सोमवार, जनवरी 25, 2010

कल एक और गणतंत्र दिवस




हर बार की तरह कल एक और गणतंत्र दिवस का समारोह होगा और आज शाम गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर देश की आम जनता के नाम राष्ट्रपति का संदेश राष्ट्रीय चैनल पर प्रसारित किया जाएगा. इस अवसर पर सब कुछ राष्ट्रिय होगा, सरकारी होगा.


क्या मकसद है इस दिन को मनाने का? मेरे समझ नहीं आता. क्यों जरुरी है राजपथ पर परेड और ये दिखावा? क्या इस दिन को मनाएं बिना हमे इस बात का एहसास नहीं होगा कि हम आज़ाद हैं?

शनिवार, जनवरी 16, 2010

कुछ ऐसा हो जो दिखे

आजकल टीवी की दुनिया में एक भूचाल आया हुआ है. कुछ समाचार चैनल के बड़े पत्रकार त्राहिमाम, त्राहिमाम कर रहे हैं. कोई अपनी खीज फेसबुक पर छोटे-छोटे टॉपिक डाल कर मिटा रहा है तो कुछ बड़े पत्रकार ब्लॉग पर पोस्ट लिखकर अपना दुख जाहिर कर रहे हैं.


लेकिन ये भूचाल, ये छटपटाहट इन पत्रकारों के एक बहुत छोटे से कुनबे में आया है. ऐसा नहीं है कि हर कोई त्रस्त है. कुछ लोग चिल्ला रहे हैं. चीख रहे हैं लेकिन बाकी़ मज़े में हैं.


जो भूचाल आया हुआ है उसका नाम है टीआरपी. जी हां, यह वही साप्ताहिक रिपोर्ट हैं जिसके भरोसे हमारे टीवी वाले ज़िंदा हैं. लेकिन पिछले कुछ दिनों से कुछेक पत्रकार को समाचार पर टीआरपी की मार अखरने लगी है.
आज उन्हें इस बात का अफसोस हो रहा है कि वो समाचार के नाम पर नाटक दिखा रहे हैं और यह पत्रकारिता नहीं है. बिल्कुल सही कह रहे हैं लेकिन एकाएक इस बात का अंदाजा कैसे हुआ इन लोगों को. टीवी से तो समाचार बहुत पहले गायब हो गया था. लेकिन उस वक्त इनलोगों को न तो कोई ऐतराज था और न ही कोई अफसोस.


उस वक्त इन लोगों को टीआरपी से भी कोई एतराज नहीं था. सभी मस्ती में थे. जब एक चैनल ने भूत-पिचास की खबरे दिखानी शुरु की, खबरों में से खबर निकालकर नाटक दिखाना शुरु किया तो उसकी टीआरपी बढ़ गई.
इसके बाद तो सभी चैनल इसी ओर दौड़ने लगे. हर कोई दौड़ा. किसी ने भी रुकने की और सोचने की जरुरत महसूस नहीं की. उस वक्त किसी को भी पत्रकारिता की सुध नहीं थी या कहें तो किसी ने भी इस ओर देखने की जरुरत नहीं समझी.


जब, सब दौडते-दौड़ते थकने लगे, सांस फुलने लगी, चेहरा गंदा होने लगा. आखों से गर्म हवाएं निकलने लगी तो पत्रकारिता और खबर की याद आने लगी.


पिछले दिनों जिन पत्रकारों ने भी ’टीआरपी” को कोसा है, टैम को लेकर पोस्ट या लेख लिखा है वो ऐसे टीवी चैनल के साथ जुड़े हैं जिसकी टीआरपी अच्छी नहीं है. इन बड़े पत्रकारों के चैनल्स ने वो सब कुछ किया जो टीआरपी बटोरने के लिए किया जाना चाहिए लेकिन फिर भी इनकी नैया हिचकोले खा रही है. डगमगा रही है.
इस हालत में इन संपादकों को ऐसा लग रहा होगा कि “न इस पार के रहे न उस पार के’.


तो ख्याल आया कि क्यों न टीआरपी को ही कोसा जाए. ताकि लोगों की नजर में बेहतर पत्रकार की छवी बनी रहे.
जैसा कि ये संपादक अपने लेख में लिख रहे हैं कि टीआरपी से नुकसान हो रहा है और इसे बंद किया जाना चाहिए तो ऐसी ही आवाज उन चैनलों के मालिकों की तरफ से भी आनी चाहिए जो अभी टीआरपी की मलाई खा रहे हैं.


इस बारे में काम करने की जरुरत है. इन लिखाड़ समाचार संपादकों को चाहिए कि वो इस मसले पर अपनी बिरादरी में एक राय बनाएं और कुछ ठोस कदम उठाएं जो फेसबुक, ब्लॉग और अखबार के अलावा उनके चैनलों पर भी दिखे.

रविवार, जनवरी 10, 2010

मीडिया का क्या करें?

पश्चिम बंगाल के एक वयोबृद्ध नेता और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री बिमार हैं. बंगाल के एक अस्पताल में उनका इलाज चल रहा है.

इस तरह के खबरों के बीच एक खबर आती है कि बिमार नेता नहीं रहे. वो स्वर्ग के लिए निकल गए हैं. लेकिन अगले दिन खबर मिलती है कि नेता के मरने की खबर झूठी थी. नेता अभी भी अस्पताल में हैं और मौत से लड़ रहे हैं.

अब कोई बताए कि मीडिया के माध्यम से दी गई उस झूठी खबर के लिए कौन जिम्मेवार है?

क्या कारण है कि किसी के मरने से पहले ही उसके मौत की खबर दे दी जाती है. जब इस तरह की खबर आई तो मुझे अपनी एक दोस्त की बातें याद आने लगी.

कुछ दिन पहले वो एक न्यूज एंजेसी के साथ बतौर पत्रकार काम करती थी. उसने वहां देखा कि जैसे ही कोई नेता या प्रतिष्ठित व्यक्ति बिमार पड़ता है या अस्पताल जाता है तो उन  व्यक्तियों के उपर ऐसे पैकेज तैयार होने लगते हैं जिसे मरने के बाद फौरन चला्या जा सके.

उसने कहा कि ऐसा करते वक्त पत्रकार उस आदमी को मरने से पहले ही अपनी स्क्रिप्ट में मार देते हैं.

लेकिन अब तो ऐसा लगता है कि पत्रकार किसी को केवल अपनी स्क्रिप्ट में ही नहीं मारता बल्कि उस बिमार आदमी को पब्लिकली भी मार देता है.

ये सब देख कर लगता है कि नामी आदमी न बनने में ही भलाई है. कम से कम जिन्दा रहते हुए कोई मारेगा तो नहीं.

आप क्या सोचता हैं?

शुक्रवार, जनवरी 08, 2010

दिल्ली का ये कैसा गांव है?


“मुनिरका गांव” साउथ दिल्ली के बीचों-बीच का एक ऐसा इलाका जो अब केवल नाम के लिए ही गांव है. यहां कुछ भी गांव जैसा नहीं है.  न लोग और न जगह.



फिर भी इसे गांव ही कहा और लिखा जाता है. सवाला उठता है कि अगर इस इलाके में गांव जैसा कुछ भी नहीं है तो इसे गांव क्यो कह्ते हैं?

इसका एक जवाब जो हर कोई बड़ी आसानी से दे देता है कि इस इलाके से सबसे ज्यादा वोट पड़ते हैं सो कोई भी पार्टी इन कथित गांवो पर हाथ नहीं डालना चाहती और इसे जस का तस बने रहने देती है.

लेकिन क्या यही एक कारण है कि मुनिरका जैसे गांव आज भी दिल्ली के बीच में बने हुए हैं. इस इलाके का अगर कोई सर्व कराया जाए या कोई एक बार इस इलाके में आए तो आसानी से यह बात समझ सकता है कि यहां एक खास जाति वर्ग के दबदबा के कुछ भी गांव जैसा नहीं है.

बल्कि मै तो कहूंगा कि यहां गांव के नाम पर एक अराजकता बनी हुई है. अगर आप इस इलाके में रेंट पर रहते हैं तो आपके कोई औकात नहीं है, कोई इज्जत नहीं है.

आप कभी भी, कहीं भी, हल्की सी बात के लिए सामुहिक तौर पर पीटे जा सकते हैं. यहां यह मतलब नहीं रखता की गलती किसकी है? अगर आपकी गलती हुए तब तो कोई कहना ही नहीं है लेकिन अगर आपकी कोई गलती नहीं भी हुई तो भी आप मार खा सकते हैं और कोई कुछ नहीं बोलेगा, कोई नहीं बचाएगा.

अगर आप में से कुछ लोगों को लगे कि मैं किसी पूर्वाग्रह से ग्रसित हो कर ऐसा लिख और बोल रहा हूं तो मेरा मुनिरका आने का निमंत्रण स्वीकार करें.

आएं और खुद अपनी आखों से देखें दिल्ली के इस गांव के रहन-सहन को और फिर फैसला करें. कोई जल्दे नहीं है.

वैसे भी हम लोग कोई फैसला नहीं कर सकते. फैसला करने वाले तो कहीं और बैठते हैं. उन्हें तो मालुम भी नहीं होगा कि कहां क्या हो रहा है.

आज लिख रहा हूं लेकिन यह सब पिछले तीन साल से देख रहा हूं. मुझे समझ नहीं आता कि क्यों यह आज भी गांव कहा जाता है. मुझे इसका ठीक-ठीक कारण नहीं पता सो मैं कोई जवाब देने की हालत में नहीं हूं.

अगर आपके पास कोई जवाब हो तो जरुर दीजिए.






मंगलवार, दिसंबर 29, 2009

नए साल में एक नई शुरुआत करें!

माननीय,
टीवी के समाचार संपादकों


कुछ ही दिनों में नया साल शुरू होने वाला है. मैं इस मौके पर आपसब के कुशल और खुशहाल जीवन की कामना करता हूं. मैं और मेरे जैसे आपके हजारों दर्शक यही कामना करते हैं. आपके  दर्शक आपसब से बेहद प्यार करते हैं और एक लगाव भी महसूस करते हैं. देखिए, जहां प्यार और लगाव होता है वहीं शिकायतें होती हैं, नाराजगी होती है. यही कारण है कि जब आप अपनी चैनल पर कोई ऐसी-वैसी खबर दिखाते हैं तो हम आप पर बरस पड़ते हैं. आपसे शिकायत करते हैं और अपनी नाराजगी जाहिर करते हैं. ये नारजगी, ये शिकायत केवल इसलिए होती  है कि आप कुछ अच्छा दिखाएं. कुछ अच्छी बात बताएं.


आप ही सोचिए, अगर हमे आपसे मतलब नहीं होता, आपसे कुछ अच्छे की उम्मीद नहीं होती तो हम आपको क्यों देखते? अगर हम नहीं देखते तो आप क्यों कुछ दिखाने के लिए बैठे होते?


पिछ्ले दिनों मैंने कई संपादकों को पढ़ा और सुना है. आप में से कुछ को फेसबुक  पर पढने और जानने का मौका मिला तो कईयों को सभा-संगत में सुनने का मौका मिला. आपको पढ़ कर और सुन कर ऐसा लगा कि आपलोग आलोचना करने वालों को अपना दुश्मन मान कर बैठें हैं. शायद आपको यह लगता है कि कुछ ऐसे लोग हैं जो आपको हमेशा ही गाली देने के लिए तैयार रहते हैं.


लेकिन ऐसा नहीं हैं. हमे अच्छा नहीं लगता जब आप अपने चैनल पर यह दिखाते हैं कि 2012 में दुनिया तबाह हो जाएगी. हमें तब निराशा होती है जब आप खबर दिखाने की जगह "हंसी का फूल डोज" देने लगते हैं.


दुख होता है जब आप शाम के समय यह दिखाते हैं कि किस रियलिटी शो में क्या हो रहा है. हमे झल्लाहट होती है जब आप जल्दी-जल्दी में आरुषी के पिता को उसका खूनी बता देते हैं. हमे घृणा होती है जब कई बार आप पुलिस और प्रशासन के द्वारा कही बात को ही सच मान लेते हैं और उसे हमारे सामने जस का तस पेश करते हैं.


हम चाहते हैं कि आप हमें खबर दिखाएं, कुछ और नहीं.


आपको यह तय करना होगा कि आप क्या करना चाहते हैं और क्या दिखाना चाहते हैं? आपको यह तय करना ही पड़ेगा कि आपके करीब कौन है? आपका दर्शक या टैम की साप्ताहिक रिपोर्ट. जनहित या मार्केट.


अगर आपके करीब आपका दर्शक है तो चलिए इस नए साल के मौके पर आपसब एक प्रण लीजिये कि आप 2010 में खबरें दिखाएंगे और कुछ नही.


अपने दर्शकों से यह वादा कीजिए कि आप टैम के आगे नहीं झुकेंगे बल्कि उस टैम को जिसे आप भी पंसद नहीं करते हैं अपने सामने, अपने दर्शकों के सामने घुटनों के बल बैठने के लिए मजबूर कर देंगे. आपका दर्शक आपके साथ रहेगा.


एक दर्शक.


शनिवार, दिसंबर 26, 2009

मजदूरों की मजदूरी और पुलिस की लाठी

(मुझे यह जानकारी संदीप जी के मेल से मिली. इस खबर को कोई अखबार या टीवी वाला तो दिखाएगा नहीं क्योंकि यहां उनके मालिकों का हित खतरे में है. लेकिन ब्लौग पर तो हम इसे पढ ही सकते है. यहां किसी का कुछ नहीं चलता है.)

करावल नगर के बादाम मज़दूर पिछ्ले कुछ दिनों से मज़दूरी बढ़ाने की मांग को लेकर हड़तालत पर हैं। आज सुबह क़रीब 1500 महिला-पुरुष मज़दूर अपनी मांग के समर्थन में यूनियन के संयोजक आशीष तथा अन्‍य लोगों की अगुवाई में इलाकाई पैमाने का जुलूस निकाल रहे थे। ये मज़दूर प्रति बोरा 40 रुपये की बेहद मामूली दरों पर ठेकेदारों के लिए काम करते हैं। आन्‍दोलन के बढ़ते जनसमर्थन से बौखलाए बादाम ठेकेदारों ने सुबह क़रीब 11:30 बजे अपने गुण्‍डो से जुलूस पर हमला करा दिया। हमले में आशीष, कुणाल और प्रेमप्रकाश बुरी तरह घायल हो गये। ठेकेदारों की बर्बरता से बौखलाए मज़दूरों ने इस पर ज़बर्दस्‍त प्रतिरोध किया।

इस पूरे मामले में करावल नगर पुलिस की भूमिका साफ़तौर पर मज़दूर विरोधी दिखी। पुलिस दिनभर जहां एक ओर मज़दूरों की लिखित नामजद तहरीर पर एफआईआर दर्ज करने का आश्‍वासन देती रही, वहीं शाम 7 बजहे तक ठेकेदार और उनके गुण्‍डो के खिलाफ न तो एफआईआर ही दर्ज हुई और न ही घायल मज़दूरों का मेडिकल मुआयना कराया गया। उल्‍टे पुलिस ने बादाम मज़दूर यूनियन के संयोजक आशीष तथा कुणाल और प्रेमप्रकाश को धारा 107/151 के तहत गिरफ्तार कर लिया।

पुलिस की इस अंधेरगर्दी से पूरे क्षेत्र के मज़दूरों में गुस्‍से की लहर दौड़ गयी। इस पूरे इलाके में क़रीब 25,000 मज़दूर बादाम तोड़ने का काम करते हैं। इन मज़दूरों के ठेकेदार बेहद निरंकुश हैं और क़रीब-क़रीब मुफ्त में मज़दूरों से काम करवाने के आदि हैं। बादाम मज़दूर यूनियन ने गुण्‍डों द्वारा मारपीट और पुलिस की मालिक परस्‍त भूमिका की तीखे शब्‍दों में निंदा की है। यूनियन ने बताया कि कल एक प्रतिनिधिमण्‍डल पुलिस के उच्‍चाधिकारियों से मिलेगा और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग करेगा। युनियन का कहना हैकि यदि उन्‍हें न्‍याय नहीं मिला तो वे आन्‍दोलनात्‍मक रुख अपनाने के लिए तैयार रहेंगे।

अधिक जानकारी के लिए इस नंबर पर संपर्क करें:
अभिनव : 9999379381

गुरुवार, दिसंबर 24, 2009

हम तो आम हैं!!!

(सुबह-सुबह छत पर आराम से बैठकर अखबार पड़ने का मौका नहीं मिलता, सो चलते वक्त बैग में रख लेता हूं और बस में अपनी सीट पर जमने के बाद पढ़ना शुरु करता हूं. आज भी ऐसा ही हुआ. खबरें और लेख देखते वक्त मेरी आखों के सामने दो ऐसी खबरें आईं, जिसे पढने के बाद लगा कि इन खबरों को तो फ्रन्ट पेज पर होना चाहिए था, ये अन्दर की पेज पर क्या कर रही हैं? आइए, आपको उन दोनों खबरों के बारे में बतलाते हैं. )

पहली खबर के मुताबिक, यूपीए की सरकार ने संसद में एक विधेयक पेश किया है. यह विधेयक  मंत्रीयों के रिश्तेदारों और परिजनों को चाहे जितनी संख्या में मुफ्त विमान यात्रा की सुविधा देता है. विधेयक में साफ तौर पर कहा गया है कि मंत्रियों के परिवार के सदस्य और उनके संबंधी उनकी सरकारी विमान यात्रा में उनके साथ चाहे जितनी संख्या में जा सकते हैं. सबसे मजे की बात तो यह हुई कि यह विधेयक संसद के दोनों सदनों में बगैर बहस के पास हो गया.

दूसरी खबर देश की राजधानी दिल्ली से है. शीला सरकार ने अपने सभी छ मंत्रियों के लिए आलीशान बंगले बनवाने की परियोजना बनाई है. इस परियोजना पर करीब सवा दस करोड़ रुपए खर्च आने का अनुमान है. दिल्ली सरकार चाहती है कि बंगले अगामी पंद्रह महीनों में बन कर तैयार हो जांए.



 मैं इन ख़बरों को पढ़ने के बाद कुछ कहने की हालत में नहीं हूँ........आपका मुझे नहीं मालुम!! 

रविवार, दिसंबर 13, 2009

सुनो तो मेरी भी


हे मर्द, तुमने क्या कहा?

ज़रा दुहराना तो

तुमने कहा- हम औरतें, कोमल हैं,

कमज़ोर हैं!

लाचार हैं साथ तुम्हारे चलने को,

हमारा कोई अस्तित्व नहीं है

बगैर तुम्हारे!


तुम्हारी इन बातों पर,

बचकानी सोच पर,

जी करता है खूब हँसू…….!


सोचती हूँ, कैसे बोलते हो तुम ये सब?

कहीं तुम्हे घमण्ड तो नही

अपनी इस लम्बी कद-काठी का,

चौड़ी छाती का जहाँ कुछ बाल उग आए हैं….!


सच में, अगर घमण्ड है तुम्हें

इन बातो का तो ज़रा सुनो मेरी भी-

तुम मर्दो का आज अस्तित्व है

क्योंकि

किसी औरत ने पाला है

तुम्हे नौ महीने अपने पेट मे !


लम्बी कद-काठी है

क्योंकि

तुम्हारी कुशलता के लिए

प्रयासरत रही है

कोई औरत हमेशा !


छाती चौडी है

क्योंकि

पिलाई है किसी औरत तुम्हे छाती अपनी !


अब सोचो,

फिर बोलो,

कौन लाचार है ?

किसका अस्तित्व नहीं, किसके बगैर?


शुक्रवार, दिसंबर 11, 2009

ठण्ड की काली रात में......

ठण्ड की काली रात में......
कांपती हुई,
सिकुड़ी हुई है.
तंग कपड़ों में लिपटी,
सड़क किनारे लुढ़्की हुई है.
 
गोद में समेटे बच्चे को,
शीतलहर से लड़ रही है.
लड़ते-लड़्ते हांफ रही है,
और सांसों की खुलती गठरी को बांध रही है.
ठण्ड की काली रात में......

अपनी जिन्दगी जी चुकी है,
ऐसी अनगिनत काली और ठण्डी रातें,
सड़क किनारे, स्ट्रीट लाईट में काट चुकी है.

अब, और जीने की चाह नहीं है लेकिन जिन्दा है,
अपने बच्चे की खातिर, जो उससे गर्मी ले रहा है,
और चैन से सो रहा है.
इस ठण्ड की काली रात में....

बुधवार, नवंबर 25, 2009

गंभीर विषय और NDTV

23 दिसंबर की रात के करीब 10 बज रहे होंगे जब मैं अपने एक दोस्त के रूम पर टीवी देख रहा था. उस वक्त हर न्युज चैनल अपने-अपने अंदाज में एक साल पहले की उस घटना को याद कर रहा था जिसने समूचे देश को स्तब्ध कर दिया था, मुम्बई की तेज रफ्तार जिन्दगी को रेंगने पर मजबूर कर दिया था. 


हर चैनल पर मुम्बई हमले के बारे में स्टोरी चल रही थी, ये साफ दिख रहा था कि चैनलों ने इस कार्यक्रम को बनाने में खूब मेहनत की थी, खूब काम किया था. एक चैनल ने तो इस गंभीर विषय पर बने अपने कार्यक्रम को पूरा-पूरा नाटकीय रुप दे दिया था.


अपने को और चैनलों से अलग बताने वाले इस खबरिया चैनल पर एक फिल्मी स्टार कार्यक्रम का संचालन अपने फिल्मी स्टाइल में कर रहा था.


मुझे इस बात से आपत्ति है कि इस कार्यक्रम को एक नाटक वाले स्टाईल में क्यों पेश किया गया? क्या मुम्बई पर हुए हमले को दिखाने का इससे बेहतर तरीका नहीं हो सकता था? आखिर क्या वजह थी कि NDTV जैसे चैनल को इस गंभीर विषय पर बने कार्यक्रम को दिखाने के लिए एक एक्टर की मदद लेनी पड़ी? कार्यक्रम को नाटकिय अंदाज में दिखाना पड़ा?

आज हिन्दी के ज्यादातर खबरिया चैनल हर कार्यक्रम को इसी अंदाज में लोगों के सामने रखते हैं और खूब कमाई कर रहे हैं लेकिन इस चैनल की एक अपनी छवि है लोगों के बीच. चैनल यह क्यों नहीं समझ पा रहा है कि उसके दर्शक खबर को खबर के रुप में ही देखना चाहते हैं. अगर NDTV भी दूसरे चैनलों की राह पर चलने लगेगा तो इससे किसी का भी भला नहीं होगा. न तो चैनल का भला होगा और न ही उसके दर्शकों का.


शनिवार, नवंबर 21, 2009

ऐसा होगा शिव सैनिकों का राज.....!!!!

कल, बाल ठाकरे के गुंडों ने मुम्बई के एक टीवी चैनल के दफ्तर में मार-पीट और तोड़-फोड़ की. इस घटना के बाद सेना के एक प्रवक्ता ने गर्व के साथ स्वीकार किया कि हमला “शिव सैनिको” ने किया है.
मुझे लगता है कि, इस घटना के बाद मुम्बई वासियों को चेत जाना चाहिए और इन जैसे अतिवादियों का सामुहिक बहिष्कार करना चाहिए, इन्हें वोट नहीं देना चाहिए

इस दुष्कर्म ने दिखा दिया है कि ये लोग मुम्बई में किस तरह का शासन चाहते हैं. ये लोग मुम्बई समेत सारे महाराष्ट्र में तालिबानी शासन चाहते हैं, जहां हर कोई इनकी हां में हां मिलाए, इनका गुणगान करे और पूजा करे. ये ऐसा शासन चाहते हैं जिसमे इनके विरोधियों के लिए कोई जगह न हो. अत: अब मुम्बई के लोगों, मतदाताओं को तय करना होगा कि वो अपने लिए, अपने बच्चों के लिए कैसी व्यवस्था चाहते हैं?

शुक्रवार, नवंबर 20, 2009

चैनल के साथ जनता का समर्थन है.



(इन दिनों हर कोई इन्डिया टीवी के पीछे पड़ा है, कोई खराब कंटेंट का नाम लेकर इस चैनल को गाली दे रहा है तो कोई खबर की प्रस्तुति को लेकर सवाल उठा रहा है. किसी को परेशानी है कि चैनल प्राइम टाइम पर भूतों की कहानी दिखा रहा है तो कुछ लोग कहते फिर रहें हैं कि यह चैनल तो देखने लायक ही नहीं है, बेकार है.
तो ऐसे में, इंडिया टीवी के एक दर्शक ने सभी संपादकों और टीवी आलोचकों के नाम एक शिकायती पत्र लिखा है जिसे जैसा का तैसा नीचे प्रकाशित किया जा रहा है.)
प्रिय संपादकों,
तमाम पोर्टल और अखबार
मैं इंडिया टीवी का एक जागरुक दर्शक हूं, और ऐसा कम ही होता है जब मेरी आंखे टीवी से मतलब इडिया टीवी से हटती हैं, और इधर-उधर मतलब दूसरे ख़बरिया चैनल या किसी पोर्टल की तरफ देखती हैं. मैं इंडिया टीवी के अलावा न तो किसी को देखना पंसद करता हूं और न ही सुनना.
 अब आप सोच रहे होंगे कि मैं यह पत्र आपसब को क्यों और कैसे लिख रहा हूं? साहब, आपको यह मालूम होना चाहिए कि आजतक मैंने रजत जी के अलावा दूसरे किसी भी संपादक को कोई खत नहीं लिखा. लेकिन इस बार लिखना पड़ रहा है.

गुरुवार, नवंबर 12, 2009

अपना गांव अच्छा नहीं लगा.


अभी एक-दो दिन पहले ही अपने गांव से लौटा हूं, इस बार मेरा गांव प्रवास करीब-करीब बीस दिनों का था सो मेरे पास कुछ ज्यादा टाइम था, अपने उस गांव को देखने-समझने का जहां मैं पैदा हुआ, जवान हुआ. पहले अपना गांव अच्छा लगता था, वहां के लोग और उनकी बातें सुहाती थी. वो जैसे भी थे, अच्छे थे.

वो सारे लोग मुझे अबकी बार अच्छे नहीं लगे, वो इसलिए कि आज भी मेरे गांव का भूमिहार चाहता है कि चमार, डोम, मुसहर उसे नीचे तक झुक कर सलाम ठोके, गाली सुनकर भी उन्हें (भूमिहारों को) मालिक कहे, भूखा रहकर भी उनकी बेगारी करे.

मंगलवार, नवंबर 10, 2009

कुछ भी अचानक नहीं हुआ…….!!



कल जो कुछ महाराष्ट्र में हुआ वो अचानक नहीं हुआ, इसकी रुपरेखा बहुत पहले तैयार हो चुकी थी.
बहुत पहले से मानसे के मुखिया राज ठाकरे ने इस बारे में चेतावनी देनी शुरू कर दी थी लेकिन हम सचेत नहीं हुए. मानसे वालों ने पहले हमे सड़क पर पीटा, मां-बहन की, नंगा किया और उसके बल पर विधानसभा में दाखिल हुए और कल वहां भी हमे पीट गए. हम तब भी चुप थे और आज भी चुप ही रहेंगे क्योंकि हमारी केन्द्र की सरकार उस वक्त भी शांत थी और आज भी खामोश है.


जब हमे सड़क से उठा-उठाकर पीटा जा रहा था, गाली दी जा रही थी, मुम्बई से भागने को बोला जा रहा था तब क्यों नहीं इन गुन्डा टाईप लोगों को रोका गया? क्यों हम पीटते रहे और सरकारें चुप बैठी रहीं? क्यों किसी को भी उस वक्त, आज का अन्देशा नहीं हुआ? क्यों किसी ने भी उस वक्त राज को रोकने की जरुरत महसूस नहीं की?

लोग पीट रहे थे, मीडिया तस्वीर दिखाने में लगा हुआ था. नेता अपनी-अपनी राजनीति कर रहे थे और राज ठाकरे दिनों-दिन मजबूत हो रहे थे. राज ने यह सब बहुत पहले ही सोच लिया था.

इस पूरे मसले पर कांग्रेस की चुपी ने दिखा दिया है कि राजनितिज्ञ अपने फायदे के लिए कुछ भी कर सकते हैं. किसी भी हद तक गिर सकते हैं. बड़ी से बड़ी घटना पर भी मौन रह सकते हैं, और किसी छोटी से छोटी बात पर भी बेवजह की उछल-कूद मचा सकते हैं.

हो सकता है कि कुछ लोगों को यह लगे कि कल की घटना के बाद कुछ बदलेगा लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं होने वाला. सब कुछ वैसा का वैसा ही रहेगा क्योंकि यहां हर कोई बिका हुआ है, हम और आप भी.


मंगलवार, अक्टूबर 20, 2009

छठ पूजा की हार्दिक शुभकामनाएं.......!!!


आज ही अखबार में पढ़ा रहा था कि पूरब की तरफ जाने वाली ट्रेनों में रेलमपेल की स्थिति है, क्योंकि छठ पूजा में सब बिहारी अपने घर जाना चाहते हैं.

तो साथियों, आपका ये बिहारी भी आज अपने गांव जा रहा है. छठ पूजा के बाद आपसब से मुलाक़ात होगी. चलते-चलते, आप सब ब्लौगर दोस्तों को छठ पूजा की हार्दिक शुभकामनाएं.......!!!

जब लौट कर आउंगा, तो आपको  बतालाउना कि जाने के लिए ट्रेन टिकट का जुगार कैसे हुआ ?
अभी तो बस निकलने की जल्दी है, सो चलता हूँ.

रविवार, अक्टूबर 18, 2009

पेशाब पिशूब करना मना है


सामान्य देशों में लोग सुबह दफ़्तर जाने से पहले नाश्ता करते हुए इसलिए टीवी ऑन करते हैं कि कोई सुंदर चहरा देखें. किसी हल्की फुल्की बात पर हंसें. किसी राग का मज़ा लें और दिन की शुरुआत ख़ुशगवार अंदाज़ में करें.

लेकिन पाकिस्तान में अब लोग सुबह, दोपहर या शाम टीवी ऑन करने के पहले कई बार सोचते हैं. कहीं कोई धमाका न हो गया हो, कहीं आतंकवादी किसी बिल्डिंग में न घुस गए हों, कहीं कोई बड़ा आदमी मारा न गया हो, कहीं कोई छोटा आदमी ग़ायब न गया हो....

आज भी जब दफतर से मेरी पत्नी का एसएमएस आया कि ज़रा टीवी ऑन तो कीजिए. मैं समझ गया कि फिर कोई बुरा या बड़ा हो गया है. लेकिन अब सब लोगों की आदत सी हो गई है कि धमाका, लाशें, सैन्य कार्रवाई कोई ख़बर नहीं है. अगर मज़ा है तो बौखलाए हुए टीवी ऐंकर्स, अनाड़ी रिपोर्टर्स और गृह मंत्री रहमान मलिक को देखने में है. यह वह मख़लूक़ है जो हर ट्रेजडी को ब्लैक कॉमेडी में बदल देती है.

ऐंकर... सूचना के अनुसार हमलावर "सशस्त्र बंदूक़ें" लेकर पुलिस प्रशिक्षण केंद्र में दाख़िल हो गए हैं.

ऐंकर (रिपोर्टर से) आप ने अभी कहा कि इमारत के अंदर से गोलीबारी हो रही है. क्या आप बता सकते हैं कि इस समय कितने लोग फंसे हुए हैं और इन में घायल कितने हैं.

रिपोर्ट... अभी अभी एक आतंकवादी निकल कर भागा है. भागने के अंदाज़ से लगता है कि वह दक्षिण वज़ीरिस्तान से आया है.

ऐंकर... आइए दर्शको, हम आप को गंगाराम अस्पताल लेकर चलते हैं जहाँ हमारे रिपोर्टर मिस्टर फलाँ फलाँ मौजूद हैं. मिस्टर फलाँ फलाँ यह बताइए कि इस समय यहाँ पर लाए गए घायलों की क्या स्थिति है? क्या उन्हें ठीक तरह से चिकित्सा की सुविधाएँ मिल रही हैं. क्या दवाएँ पूरी हैं?

ऐंकर (रिपोर्टर से) अच्छा यह बताईए कि मोहम्मद रशीद नामी आतंकवादी जो गिरफ्तार हुआ है, उन के बारे में क्या जानकारी है.

रिपोर्टर... जी, मोहम्मद रशीद ने पुलिस को बताया है कि उन असली नाम मोहम्मद सिद्दीक़ है.

ऐंकर (पुलिस चीफ से) सुना है कि आंतकवादियों में कुछ महिलाएँ भी हैं.

पुलिस चीफ... जी, अभी इस बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता.

ऐंकर... तो इस की कोई संभावना है कि महिलाएँ भी हो सकती हैं??

फिर इंतेज़ार रहता है टीवी के सामने बैठने वालों को कि गृह मंत्री रहमान मलिक आज क्या कहेंगे.
रहमान मलिक... देखें जी, यह बहुत बड़ी सफलता है कि हमला करने वाले सभी आतंकवादियों को मार दिया गया है. यह आतंकवादी मानवता के दुशमन हैं. यह पैसे लेकर ऐसी कार्रवाईयाँ कर रहे हैं. यह विदेशी इशारों पर नाच रहे हैं. अगर आज यह अपने इरादों में कामयाब हो जाते तो बहुत बड़ी तबाही होती और मीडिया के अनुरोध करता हूँ कि वह जिम्मेदारी का प्रदर्शन करे और ऐसी घटनाओँ को ज़्यादा न उछाले.

रिपोर्ट (रहमान मलिक से) पिछले हफ्ते इस्लामाबाद में विश्व खाद्य कार्यक्रम के कार्यालय पर जो हमला हुआ था. उस के बारे में कुछ पता चला?

रहमान मलिक... जी हाँ, उस की जांच हो रही है. अभी तक यही पता चला है कि एक आत्मघाती जो सुरक्षाकर्मियों को वरदी में था उस ने दफतर के बाहर मौजूद एक संतरी से कहा कि वह "पेशाब पिशूब" करना चाहता है. सुरक्षाकर्मी ने उसे अंदर का बाथरूम इस्तेमाल करने की इजाज़त दे दी और वह घुस गया . सुरक्षा संबंधी संस्थाओँ को आदेश दिया है कि आइंदा किसी अज्ञात को चाहे उस ने वरदी ही पहनी हुई हो पेशाब करने के लिए अंदर न छोड़ें.

( यह पोस्ट भी बीबीसी हिन्दी के ब्लॉग खरी-खरी से उधार लेकर यहाँ चस्पा रहा हूँ. .  लेखक है बीबीसी के पत्रकार "वुसतुल्लाह ख़ान")

गुरुवार, अक्टूबर 15, 2009

घर की लड़ाई की वजह से…..

जंगल के रास्ते एक कुत्ता तेजी से दौड़ रहा था.
रास्तेमें खड़े एक किसान ने उससे पूछा- भाई, तुम कहां जा रहे हो?
कुत्ते ने जवाब दिया- मैं जिन्दगी भर के पापों को धोने के लिए गंगा स्नान के लिए जा रहा हूं।
तुम्हें गंगा तक पहुंचने में कितना समय लगेगा?- किसान ने अगला सवाल पूछा।
कुत्ता बोला- महाशय, गंगा तक पहुंचने की दूरी तो कुछ ही समय में तय की जा सकती है लेकिन मुझे कई गुणा ज्यादा समय लगेगा।
किसान ने जिज्ञासा रखी- ऐसा क्यों? क्या तुम चलते-चलते थक गए हो सो कहीं रुक कर आराम करने का इरादा है।

कुत्ते ने जवाब दिया- मुझे आराम करने की कतई जरूरत नहीं है फिर भी वक्त ज्यादा लगेगा. इसकी वजह मेरे मनुहारिए मामा लोग हैं जो गांव-गांव में मिलते हैं.
कुत्ते की यह बात किसान के समझ में न आई. उसने पूछा- मामाओं से आपको क्या तकलीफ है. क्या आपके इतने सारे मामा हैं कि हर गांव में मिलते हैं।

कुत्ते
ने खुलासा करते हुए कहा- मामाओं से मतलब मेरी बिरादरी के कुत्ते हैं. वे जहां भी मिलते हैं, मुझे रोकने की भरसक कोशिश करते हैं. कोई मेरी अगली टांग पकड़ता है, तो कोई पिछली खींचता है. इस खींचतान में और अपनी बिरादरी वालों को समझाने-बुझाने में ही बहुत सारा समय निकल जाता है. बड़ी मुश्किल से अपनी टांग बचाकर मैं फिर यात्रा के लिए आगे बढ़ता हूं. इस तरह मनुहारिए मामाओं को समझाते-बुझाते यह यात्रा दिनों के की जगह महीनों में पूरी होगी.
किसान समझ गया कि घर की लड़ाई की वजह से सफलता देरी से मिलती है।


(सभार: राजस्थान पत्रिका)



मंगलवार, अक्टूबर 06, 2009

मुंबई या बंबई

( यह पोस्ट भी बीबीसी हिन्दी के ब्लॉग खरी-खरी से उधार लेकर यहाँ चस्पा रहा हूँ. इस लेख में एक ख़ास तेवर है जिसे आप पसंद करेंगे. इसके लेखक है बीबीसी के पत्रकार "राजेश प्रियदर्शी"। )

पहले राज ठाकरे नाराज़ हुए और उसके बाद महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चह्वाण।
अगर आपके पास ऊँची कुर्सी हो या सिनेमा हॉल की कुर्सियाँ उखड़वाने की ताक़त हो तो आप भी करण जौहर से नाराज़ हो सकते हैं। वे माफ़ी भी माँग लेंगे.

आप बताइए ज़्यादा बड़ी गलती मुंबई को उसके पुराने नाम से बुलाना है या उसके लिए माफ़ी माँगना. वह भी एक ऐसे आदमी से, जो मानता है कि तोड़फोड़ के बिना महाराष्ट्र का 'नवनिर्माण' संभव नहीं है.

अगर आप नागरिकों के अधिकार-कर्तव्य वग़ैरह की बात करने वाले 'भावुक आदमी' हैं तो आपको मुख्यमंत्री की बात सही लगेगी, अगर आप सही टाइम पर सही काम करने वाले 'समझदार आदमी' हैं तो करण जौहर को अशोक चह्वाण से भी माफ़ी माँगकर काम पर जुट जाने की सलाह देंगे.

मुख्यमंत्री अशोक चह्वाण कह रहे हैं कि पुलिस के पास क्यों नहीं गए, मुख्यमंत्री हैं इसलिए कहना उनका काम है. पांडु हवालदार और राज ठाकरे में से किसकी शरण में जाना है, यह हर समझदार आदमी को पता है.

जब तक महाराष्ट्र के 'नवनिर्माण में जुटे सामाजिक कार्यकर्ता' शिव सेना की जड़ें कुतर रहे हैं राज्य के कांग्रेसी मुख्यमंत्री को भला क्या एतराज़ हो सकता है, उन्हें अगर एतराज़ होता तो दो दिन बाद बयान देने के बदले समय पर कार्रवाई न करते?

यह तो इन दिनों की राजनीति की बात है लेकिन समानांतर सेंसर बोर्ड का मुख्यालय 'मातुश्री' में बरसों से रहा है, दूल्हे के बैठने वाली कुर्सी पर साधु जैसे कपड़े पहनकर रुद्राक्ष के मनके फेरने वाले पूर्व कार्टूनिस्ट से कभी माफ़ी, तो कभी आशीर्वाद लेने बीसियों निर्माता-निर्देशक जाते रहे हैं.

करण जौहर ने कुछ नया नहीं किया है, न अपनी फ़िल्मों में, न असलियत में.
क़ायदे-क़ानून से परे दलालों, पूंजीपतियों, महंतो, मठाधीशों और गुंडों के दरबारों में मत्था टेकने का आदी समाज 'वेक अप सिड' से उठे विवाद को 'वेक अप कॉल' की तरह तो नहीं देख रहा है।

(सभार: बीबीसी हिन्दी)

शनिवार, सितंबर 26, 2009

“इसरो करेगा चाँद पर खुदाई….” वाह भाई..वाह !!



कुछ दिन पहले हमने चाँद पर छ्लांग लगाई थी तो दुनियाभर के लोगों ने तरह-तरह की बातें बनाई. किसी ने मुंह चमकाते हुए कहा कोई बड़ी बात नही है चाँद पर जाना! तो किसी ने नसीहत वाले लहजे में कहा अच्छा है.पर चाँद के बदले मंगल पर जाना चाहिये था. कुछ लोगों ने तो इस दिवाली मनाने जैसे मौके पर भी हमे यह याद दिला दिया कि हम गरीब हैं और हमारे यहाँ भूखे-नंगों की एक बहुत बड़ी फौज है



लेकिन हमारी सरकार और इसरो वाले सबके सामने डटे रहे और वक्त से पहले चन्द्रयान-1 के नष्ट हो जाने के बाद भी मिशन को पूरा किया. इससे जहाँ एक तरफ सरकार और इसरो के हमारे महारथी खुशी से फूले नही समा रहे थे तो कुछ लोगों ने उन्हीं पुरानी बातों को रटना शुरु कर दिया कि देश से 60 साल में गरीबी नही खत्म हुई, ज्यादातर सरकारी योजना ने अपना मिशन पूरा नही किया, देश में हर पेट को अभी तक खाना नसीब नही हुआ आदि, आदि।



अब आप ही कहिये कि इन मुद्दों को यहाँ उठाने का क्या मतलब है ? मेरे कहने का अर्थ है कि जब इन मुद्दों को उठाने के लिये चुनाव जैसा महत्वपूर्ण समय तय है, काम करवाने के लिये केन्द्र से पंचायत तक जनसेवकों की भीड़ लगी है, पैसा देने के लिए वितमंत्रालय और योजना बनाने के वास्ते योजना आयोग बैठी है तो फिर दिक्कत कहाँ है? और अगर इन सारी व्यवस्थाओं के बाद भी कोई दिक्कत है तो ग्राम कचहरी से लेकर सुप्रीम कोर्ट भी तो बैठी है।



चाँद पर खुदाई कोई छोटी-मोटी बात थोड़े ही है, अरे! ज़मीन पर यह रोज़-मर्रे की बात है. नाजाने, कितने गड्ढे रोज़ खुदते हैं जिसका कोई औचित्य भी नहीं होता. और तो और उस गड्ढे में प्रिंस जैसे कितने बच्चे गिरते हैं. मीडिया भी बेरोज़गारों की तरह गड्ढे ढूंढता फिरता है और हमारी सरकार की नाकामयाबी को सरेआम करने को बेचैन रह्ता है पर अब ऐसा नहीं होगा, क्युंकि अब ज़मीन पर नहीं, चाँद पर होगी खुदाई।



कोई बच्चा गड्ढे में नहीं गिरेगा. हमारी सरकार ने भी ठान ही लिया है कि वो इन कोसू टाइप लोगों के आगे नही झुकेगी तभी तो हमने दो दिन पहले चन्द्रयान-2 चाँद पर उतार दिया, पानी भी खोज निकाली और अब तो चाँद की जमीन पर चल कर ही रहेगी भारतीय कुदाल।




तो आइये, यह भूलकर कि दाल का भाव आसमान छू रहा है, आलू और सेब का भाव बराबर हो गया है, गैस की कीमत बढ़ने वाली है हम क्युं ना जश्न मनायें, फ़ील-गुड करें।


(विशेष आभार: राहुल गांधी)


रविवार, सितंबर 20, 2009

लघु कहानी: ये तो सड़े हुए थे....!

(लेखक दोस्त कबीर कृष्ण की कलम से दुसरी कहानी आप सब के लिए।)
पिछली गर्मी की छुटियों में मैं घर जा रहा था।
अगले दिन की सुबह जब नींद खुली तो मेरी ट्रेन इलाहाबाद स्टेशन पर रुकी हुई थी।
मैं उत्सुकतावश खिड़की से बाहर देखने लगा।
तभी प्लेटफार्म की भीड़ से कोई दस वर्षीय लड़का अपने गले में अमरुद की टोकरी लटकाए मेरे पास आया,
....और कुछ फल खरीद लेने की प्रार्थना की।
मैंने उसे अनदेखा कर दिया।
तभी एक लम्बी सीटी के साथ मेरी ट्रेन पटरियों पर खिसकने लगी।
मुझे अचानक एक शरारत सूझी।मैंने उस लड़के को आवाज दी और जल्दी उसे आधा किलो अमरुद देने को कहा।उसने हड़बड़ी में कुछ फल तौले और लगभग दौड़ते हुए उसे मेरी तरफ बढा दिया।
मैंने भी अपनी जेब से दस रुपये का एक मुडा-तुडा नोट निकाला और उसे उसके हांथो में धरते हुए फल की थैली लपक ली.
तब तक ट्रेन की रफ्तार बहुत बढ़ चुकी थी.
उस लड़के ने बड़ी व्यग्रता से भागते हुए मेरे हांथो से नोट को पकडा और धीरे-धीरे खड़े होकर नोट को सीधा करने लगा।पर वो नोट तो बुरी तरह फटा हुआ था.वह बड़ी देर तक बड़ी दीनता से मेरी ट्रेन को निहारता रहा.मेरे चेहरे पर विजयी मुस्कान थी.अब मैंने फलो की थैली खोली और बड़े गर्व के साथ अमरुद खाने लगा.

पर ये क्या ये तो सड़े हुए थे....!

(लेखक- कबीर कृष्ण)