती आवाज में पूछा, “क्यों? क्यों नहीं आएगी भला?”

डिटीसी हेल्पलाईन वाले ने बिल्कुल नम्रता से जवाब दिया, “सर, अगामी गेम के लिए गाड़ियों को अभी से बुक कर लिया गया है. आपको कुछ दिन तक ब्लू लाईन में सवारी करनी होगी. गेम के बाद हम आपको पूरी सेवा दे पाएंगे. तब तक हुई असुविधा के लिए हमे खेद है…...! आपका दिन शुभ हो..!

इससे पहले की फोन करने वाला कुछ बोलता. दुसरी तरफ से टीं…टीं…टीं की आवाज आने लगी.

बुधवार, अगस्त 25, 2010

हे कलमाड़ी, आप न घबराना.

सुरेश कलमाड़ी जी,
नमस्ते,
वैसे तो पत्र के शुरु में हालचाल पूछा जाता है लेकिन मैं ऐसा करके जले पर नमक छिड़कने का काम नहीं करूंगा. हर रोज जानकारी मिलती रहती है कि कैसे आप जैसा एक खांटी खेल प्रेमी और देश की इज़्ज़त का सच्चा रखवाला परेशान किया जा रहा है.

रोज, सुबह की अखबार खोलते हीं सबसे पहले आपकी खैरियत जानने के लिए गेम से जुड़ी खबरों की तरफ आंखे दौड़ाता हूं. लेकिन हर दिन निराशा ही हाथ लगती है. रोज कोई न कोई आपको बुरा-भला बोल कर निकल जाता है. एक दो दिन पहले तो हद ही हो गई. शांत चित्त और प्रसन्न मुख वाले प्रधानमंत्री जी ने भी आपको हड़का दिया. ज्यादातर मौके पर केवल मुस्कान बिखेरकर निकल जाने वाले अपने सरदार जी से भी चुप नहीं रहा गया. 

मुझे समझ नहीं आ रहा कि आपने ऐसा क्या कर दिया है जो हर कोई आपकी तरफ हुडकी मार रहा है. मुझे क्या, ज्यादातर लोगों को नहीं पता होगा कि हुआ क्या है. बस बोलना है सो बोले जा रहे हैं.
कोई सामने आ कर बताए तो कि आपने किया क्या है? आखिर दोष क्या है?

अगर आपकी कोई गलती है तो वो बस इतनी कि आपने इस भुक्खड़ और हमेशा ही गरीबी में रहने वाले देश के लिए इतने बड़े गेम की मेजबानी हासिल की. 

आपने तो अच्छा ही सोचा था. आपको क्या पता था कि यहां के लोग इंदिरा जी के काल में भी गरीब थे और आज मनमोहन की सरकार में भी हैं. वैसे ज्यादातर नेता आपको इस बात के लिए नहीं कोस रहे कि आपने इस गेम की मेजबानी क्यों ली और इतना पैसा एक गेम के लिए क्यों खर्चा जा रहा है. इन्हें भी पता है कि इस देश से गरीबी न अब तक गई है और न आगे कभी जाएगी. यहां गरीब के अमीर बनने का एक ही आसान रास्ता है. सबको नेता बनना पड़ेगा. केवल नेता से काम नहीं चलेगा. मंत्री बनना पड़ेगा. जो गरीब लोग वक्त रहते नेतागिरी में आ गए उनका आज देखिए. दस-पांच लखपति को तो अपने अगल-बगल रखते हैं. 

खैर, मैं मुद्दे से भटक गया था. माफ करिएगा! इस देश में सबको ज्यादा बोलने की आदत है. क्या नेता, क्या जनता और क्या पत्रकार. सबके-सब अति बोलक्कड़ होते हैं. बड़े बुजुर्ग कह गए हैं कि ज्यादा बोलने से काम खराब होता है. हर कोई आपको बोल रहा है, झाड़ रहा है और इससब में खेल की तैयारी खाक होगी बस भसड़ हो रहा है. आप ऐसा मत होने दीजिए. जिस मन और हिम्मत से आपने गेम का आयोजन दुनियां से छीना था उसी लगन से लगे रहिए. 

अगर ध्यान लगाने में दिक्कत हो रही हो तो एक-दिन के लिए बाबा रामदेव जी के यहां से हो आइए. बड़ा अच्छा ध्यान लगवाते हैं. वैसे उन्हें भी आपकी तरह देश की इज़्ज़त बहुत प्यारी है. तभी तो बाबागिरी छोड़कर राजनीति के अखाड़े में लंगोट बांधने के लिये तैयार हैं. रामदेव जी आपको निराश नहीं करेंगे वो हर संभव आपकी मदद करेंगे. 

हंसी तो तब आती है जब घुसखोड़ी, घपलों और घोटालों के दम पर खड़े हमारे माननीय जनसेवक आपको गेम में हो रही भ्रष्टाचार के लिए गरियाते हैं. क्या जमाना आ गया है? जिन पर घोटालों के अनगिनत मामले लदे हैं, जो गरीबों के पैसे से पार्क और पार्कों में अपनी आदमक़द मुर्तियां लगवा रहे हैं वही लोग आप पर निशाना साध रहे हैं. जो राहत का सामान और कचरा तक कोंच कर ठाठ से बैठे हैं वही नेता आप पर गरीबों के पैसे लुटाने का आरोप लगा रहे हैं. 

मैं कहता हूं कि अगर आप एकाध करोड़ लुटा भी रहे हैं या कुछ लाख-वाख इधर-उधर हो भी जाता है तो इसमे गलत क्या है. इतना बड़ा आयोज़न है तो हल्का-फुल्का इधर-उधर तो होगा ही. इसमे कौन सी नई बात है!

सो कलमाड़ी जी, मैं आपको कहना चाहता हूं कि आप इन गीदड़ भवकियों से हड़किएगा मत. ये सब तो चलता रहेगा. एक कहावत है हमारे इलाके में “हाथी चले बाज़ार, कुत्ता भौंके हज़ार”. बस समझिए ऐसा ही कुछ हो रहा है. एक बार खेल खत्म हुआ कि सबकुछ हज़म हो जाएगा. 

जहां तक बात हो रही है जांच की तो उसके बारे में आपसे क्या कहना. हमारे यहां के जांच तो बस चलते हैं, और चलते हैं… बस चलते ही जाते हैं. इनका कोई नतीज़ा नहीं निकलता. वैसे ये-सब तो आप मुझसे बेहतर ही जानते हैं. आपकी दाढ़ी के बाल तो पक चुके हैं ये सब देखते-समझते. सो आप डरिएगा नहीं. घबराइएगा नहीं. टूटिएगा नहीं. बस अपने मिशन में लगे रहिए. मिशन कॉमनवेल्थ गेम. 

हां चलते-चलते एक जरुरी बात. इनसब झमेलों से थोड़ा समय निकालकर अपने परिवार को भी दीजिए क्योंकि बुरे वक्त में आपका परिवार ही आपके साथ रहेगा. वैसे खुदा न करे कि आप जैसे सच्चे सिपाही को कभी कोई बुरा टाईम देखना पड़े. 

आपकी सलामती और लम्बी उमर की दुआ के साथ इस पत्र को खत्म करता हूं. विशेष बातें किसी प्रेस बैठक में मिलने पर.
आपके जज़्बे को सलाम!!
राष्ट्रमंडल खेल की जय हो!!