शनिवार, सितंबर 26, 2009
“इसरो करेगा चाँद पर खुदाई….” वाह भाई..वाह !!
रविवार, सितंबर 20, 2009
लघु कहानी: ये तो सड़े हुए थे....!
शुक्रवार, सितंबर 18, 2009
अब आपको भी शादी कर लेनी चाहिए......
अब चुकी मेरे पास डाटा-कार्ड नही था और नेट की सुविधा गॉंव से काफी दूर थी सो मैं दूर था अपने ब्लॉग से। यहाँ एक बात साफ-साफ कहूं तो शुरू के कुछ दिन ही मुझे ब्लॉग से अलग रहने का मलाल हुआ।
गॉंव पहुँचने के तीन-चार दिन बाद, एक दिन रात को मैं इस बारे में सोंच रहा था की नेट की उपलब्धता होती तो मैं गॉंव से भी अपने ब्लॉग पर लिखता रहता फिर मुझे लगा की सही ही था कि वहाँ मेरे पास यह सुविधा नही थी। क्योंकि बेफिक्री से गॉंव की सड़कों पर घुमाने के लिए...... गॉंव में रहे-सहे अपने दोस्तों से(जो अब शादीशुदा ज़िंदगी जी रहें हैं) बतियाने का जिसमे वो अपनी शादी के पहले की खुशी और उसके बाद के झमेलों के बारे में खूब बतलाते थे ......
अपने माय( माँ ) से अंधेरे कमरे में लेटे-लेटे गपियाने का और उनसे वो सारी बातें सुंने का मौका गवां देता जो मेरी गैरहाजरी में गाँव में हुई।
ये बात अलग है कि माँ ने इसी बातचीत के दौरान ये भी बतला दिया कि मेरे हमउम्र और मेरे साथ पढ़नेवाले कितने लड़कों की शादी हो गयी और उनमे से किस-किस के माँ-बाप दादा-दादी बनने वालें हैं.........
भाई, ये तो मैंने भी महसूस किया है कि मुझसे छोटे-छोटे कई लड़कों की शादी हो गयी उनमे से कुछेक तो अपने बच्चों के बाप भी बन चुके हैं और उन्ही में से एक जनाब ने बातचीत में अब मुझे भी शादी कर लेनी चाहिए की नसीहत भी दे डाली और तर्क दिया कि शादी एक ख़ास उम्र तक कर लेनी चाहिए।
जब मैंने पूछा कि वो अपनी शादी से खुश हैं तो वो 15 से 19 के बीच का नौजवान एकाएक 60 साल का बूढा हो गया और गोद में लिए अपने बच्चे को देखते हुए बोला " इ क्या है खुशी की चिन्हासी(निशानी) ही तो है अब त इहे सबकुछ है....." इस बात को सुनकर मुझे हंसी आने लगी तो मैं वहां से हट गया।
तो, अब मैं इस उलझन में हूँ कि शादी कि सही उम्र क्या है? क्या आप बतलायेंगे .......शादी की सही उम्र ?
गुरुवार, सितंबर 17, 2009
अरे बापू यह क्या किया?
(एक बार फिर एक सुंदर लेख बीबीसी की ब्लॉग से आपसबों के लिए। लेख को लिखा है बीबीसी की तेज़तर्रार रिपोर्टर रेणु अगाल ने। आप इस आलेख को बीबीसी के बेब पोर्टल पर भी पढ़ स
कते हैं......)गांधीजी के नाम का आजकल भारत में कुछ ज़्यादा धड़ल्ले से इस्तेमाल किया जा रहा है. और तो और बेचारी गांधी की बकरी की भी याद सफेदपोश नेताओं को आने लगी है.
वाह किस्मत हो तो ऐसी. रस्मी तौर पर गांधी का इस्तेमाल भारत में आम है. पर अब जब मंदी का दौर है तो एक कपड़े में लिपटे, थर्ड क्लास में पूरा भारत दर्शन करने वाले और आश्रम में बकरी का दूध का सेवन करने वाले गांधी के आम आदमी को समझने के इसी हुनर को उनकी पार्टी, कांग्रेस के नेता आत्मसात करने में लगे है। पर बहुत बेमन से.
वित्त मंत्री के चाबुक के बाद कुछ मंत्रियों को पांच सितारा होटलों से निकल किसी मध्यवर्गीय की तरह एक आम राज्य गेस्ट हाउस में रहना पड़ रहा है.
बेचारे नेताओं को पुराने कारपेट, खटर पटर करने वाले एयरकंडीश्ननर से काम चलाना पड़ रहा है. न इटेलियन मार्बल, न बिज़नेज़ क्लास की सीटों का सुख..और तो और गाएं भैसों की तरह रेल के सफ़र की सोच से ही इन जनप्रतिनिधियों के पसीने छूट रहे हैं.
चुनावी समर में ही पसीना क्या होता है इन्होंने जाना था. और माना था कि उस मेहनत के बाद उन्हें न केवल एक बंगला मिलेगा न्यारा बल्कि पसीने की गंध को वो पांच साल तक भूल जाएंगे. पर ऐसा हुआ नहीं.
वे सब जानना चाहते है कि आखिर किस खुराफाती दिमाग़ की उपज थी कि आम आदमी के नाम पर चुनाव लड़े जाएँगे और उसे भुलाया भी नहीं जाएगा.
इस में भी ज़रुर हर चीज़ की तरह अमरीकी साजिश होगी. न मंदी होती न कमर कसने की मजबूरी और न ये गाय भैंस की सी ज़िंदगी. कुछ ग़लती अपनों की भी थी.
आखिर क्या ज़रुरत थी गांधीजी को बकरी पाल कर खुश होने की, जनता को जनार्दन का दर्जा देने की. उनको तो कम से कम देश के भविष्य के बारे में सोचना चाहिए था, नेताओं की दिक्कतों को समझना चाहिए था. वो तो अपने ही थे. बापू ने क्यों महात्मा बनने की सोची..क्यों, क्यों, आखिर क्यों।
(सभार-बीबीसी हिन्दी)
रविवार, अगस्त 16, 2009
सावधान, आ रहा... एक और इंडिया टीवी!
: महीनों में ही एक और इन्डिया टीवी हमारे और आपके टीवी सेट पर आनेवाला है, कहें तो धमाका करने वाला है.मुख्य धारा की खबरों की परिभाषा बदलने वाले, समाचार को तरकारी की तरह हांक लगाकर बेचने वाले, किसी स्टोरी की छोटी-सी बात पर एक-एक घंटे का खास कार्यक्रम बनाने वाले, भूत-प्रेत को पसंद करने वाले, खबरों में स्वर्ग की सीढ़ी खोजने वाले और आपकी अदालत में वकील और जज की भूमिका में अकेले डटे रहने वाले वरिष्ट टीवी पत्रकार और एंकर रजत शर्मा एक और इन्डिया टीवी लाने की घोषणा कर चुके हैं.
रजत जी का यह नया चैनल आर्थिक जगत के हर अनछुए पहलू को सामने लाने का काम करेगा. हिन्दी और अंग्रेजी में आर्थिक खबरों को बाचने वाले इस चैनल का नाम इन्डिया टीवी विज. बकौल रजत जी, इन्डिया टीवी विज आर्थिक जगत के सभी चैनलों की चूले हिला कर रख देगा और बिजनेस चैनलों के अभी तक के सारे मानकों को खत्म कर देगा और अपने उदय के कुछ ही दिनों बाद बिजनेस जगत के समाचार चैनलों का अकेला सूरज बन जायेगा. पता नही, आपको यह खबर पढ के खुशी हुई या नही लेकिन मैं तो इस खबर को पढ़ कर बड़ा ही रोमांचित हो रहा हूँ.
सोचिए और कल्पना कीजिए... आज के बिजनेस चैनल कितने बोरिन्ग हैं. हम जैसे तो घण्टों बैठे रहते हैं लेकिन एक भी बात पल्ले नहीं पड़ती लेकिन जब इन्डिया टीवी वाले अपने स्टाइल मे बिजनेस की खबरें दिखयेंगे तब तो भाई साहब, हर कोई शेयर मार्केट की भाषा जलेबी की तरह समझने लगेगा….. मजा आ जएगा खबरें देखने में……!!
अगर आपने इसी बजट के मौके पर इन्डिया टीवी का वो खास प्रोग्राम देखा हो जिसमे प्रोग्राम का एंकर अपने दोनों हांथ मे दो प्लेट जलेबी लेकर आता है और जलेबी की मदद से यह समझाने की कोशिश करता है कि सरकार ने आम इन्सान के लिये क्या-क्या तोहफा दिया है, तो आप आसानी से समझ सकते हैं कि रजत भाई बिजनेस की खबरों के साथ क्या करने वालें हैं.
मुझे लगता है कि इस चैनल के आने की खबर से तो अब तक के बिजनेस चैनलों के हांथ-पांव फूल रहे होंगे और वो ये सोच-सोचकर परेशान होंगे कि अब उन्हें भी शेयर मार्केट के गिरने और बढ़ने पर कुछ अलग करना होगा सिर्फ गेस्ट से बात करने से नही चलने वाला……..!!
तो फिर आइए, बिजनेस की खबरों मे भी एक क्रान्तिकारी बदलाव का इन्तज़ार करें!!
पारस की खोज....
एक आदमी ने एक दिन पारस पत्थर खोजने की ठान ली,
उसने अपने कमर में एक लोहे की जंजीर लटकाई....
.....और रास्ते के हर पत्थर को उससे छुआता हुआ वह धरती की एक कोने से दूसरे की तरफ बढ़ चला...!!
दिन, महीने, साल और सदियाँ बीती....
उसने जंगल, पहाड़, नदियाँ और रेगिस्तान लांघे ...
फिर भी उसकी तन्मयता में कोई कमी ना आई..
वह बारी-बारी एक पत्थर उठाता, उसे अपनी जंजीर से छुआता और फिर उसे दूसरी तरफ फेंकर आगे बढ़ जाता...
अचानक एक दिन एक व्यक्ति की नजर, उसके कमर पर पड़ी - वह चिल्लाया-
"तुम्हारी जंजीर तो सोने की हो गई है."
उसने अकस्मात् अपनी कमर की ओर देखा और हठात जमीन पर बैठ गया-
जिस पारस की खोज में उसने उम्र गुजार दि , वह कब उसके हाँथ से आकर निकल गई उसे पता ही नहीं चला...!
आपको नहीं लगता की हम अपने जीवन के साथ भी अक्सर ऐसा ही व्यवहार करते हैं..?
लेखक- जयशंकर
गुरुवार, अगस्त 13, 2009
बनाने वाले…………
चुल्हे पे है रोटी पकती, सड़क किनारे
बच्चे रोते, लडते और सो जाते, सडक किनारे
दिन का सूरज, सड़क किनारे
रात मे चान्द, सड़क किनारे
आना-जाना,
खाना-पीना,
लडाई-झगड़े,
प्यार-मोहबत, सब कुछ इनका सडक किनारे
वास्तव मे, ये महानगरों की सडक बनानेवाले हैं!!!
मंगलवार, अगस्त 11, 2009
बैतुल्लाह के बहाने
पत्रकारि
ता की अपनी सीमाएँ हैं.किसकी नहीं हैं? तालेबान कमांडर बैतुल्लाह महसूद ने पहले पाकिस्तानी सेना की सीमाओं का एहसास कराया और अब अनजाने में पत्रकारिता का भी.
हमने पहले पाकिस्तानी मंत्रियों के हवाले से बताया कि महसूद 'लगता है कि' मारे गए हैं, अब तालेबान के एक कमांडर कह रहे हैं कि वे ज़िंदा हैं.
दोनों में से एक ही बात सच हो सकती है, हम दोनों कह रहे हैं फिर हम सच कैसे कह रहे हैं?
दुनिया की लगभग हर समाचार संस्था सिर्फ़ सच रिपोर्ट करने का दावा करती है, हम भी करते हैं.
बैतुल्लाह ही नहीं, डूबी हुई नावें, टकराई हुई रेलगाड़ियाँ या फटे हुए बम... अक्सर पत्रकारों के लिए इम्तहान बनकर आते हैं.
पहले पुलिस कमिश्नर कह जाते हैं कि '50 लोग मारे गए', फिर गृह मंत्री बताते हैं कि '45 लोग मारे गए'... तो क्या इसका ये मतलब हुआ कि पाँच लोग मरकर जी उठे?
इन पेंचों को पत्रकारिता के उस्ताद ख़ूब समझते हैं. ख़बरों के कारोबार टिके रहने के लिए सबसे ज़रूरी चीज़ है साख. यही वजह है कि हर विश्वसनीय समाचार माध्यम बताता है कि ख़बर किस ज़रिए से आ रही है, यह उसकी अपनी खोज नहीं है.
जब हम महसूद के मारे जाने की ख़बर तैयार कर रहे थे तो हमारे एडिटर ने याद दिलाया- 'ये ज़रूर कहना कि तालेबान ने इसकी तस्दीक नहीं की है, और ऐसे कई दावे पहले ग़लत साबित हो चुके हैं.'
हमने एक तरह से मान लिया था कि महसूद मारे गए हैं, हमने ये चर्चा भी कि उनकी जगह कौन लेगा, लेकिन साथ ही हमने लोगों को कई बार याद दिलाया कि पाकिस्तानी मंत्री ऐसा कह रहे हैं तालेबान या महसूद के परिजन नहीं.
सच को ढूँढ निकालने का जोश अच्छा पत्रकार होने की शर्त है, मगर संयम और सतर्कता हमेशा अच्छा पत्रकार बने रहने का पहला नियम.
सीमाओं को याद रखना चाहिए और उनका सम्मान करना चाहिए, ख़ास तौर पर पत्रकारों को.
कुछ लोग कहते हैं कि रेस में ध्यान सिर्फ़ तेज़ दौड़ने पर होता है, लेकिन मुझे लगता है कि अपनी लेन में ही दौड़ना चाहिए उसके बाहर नहीं।
(बीबीसी हिन्दी से सभार)
रविवार, अगस्त 09, 2009
वेब को वेब ही रहने दीजिये टीवी मत बनाइए……
एक टीवी पत्रकार ने इस ख़बर को अपने अन्दाज़ मे तीन-चार पोर्टल को बांटा और हर पोर्टल और कुछ ब्लॉग ने इसे अपने यहाँ जगह दी.
मैं एक वेब ब्लॉग का खास तौर पर ज़िक्र करना चाहूँगा क्योंकि इस ब्लॉग को चलाने वाले ज़्यादातर युवा हैं और मुझे नही लगता कि इस ब्लॉग से उन सभी
का कोई व्यवसायिक हित जुड़ा होगा. मै हाल हीं मे चर्चा मे आए ब्लॉग “सलाम ज़िन्दगी” के बारे में बात कर रहा हूँ. मैं इस ब्लॉग से बहुत प्रभावित हूँ क्योंकि उसके सदस्य अच्छा लिखते हैं और दिल से लिखते हैं. लेकिन मालूम नहीं, इस खबर को लिखते समय उन लोगों को क्या हो गया था!
अव्वल तो मुझे ये कोई इतनी बड़ी घटना ही नहीं लगती कि इसे छापा या कवर किया जाए. उस खबर के साथ लगी फोटो से उस बुजुर्ग साधू की उम्र का साफ-साफ पता चलता है और अगर उस अदाकारा को कोई ऐतराज़ नहीं है तो हमें क्या पड़ी है कि हम उसमे अश्लीलता खोज़ते फिर रहें हैं और उस साधू की नीयत मे खोट देख रहें हैं.
दूसरी बात अगर हम ऐसा कर भी रहे हैं मतलब एक औरत पर हो रहे अत्याचार को दुनिया के सामने ला रहे हैं तो किस अन्दाज़ में. बानगी के तौर पर एक-दो शीर्षक दे रहा हूँ जो उस खबर के लिये लिखे गए.
1. आशीर्वाद मे चुंबन…..!......जय हो…….!!(भड़ास फ़ॉर मीडिया)
2. मंदिर में तार-तार हुई मर्यादा-आशीर्वाद में चुंबन (हिन्दीमीडिया.इन)
3. शिल्पा जी एक किस यहाँ भी…….(सलाम ज़िन्दगी, एक सामुहिक ब्लॉग)
यहाँ, इन तीनों पोर्टल का नाम मैने इसलिये लिया क्योंकि मै इनको नियमित रूप से देखता हूँ और कहीं न कहीं एक जुड़ाव भी महसूस करता हूँ, तीनो की अपनी-अपनी साख है.
एक मिनट के लिए अगर मै यह मान भी लूँ कि दोनों पोर्टल व्यवसायिक हैं और उनकी कुछ मजबूरियाँ रहीं होंगी इस खबर को देने के पीछे तो ये समझना मुश्किल हो रहा है कि “सलाम ज़िन्दगी” ने इस ख़बर को क्यों उठाया और वो भी इस तरह कि (शिल्पा जी एक किस यहाँ भी…….) शीर्षक के साथ!! इस ब्लॉग के होम पेज पर जिन पाँच लोगों की तस्वीरें लगीं हैं उन में से दो ल
ड़कियाँ हैं जिन्हेने इस खबर को इस शीर्षक के साथ जाने दिया. अक्सर मैने ऐसा देखा है कि लड्कियाँ इस तरह की खबरों पर विरोध करना चाहती हैं लेकिन उन्हे वहाँ मार्केट की माँग बता कर या नौकरी से निकाले जाने का धौंस दिखा कर चुप करा दिया जाता है लेकिन यहाँ तो ऐसा कुछ भी नहीं था फिर क्यों लड़कियाँ चुप रहीं?
वहीं, हिन्दीमिडिया की सम्पादक एक महिला हैं और मुझे ताज्जुब हो रहा है कि उन्हें एक साधू जो अपनी ज़िन्दगी की आखरी पायदान पर है, के चुम्बन से मन्दिर की मर्यादा भंग होती दिख गई लेकिन खबर की पहली ही लाईन “रिचर्ड गैरे के जबरन चुंबन की चुभन झेल चुकी शिल्पा शेट्टी के गुलाबी गाल पर एक बार फिर से चुंबन जड़ दिया गया। फर्क इतना है कि पहले उन्हें अभिवादन के नाम पर चूमा गया था इस बार आशीर्वाद में!” मे इस्तेमाल किये गये शब्द “गुलाबी गाल” से कोई आपत्ती नहीं हुई. अगर इस लाइन से इस शब्द को हटा दिया जाता तो ऐसा नहीं है कि लाईन का मतलब बदल जाता. हाँ, औरत की मर्यादा थोड़ी बच जाती.
अगर ये इतनी ही बड़ी ख़बर थी तब तो एक बाप अपनी जवान बिटिया को और एक माँ अपने जवान बेटे को भी चूमने से कतराएगी.
क्या हमारे यहाँ चुम्बन का एक ही मतलब होता है? क्या किसी को चूमने का एक यही मतलब होता है कि आप के मन में सेक्स की भावना जग रही है? अगर हर चुम्बन का यही मतलब हो तब तो ठीक है लेकिन अफसोस ऐसा है नहीं.
ख़ैर, मुद्दे पर आ जाते हैं. अगर आप वेब पोर्टल वाले और हम ब्लॉग वाले भी ख़बर में तड़का मार कर अपने पाठकों को परोस रहे हैं तो पत्रकारिता के किस मर्यादा का पालन हो रहा है?
अन्त, आपसब से अनुरोध है कि वेब को वेब ही रहने दीजिये टीवी मत बनाइए……
